बुधवार, 17 अप्रैल 2024

UPSC : क्या 'सत्यमेव जयते' को याद रखेंगी हमारी सबसे चमकदार प्रतिभाएं?

 

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By Jayjeet Aklecha

अभी कुछ दिन पहले ही मेरे एक मित्र को कलेक्टर की पोस्टिंग मिली है। वह उन दुर्लभ ईमानदार अफसरों में से एक है, जिसने हमेशा फील्ड पोस्टिंग को अवॉइड किया, ताकि भ्रष्ट सिस्टम का डायरेक्ट हिस्सा बनने से बच सके। लेकिन अब जब कलेक्टर बना तो उसे जानने-समझने वाले हम तमाम मित्रों के दिमाग में बस यही एक सवाल था- वह वहां कब तक सवाईव कर पाएगा?
जब भी UPSC का रिजल्ट घोषित होता है, तब मेरे दिमाग में सबसे पहला सवाल यही उठता है- ये हमारे देश की सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाएं हैं। कड़ी मेहनत से इस मुकाम तक पहुंची हैं। मगर अब ये करेंगी क्या? जब आज सुबह की चाय पर अपनी पत्नी के साथ यूपीएससी रिजल्ट की सुर्खियां पढ़ रहा था और यही सवाल आया तो पत्नी का बेहद मासूमियत भरा जवाब था- करप्शन करेंगी, और क्या? यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है, मगर आम धारणा यही है कि देश के ब्राइटेस्ट टैलेंट का बड़ा हिस्सा एक भ्रष्ट सिस्टम का हिस्सा बन जाएगा और कुछ चुनिंदा दुर्लभ टाइप के अफसर अपने सर्वाइवल के लिए नए संघर्ष में जुट जाएंगे।
बेशक, मेहनत में भरपूर ईमानदारी बरतने वाले, कई महीनों, बल्कि वर्षों अपनी रातों की नींद खराब करने वाली देश की इन चमकदार प्रतिभाओं के दिमाग में शुरू में यह कतई नहीं रहता होगा कि मैं भ्रष्ट बनकर खूब पैसे कमाऊंगा। आप जब इनके शुरुआती इंटरव्यू पढ़ते हैं तो भले ही उनकी ये बातें हास्यास्पद लगती होंगी कि 'मैं देश और लोगों की सेवा करने के लिए इस क्षेत्र में आया हूं।' लेकिन हमें इससे इनकार नहीं करना चाहिए कि जवाब देने वाले के दिमाग में समाज-देश के लिए कुछ बेहतर कर गुजरने के सपने तो होते ही होंगे। इस परीक्षा की तैयारी करते समय उसने जिस गांधी को, जिस सुभाषचंद्र को, जिस लिंकन को, जिस मंडेला को पढ़ा होता है, वे सब हस्तियां शुरू में तो उसे आलोड़ित करती ही होंगी। लेकिन देश-समाज के लिए कर गुजरने वाले सपने आखिर कुछ ही वर्षों में विलोपित क्यों हो जाते हैं?
इसका एक श्रेष्ठ जवाब जापान और पूर्वी एशियाई देशों में प्रचलित एक कहावत में ढूंढा जा सकता है- 'अगर आपको भावी पीढ़ियों के भविष्य सुरक्षित करना है, तो पहली पीढ़ी को अपना सर्वस्व देना होगा।' लेकिन हमारे देश में क्या ऐसा हुआ? आजादी मिलते ही पहली पीढ़ी ने अंग्रेज अफसरशाही के उसी सिस्टम को हूबहू स्वीकार कर लिया, जिसमें अफसर जनता के प्रति जवाबदेह बनने के बजाय अपने से ऊपर वालों के प्रति समर्पित थे। किसी देश को गुलाम बनाए रखने के लिए एक सिस्टम की यह अनिवार्य शर्त भी थी। लेकिन आजाद देश में यह सिस्टम? यही सिस्टम हमने बनाए रखा और आज भी बना हुआ है, और भी मजबूती से।
हमारे प्रधान सेवक इन दिनों देशभर में घूम-घूमकर भ्रष्टाचार उन्मूलन का दम भर रहे हैं। लेकिन एक सवाल उनके लिए भी बनता है- क्या केवल कुछ चुनिंदा मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों को चुन-चुनकर गिरफ्तार करने भर से सिस्टम सुधर सकता है? आपके हिसाब से 2014 एक नए युग की शुरुआत थी। लेकिन यह युग भी उस ईच्छाशक्ति को दर्शाने से चूक गया, जो 1947 के समय चूका था।
बहरहाल, देश के 1,016 ब्राइटेस्ट टैलेंट का हमारे सिस्टम में स्वागत है... उन्हें करोड़-करोड़ बधाइयां!!! उम्मीद करते हैं कि 'सत्यमेव जयते' ये दो शब्द कुछ दिन तक तो उनके जेहन में रहेंगे।
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बुधवार, 10 अप्रैल 2024

शुक्र है, चुनाव होते रहते हैं... इससे विकसित देशों के बर-अक्स हमें हमारी जमीनी हकीकत पता चलती रहती है...!!!

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By Jayjeet

सुप्रीम कोर्ट ने कल एक छोटी-सी व्यवस्था देते हुए कहा है कि मतदाताओं को उम्मीदवारों की हर चल सम्पत्ति के बारे में जानने का अधिकार नहीं है। इसलिए हलफनामे में इसका खुलासा करने की भी दरकार नहीं है।
अदालत ने बिल्कुल सही फरमाया है। आखिर हम मतदाता ऐसी चीजों के बारे में जानकर करेंगे भी क्या? एडीआर नामक एक संस्था है। यह आए दिन फालतू की रिपोर्ट जारी करती रहती है कि फलाना उम्मीदवार इतना करोड़पति, फलाना के खिलाफ इतने अपराध... हमें इन आंकड़ों से कोई लेना-देना ही नहीं है। अगर हमें यह पता भी चल जाए कि अमुक की सम्पति पांच साल में बढ़कर पचास गुना हो गई है, वह भी गलत तरीकों से, तब भी हम क्या करते हैं? क्या उसे वोट नहीं देते हैं? वैसे भी हर क्षेत्र के मतदाताओं को पता ही होता है कि उसका उम्मीदवार कितना करोड़पति, कितना अरबपति है, कितना बड़ा भूमाफिया है, कितना भ्रष्ट है, उसके खिलाफ कितने संगीन मामले दर्ज हैं। पर इससे मतदाताओं को रत्ती भर भी फर्क पड़ता है? फिर यह बात किसी हलफनामे में या रिपोर्ट में भी आ जाए तो क्या? मतदाता तो केवल यह देखता है कि किस उम्मीदवार ने कितने भंडारे करवाए, कितनी इफ्तार पार्टियां की, कितने मंदिरों को दान दिया, या अंदरखाने कितनी मस्जिदों के लिए पैसे की व्यवस्था की।
कुल मिलाकर मतदाता के काम की बस एक ही चीज है- उम्मीदवार की जाति या उसका धर्म क्या है। वह इसी आधार पर मतदान करता है, तो उसे बस यही जानने का अधिकार होना चाहिए। कोर्ट से निवदेन है कि वह हलफनामे में चल-अचल सम्पत्ति, अपराध के विवरण जैसी गैर जरूरी चीजों का उल्लेख करवाना ही अनिवार्य रूप से बंद करवा दें। बस, एक ही विवरण रखें- उम्मीदवार का धर्म क्या है? जाति क्या है? उप जाति क्या है? और उप जाति की भी कोई उप-उप जाति हो तो वो...। बस, इतने भर से हमारा काम चल जाएगा। हम वोट दे आएंगे। हम ऐसे ही वोट देते रहे हैं और देते रहेंगे।
शुक्र है, हमारे देश में बीच-बीच में चुनाव होते रहते हैं। इससे हमें यह पता चलता रहता है कि विकसित देशों के बर-अक्स हम कितने पानी में हैं! नहीं तो नेता लोग तो विकसित विकसित कहके न जाने कहां-कहां के सपने दिखाते रहते हैं...!!

मंगलवार, 9 अप्रैल 2024

राहुल का एक अहम सवाल.... मगर पहले खुद जवाब देना होगा!!!

 

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By Jayjeet

इस शाश्वत सत्य से कौन इनकार करेगा कि जब आप सामने वाले पर एक उंगली उठाते हैं तो तीन उंगलियां आपकी ओर भी उठती हैं। कल मप्र के मंडला में राहुल गांधी की एक चुनावी सभा में यही दृश्य था। उन्होंने  एक बड़ा महत्वपूर्ण सवाल पूछा था। सवाल यह था कि हिंदुस्तान की बड़ी कंपनियों के मालिकों में, उनके सीनियर मैनेजमेंट में, बड़े-बड़े पत्रकारों में, बड़े-बड़े एंकरों में आखिर आदिवासी कितने हैं? इसका जवाब भी खुद ही दिया- एक भी नहीं। आरोप रूपी यह सवाल मोदी सरकार पर लक्षित था, लेकिन चिलचिलाती धूप में इसकी बड़ी-सी छाया उनकी ही धवल टी-शर्ट को लगभग पूरा ढंक रही थी।  

राहुल की कम से कम इस बात के लिए तारीफ की जा सकती है कि वे बड़े अच्छे सवाल, बड़े अच्छे से उठाते हैं। और इससे भी अच्छी बात यह है कि सवाल उठाते हुए वे जाने या अनजाने में विपक्ष के साथ-साथ अपनी पूर्ववर्ती सरकारों को भी कठघरे में खड़ा करने में कोहाही नहीं बरतते हैं। कल का सवाल भी कुछ इसी तरह का था। यह सवाल पूछते हुए एक उंगली तो उन्होंने मोदी सरकार पर उठाई थी, लेकिन तीन उंगलियां उन पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकारों पर भी उठ रही थीं, जिनका ज्यादातर नेतृत्व उनके ही परिवार के पास रहा है। 

मोदी सरकार से तो वैसे भी  किसी सवाल के जवाब की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि क्या इस सवाल का जवाब खुद राहुल भी देने का नैतिक साहस करेंगे? क्या वे जवाब देंगे कि आखिर 55 साल तक सत्ता में काबिज उनकी पार्टी की सरकारों ने भी आदिवासियों की हैसियत महज एक वोट बैंक से ज्यादा क्यों नहीं समझी? (बल्कि दलितों, और मुस्लिमों की भी)। तमाम सरकारों ने आदिवासियों और दलितों के लिए महज सरकारी नौकरियों में आरक्षण सुनिश्चित कर यह मान लिया और मनवा लिया कि वे प्रगति की राह पर आगे बढ़ जाएंगे। बेशक,आरक्षण से वंचित तबकों के बड़े हिस्से को एक हद तक आगे बढ़ाना संभव हो सका है, लेकिन घनघोर प्रतिस्पर्धा वाले कॉरपोरेट संसार में ये तरीके काम नहीं आ सकते। क्या कांग्रेस सरकारों ने इसके लिए उन्हें तैयार करने का प्रयास किया या तैयार करने की इच्छाशक्ति दिखाई? 

मान लेते हैं, वह जमाना राहुल का नहीं था। लेकिन अब तो पार्टी को कमोबेश राहुल ही लीड कर रहे हैं। उन्होंने जो मोदी सरकार से पूछा, क्या उसका समाधान उनके पास है? इसके जवाब के लिए कांग्रेस का घोषणा-पत्र देखिए। अधिकांश वादे सरकारी नौकरियों में भर्ती और आरक्षण तक सीमित है, जबकि आने वाला दौर कॉरपोरेट का ही है। तो फिर महज चुनावी जुमलेबाजी से क्या हासिल होगा? 

पुनश्च... मौजूदा मोदी सरकार अक्सर बड़े गर्व (आप चाहें तो अहंकार भी पढ़ सकते हैं) से कहती है कि हमने एक आदिवासी को राष्ट्रपति बनाया। 'बनाना' और 'बनना', इसमें जमीन-आसमान का फर्क है। कांग्रेस जब सत्ता में होती थी, तब वह भी कुछ ऐसे ही जुमलों का प्रयोग करती थी। जब तक हमारे राजनीतिक दल एहसान जताने वाले शब्दों से ऊपर उठकर वास्तविक सशक्तिकरण के प्रयास नहीं करेंगे, इन वर्गों का कुछ भी भला नहीं हो सकेगा और ये महज सियासी चारा बने रहेंगे। फिर चाहें कितने भी सवाल उठते रहे, उठाते रहें...! 


गुरुवार, 4 अप्रैल 2024

NOTA के तीन फायदे...!!!


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By Jayjeet Aklecha
लोकसभा चुनाव के लिए प्रचार-प्रसार शुरू हो गया है। हर पार्टी अपने-अपने पक्ष में तर्क-वितर्क-कुतर्क दे रही है। कुछ दिनों पहले नोटा (NOTA) को लेकर चर्चा हो रही थी। चर्चा के दौरान एक का तर्क था कि नोटा मतलब एक वोट की बर्बादी। बिल्कुल, सहमत! यह भी अपने वोट को बर्बाद करने के कई तरीकों में से एक तरीका है। पर नोटा के कई फायदे भी हैं...
पहला, NOTA को वोट देने से आप भविष्य में अपने साथ होने वाले किसी भी 'विश्वासघात' की फीलिंग से बच जाते हैं।
दूसरा, NOTA माने एक निर्जीव चीज। तो उससे कभी भी मोहभंग जैसा आपको फील नहीं होगा।
और तीसरी सबसे बड़ी बात, आप एक आत्मग्लानि से बच जाते हैं। आप वोट देने के चाहें लाख आधार ढूंढ लो- राष्ट्रवाद, हिंदुत्व, धर्मनिरपेक्षता, अपनी कौम, अपनी जाति, अपने वाला... फलाना-ढिकाना। मगर अंदर ही अंदर यह भी जानते हैं कि आपने वोट तो महाभ्रष्टाचारी या महासाम्प्रदायिक या महाजातिवादी या महावंशवादी या जमीनों के महामाफिया या शराब के महामाफिया या महागुंडे या इकोनॉमी के महासत्यानाशी या इसी तरह की महान विशेषताओं वाले गुणी व्यक्ति को दिया है...।
और अब सीरियस बात... लोकतंत्र में प्रतीकों का बड़ा महत्व है। जिस युग में भी 25 फीसदी वोट NOTA को मिलने लगेंगे, बस उस युग से प्रदेश, देश और जनहित में पॉलिसियों के बदलने की युगांतकारी शुरुआत होगी...।
लोकतंत्र में वोट सबसे बड़ी ताकत है और शुक्रिया लोकतंत्र कि उसने NOTA के रूप में इससे भी बड़ी ताकत थमाई है। बस, उन अच्छे दिनों का इंतजार है, जब यह ताकत तमाम महागुणी नेताओं के चेहरों पर तमाचे के रूप में अपनी छाप छोड़ने लगेगी।
तब तक सारे महागुणी नेता हम मतदाताओं को Take It For Granted ले सकते हैं।

बुधवार, 3 अप्रैल 2024

शुक्र है, खास लोगों को पता तो चला कि आम लोगों के साथ क्या-क्या होता है...!!

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By Jayjeet

यह मप्र के एक मंत्री पुत्र की तस्वीर है, जिस पर गुंडागर्दी करने का आरोप है। उधर, मंत्री पुत्र का आरोप है कि उसे पुलिस ने उसी तरह पीटा जैसे आम गुंडों को पीटते हैं। हालांकि इस पुलिसिया समाजवाद का खामियाजा चार पुलिसकर्मियों को भुगतना पड़ा और उन्हें सस्पेंड होना पड़ा।
खैर मंत्री पुत्र और पुलिस पर लगे आरोप-प्रत्यारोपों में मेरी कोई खास दिलचस्पी नहीं है। इस पूरे वाकये में मुझे सबसे दिलचस्प बात लगी मंत्री पुत्र का बयान - 'पुलिस ने मेरे साथ ऐसा किया तो आम लोगों के साथ क्या करती होगी?' यह अहंकार का नेक्स्ट लेवल है। केवल पिताश्री मंत्री हैं तो आप 'आम' से ऊपर हो गए...! इससे एक दिन पहले मंत्रीजी का अखबारों में छपा बयान भी पढ़ लेते हैं, जब वे अपने प्रिय बेटे को छुड़ाने के लिए थाने पहुंचे थे- 'मंत्री के बेटे के साथ पुलिस का यह व्यवहार है तो पुलिस आम जनता के साथ क्या करती होगी।'
शु्क्र है, इन खास लोगों को कुछ-कुछ तो पता चला कि आम लोगों के साथ क्या-क्या होता है!!! लेकिन अब भी पूरा पता नहीं चला है। नया अघोषित नियम तो यह कहता है कि अगर किसी आम आदमी के परिवार का कोई नालायक बेटा कोई गलती कर देता है तो प्रशासन उसके घर पर या घर के अवैध हिस्सों पर बुलडोजर चलाने में देर नहीं करता है। खबरों के मुताबिक इसी मंत्री पुत्र के आदरणीय पिताश्री ने भोपाल की एक पॉश कॉलोनी में आम लोगों के लिए बने एक बगीचे पर कब्जा कर रखा है। क्या सिस्टम कम से कम उस पर कब्जे पर ही बुलडोजर चलाने की हिम्मत करेगा? उम्मीद है, बिल्कुल नहीं!!
आम लोगों के वोटों से खास बने लोगों को आम लोग बस उस समय याद आते हैं, जब सिस्टम आमवाली पर ऊपर आता है। क्या हम आम लोगों को प्रार्थना करनी चाहिए कि बीच-बीच में, जस्ट फॉर ए चेंज, ऐसी आमवाली पर सिस्टम आता रहे, ताकि आम लोगों के साथ क्या-क्या होता है, इसका कुछ-कुछ इल्म कम से कम ऐसे खास लोगों को ऐसे ही होता रहे।

शनिवार, 16 मार्च 2024

गब्बर, चुनाव और साम्बा की होशियारी...!

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( Disclaimer: होली पर गब्बर घिस-घिसकर बहुत घिसा-पिटा हो गया है, मगर फिर भी ऐसे घिसे-पिटे सब्जेक्ट वैसे ही चलते रहते हैं, जैसे घिसे-पिटे नेता...। तो इसे पढ़कर वैसे ही भूल जाइए, जैसे हम इलेक्टोरल बॉन्ड के महाघोटाले को भूल जाएंगे...)
  

By Jayjeet Aklecha

गब्बर को गलतफहमी है कि 'होली कब है, कब है होली' जैसा कुछ कहने के बजाय 'चुनाव कब है, कब है चुनाव' कहने से उसे चुनाव का टिकट मिल जाएगा। टिकट दल बदलने से मिलता है, जुमले बदलने से नहीं। और उसे इस बात की और भी गलतफहमी है कि डकैत होना उसकी एडिशनल क्वालिफिकेशन है। डकैत की ड्रेस पहनने भर से टिकट मिल जाता तो इलेक्टोरल बॉन्ड की डकैती की जरूरत ही क्यों होती! सोचने की बात है...! गब्बर ने अपनी जात नहीं बताई... डकैत तो डकैत होता है। उसकी क्या जात और क्या पात? लो, ऐसी नैतिकता का ऐसा झंझट तो अपन वोटर लोग भी नहीं पालते और ये डकैत होकर पाले हुए हैं। शायद, इसीलिए नेताओं के बीहड़ों में इसके डकैतपने की कोई औकात नहीं है। तो टिकट कैसे मिलेगा, कैसे मिलेगा टिकट? भाईसाब, रामगढ़... मोबाइल में घुसे पड़े नल्ले साम्भा के मुंह से कुछ फूटा...। पहाड़ी की चोटी पर अब वह केवल नेटवर्क के मारे ही बैठता है। क्याssssss? रामगढ़ssssss। रामगढ़ का कनेक्शन बताइए और टिकट पाइएsssssssss। साम्भा भी उतना ही जोर से चिल्लाया। वाह, साम्भा के मुंह से पहली बार कोई कायदे की बात फूटी है। टीवी चैनलों पर न्यूज टाइप की चीजें देखकर आदमी ज्ञानी भी हो लेता है... मॉरल ऑफ द स्टोरी फ्रॉम द ग्रेट साम्बा...जिसके पास धेले का भी काम नहीं, वह न्यूज चैनलों पर एंटरटेनमेंट जरूर करें। बीच-बीच में गजब का ज्ञान भी मिल जाता है। चलते-चलते... कांग्रेस तो दो बोरी गेहूं के बदले ही टिकट देने को तैयार है, मगर साम्भा ने चेताया, भाई साब ले मत लेना, अभी तो आप जमानत पर बाहर है। वह भी जब्त हो जाएगी। एक तो कांग्रेस, ऊपर से ईडी का झमेला...। (देखो तो जरा साम्भा को, नीम और करेला की कहावत का इल्म भी आ गया... )

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रविवार, 10 मार्च 2024

कांग्रेस की आत्मा तो अजर-अमर है! बस देह बदलकर भाजपा में प्रवेश कर रही है...!!

 

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By Jayjeet Aklecha

 शुरुआत मशहूर व्यंग्यकार शरद जोशी जी की इन पंक्तियों से... कांग्रेस अमर है, वह मर नहीं सकती। उसके दोष बने रहेंगे और गुण लौट-लौट कर आएंगे। जब तक पक्षपात, दोमुंहापन, पूर्वग्रह, ढोंग, दिखावा, सस्ती आकांक्षा और लालच कायम है, इस देश से कांग्रेस को कोई समाप्त नहीं कर सकता। कांग्रेस कायम रहेगी।


नित दिन जब खबर आती है कि अमुक कांग्रेसी ने भाजपा ज्वॉइन कर ली है तो यह भाजपा मुक्त भारत की दिशा में एक और ठोस कदम होता है। क्या कांग्रेसियों ने साजिश रच रखी है भाजपा को खत्म करने की? वाकई, राजनीति में कांग्रेसियों का कोई मुकाबला नहीं! ऐसा जाल बिछाया कि कांग्रेस मुक्त भारत करते-करते भाजपाइयों ने अनजाने में देश को भाजपा मुक्त कर दिया।

मैं उस भविष्य की ओर देख रहा हूं, जब देश में केवल दो पार्टियां होंगी - भाजपा () और भाजपा (सी) यानी भाजपा (ओरिजिनल) और भाजपा (कांग्रेस) कई लोगों को आशंका और उम्मीद है कि भविष्य में हमारा भारत महान चीन की तर्ज पर एक पार्टी सिस्टम पर जा सकता है और वह पार्टी होगी भाजपा (सी) यकीन मानिए, इसमें भाजपा की केवल देह होगी, भीतर आत्मा तो कांग्रेस की ही होगी।
 

आजादी के बाद कांग्रेस ने जो संघर्ष किया है, उसे भाजपा कभी नहीं समझ सकती।। शरद जोशी जी द्वारा गिनाए गए नैतिक पतन के तमाम आदर्श उसे स्वयं अपने हाथों से गढ़ने पड़े। भाजपा किस्मतवाली रही कि उसे नैतिक पतन के ये गुण विरासत में मिल गए। उसे आजादी के लिए संघर्ष करना पड़ा और ऐसे उच्च आदर्शों के लिए। बस, उसे कांग्रेस को अपने भीतर समाने की जरूरत थी। बेशक, यह बेहद मुश्किल था। पर भाजपा को साधुवाद! उसने कांग्रेस के गुणों को अपनाने में 10 साल भी नहीं लगाए।

आज अटल जी जहां कहीं भी होंगे, क्या सोच रहे होंगे? दु:खी हो रहे होंगे या खुश हो रहे होंगे? मुझे लगता है कि वे यह सोच-सोचकर खुद को भाग्यशाली मान रहे होंगे कि वे ' पार्टी विद डिफरंस' की ऐसी मौत अपनी आंखों से देखने से बच गए। आडवाणीजी एक बार फिर से अटलजी की किस्मत पर रश्क कर सकते हैं...!

समापन भी शरद जोशी की पंक्तियों से ही... दाएं, बाएं, मध्य, मध्य के मध्य, गरज यह कि कहीं भी किसी भी रूप में आपको कांग्रेस नजर आएगी। इस देश में जो भी होता है, अंततः कांग्रेस होता है। जनता पार्टी (आज पढ़ें भारतीय जनता पार्टी) भी अंततः कांग्रेस हो जाएगी।

 (Disclaimer : विचार व्यक्तिगत हैं।)

 

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