रविवार, 28 मार्च 2021

Humor & Satire : बाहुबली गब्बर का रामगढ़ कनेक्शन, टिकट पर दावा हुआ मजबूत

 

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By A. Jayjeet

आज रिपोर्टर बड़ी जल्दी में था। सोशल मीडिया पर 'बायकॉट चाइनीज पिचकारी' टाइप कैम्पेन शुरू होने से पहले ही वह मेड इन चाइना की कोई सुंदर-सुशील पिचकारी खरीद लेना चाहता था। लेकिन जल्दबाजी में उसका स्कूटर फिसला और पलक झपकते ही उसके शरीर से आत्मा निकलकर पास स्थित एक बरगद पर उल्टी टंग गई।

रिपोर्टर की आत्मा कुछ देर यूं ही लटकी रही। झूला झूलने का नया एक्सपीरियंस उसे थ्रील दे रहा था। अचानक उसे एक आवाज सुनाई दी - चुनाव कब है, कब है चुनाव?

रिपोर्टर की आत्मा बुदबुदाई, अरे, ये आवाज तो कुछ जानी-पहचानी लग रही है। सालों पहले शोले देखी थी। उसमें भी तो ऐसी ही आवाज थी।

रिपोर्टर का अनुमान सही था। वह गब्बर सिंह की आत्मा थी।

गब्बर सिंह नमस्कार, पेड़ पर सीधे होते हुए रिपोर्टर की आत्मा बोली।

लगता है आज किसी समझदार इंसान की आत्मा से बात हो रही है... कौन हो तुम? गब्बर की आत्मा मुस्कुराई।

आप सही कह रहे हैं। मैं रिपोर्टर हूं...।

अरे वाह रिपोर्टर महोदय, आपको तो जरूर पता होगा कि चुनाव कब है? मैं कब से पूछा जा रहा हूं इन हरामजादों की आत्माओं से, कोई बता ही नहीं रहा..

पर आपको चुनावों से क्या लेना-देना? आपको तो हमेशा होली से ही मतलब होता है।

अब क्या है, मैं होली खेल-खेलकर बोर हो गया हूं। अब जी चाह रहा है कि चुनाव चुनाव खेलूं...। सुना है ठाकुर की जमीन पर भी चुनाव हो रहे हैं... उनसे तो पुराना हिसाब चुकता करना है...

गब्बर, आपको ये अधकचरी जानकारी क्या आपका वही साम्भा देता है? उसको बोलो, कुछ काम-धाम करें। दिनभर बैठे-बैठे अपनी सड़ी हुई दुनाली ही साफ करता रहता है…

हम्म… कुछ करता हूं इस स्साले का... तो क्या ठाकुर की जमीन पर चुनाव नहीं हो रहे?

ठाकुर की जमीन पर चुनाव हो रहे हैं, लेकिन यह आपके वे वाले ठाकुर मतलब ठाकुर बलदेव सिंह नहीं है। ये ठाकुर साहब तो ठाकुर रवींद्रनाथ टैगोर जी हैं। इनके बंगाल में चुनाव है। राष्ट्रगान तो आपको मालूम नहीं होगा। तो उनके बारे में और ज्यादा क्या बताऊं...

रिपोर्टर भाई, आपकी तो सेटिंग-वेटिंग होगी। तो चुनाव का एक टिकट दिलवाइए ना? गब्बर की आत्मा ने पान मसाले का पाउच मुंह में उड़ेलते हुए कहा। शायद अब खैनी मसलनी छोड़ दी है...

टिकट ऐसे नहीं मिलता है। माल-पानी है क्या?

माल-पानी की क्या कमी। कालिया की आत्मा इसी काम में लगी रहती है। अनाज का धंधा उसका खूब फल-फूल रहा है।

क्या...? वह अब भी अनाज की बोरियां लूटने के टुच्चे काम में ही लगा है‌? लेकिन अनाज की बोरियों की छोटी-मोटी लूट से क्या होगा?

हां, वो लूट तो अनाज की बोरियां ही रहा है, पर अब वैसे नहीं लूटता है। उसने आढ़तियों का कॉकस बना रखा है। अनाज के गोडाउनों की पूरी की पूरी चेन है उसकी। तो माल-पानी की कोई कमी नहीं है। बस, टिकट मिल जाए।

लेकिन गब्बर जी (गब्बर के आगे ‘जी’ अपने आप लग गया...), अच्छा-भला पुराना आपराधिक रिकॉर्ड भी चाहिए, टिकट पाने के लिए...

यह सुनते ही गब्बर सिंह की आत्मा ने वैसा ही जोरदार अट्‌टहास किया, जैसा उसने अपने तीन साथियों को 'छह गोली और आदमी तीन, बहुत नाइंसाफी है ये' जैसा कालजयी डायलॉग बोलकर उड़ाने के बाद किया था। फिर बोली - अरे ओ साम्भा, कितना इनाम रखे थे सरकार हम पर?

पूरे पचास हजार.... पास के ही एक दूसरे पेड़ पर बैठी साम्भा की आत्मा बड़े ही गर्व से बोली।

सुना... पूरे पचास हजार....और ये इनाम इसलिए था कि यहां से पचास पचास कोस दूर गांव में जब बच्चा रात को रोता है तो...

रिपोर्टर बीच में ही टोकते हुए – अब ये फालतू का डायलॉग छोड़िए। पचास हजार में तो आजकल पार्टी की मेंबरशिप भी नहीं मिलती। और ये बच्चा रोता है डायलॉग को भी जरा अपडेट कर लो। अब बच्चा रोता कम है, मां-बाप को रुलाता ज्यादा है। और बाय द वे, अगर रोता भी है तो मां उसे मोबाइल पकड़ा देती है... बच्चा चुप।

तो रिपोर्टर महोदय, आप होशियार हो, कुछ आप ही रास्ता सुझाओ...

आपको अपना थोड़ा मेकओवर करना होगा। अपनी डाकू वाली इमेज को बदल दीजिए।

अरे, यह तो मेरी पहचान है। इसको कैसे बदल सकता हूं? गब्बर की आत्मा चीखी।

पूरी बात तो सुनिए। डाकूगीरी छोड़ने का नहीं बोल रहा, वह तो पॉलिटिक्स का कोर है। केवल इमेज बदलनी है। ये मैली-कुचेली ड्रेस की जगह कलफदार सफेद रंग का कुर्ता-पायजामा या कुर्ता-धोती टाइप ड्रेस पहननी है। अपनी पिस्तौल को कुर्ते के अंदर बंडी में डालकर रखना है, हाथ में नहीं पकड़ना है। हाथ में रखिए बढ़िया वाला आई-फोन। ऐसा ही मेकओवर अपने साथियों का भी कीजिए।

पर रिपोर्टर महोदय, कुर्ता-धोती पहनकर मैं घोड़ा कैसे दौड़ाऊंगा? गब्बर का सहज सवाल।

घोड़ों को भेजिए तेल लेने। अब आप चलेंगे एसयूवी में। नेता बड़ी एसयूवी में ही चलता है। आपके खेमे में 10-20 एसयूवी होनी ही चाहिए। कालिया-साम्भा टाइप के साथी भी इन्हीं एसयूवी में घूमेंगे। और हां, टोल नाकों पर टैक्स नहीं देना है, आपके साथी इस बात का खास ध्यान रखें। जो नेता टोल नाके पर डर गया, समझो घर गया। कालिया से भी कहिए कि अनाज के साथ थोड़ा-बहुत ड्रग्स का धंधा भी करें। जब आपको नेता बनना ही है तो खम ठोंककर पूरा ही बनिए ना...

तो इससे टिकट मिल जाएगा? गब्बर के दिमाग में राजनीति का कीड़ा अब तेजी से कुलबुलाने लगा था।

अपने बायोडाटा में इस बात का उल्लेख करना मत भूलना कि आप 'रामगढ़' से बिलॉन्ग करते हैं। यह आपकी एडिशनल क्वालिफिकेशन है। इससे आपको ये नहीं तो वो, कोई न कोई पार्टी तो टिकट दे ही देगी। रिपोर्टर ने अपना एडिशनल ज्ञान बघारा।

लेकिन अब भी मुझे ज्यादा समझ में नहीं आ रहा। इतना दंद-फंद क्यों करना भाई?

आप ज्यादा दिमाग मत खपाइए। दिमाग खपाने वाले लोग सच्ची राजनीति नहीं करते। मैंने जैसा कहा, वैसा कीजिए। अब आप मुझे गोली मारकर फिर से नीचे पहुंचाइए। बच्चे, पिचकारी का इंतजार कर रहे होंगे। कल होली है ना...!

और रिपोर्टर ने अपना सिर भावी नेता के आगे झुका लिया, गोली खाने को...।

देखें यह मजेदार वीडियो ... गब्बर सिंह के मैनेजमेंट फंडे...

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शुक्रवार, 26 मार्च 2021

Humor & Satire : कोरोना को अब राजनीति से डर नहीं लगता, मास्क लगाने की वजह का किया खुलासा

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इस व्यंग्य को वीडियो में सुनने के लिए यहां क्लिक करें...

(साल भर में कितने बदल गए कोरोना के अनुभव, दूसरी बार दिए एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में कोरोना ने साझा की कई मजेदार बातें... )

By Jayjeet

आज से साल भर पहले जब कोरोना भारत आया तो उस समय यही रिपोर्टर था, जिसने मीडिया जगत में पहली बार किसी वायरस का इंटरव्यू लिया था (पढ़ें वह इंटरव्यू यहां)। लॉकडाउन की पहली बरसी पर रिपोर्टर ने फिर से उसी कोरोना को ढूंढ निकाला। साल भर में वजन थोड़ा बढ़ गया है। डायबिटीज बॉर्डर लाइन पर है। दांत पीले से हैं। शायद पान-मसाला खाना भी शुरू कर दिया है। पहले इंटरव्यू में उसने राजनीति पर बात करने से साफ इंकार कर दिया था, लेकिन इस बार भारतीय राजनीति पर खुलकर बातें की। दोबारा लिए गए इंटरव्यू में कोरोना ने ढेर सारे अनुभव साझा किए।

रिपोर्टर : क्या बात है कोरोना जी, बड़े हेल्दी-शेल्दी हो गए हैं। लगता है पानी जम गया यहां का...

कोरोना : हम्म... खान-पान तो चेंज हुआ ही है। वहां बीजिंग में बेस्वाद नूडल्स और सफेद चावल खाते-खाते तंग आ गया था। यहां की फितरत में ही है तरी माल खाना। अब बीते दिनों राजनीतिक कार्यक्रमों और शादियों में भी काफी ज्यादा जाना हुआ। तो इस वजह से वजन बढ़ गया। फिर चाइना में ढेर-सारे नियम कायदों का टेंशन रहता था। यहां नियम-कायदों का ढेला भी टेंशन नहीं। जहां थूकना हो थूको, जो मर्जी हो वह करो। तो इससे भी फर्क पड़ा। अब वजन को लेकर मैं दो-चार दिन में बाबाजी से मिलता हूं...

रिपोर्टर : बाबाजी, मतलब बाबा रामदेव?

कोरोना :
 हां, वही वाले। सोच रहा हूं कि वजन घटाने वाले कुछ आसन उन्हीं से सीख लूं।

रिपोर्टर : मेरी सलाह है, उनसे बच के रहिए। कोई उन्होंने कोई दवाई बनाई है। दावा है कि उससे आप जैसे सैकड़ों निपट जाएंगे।

कोरोना : आप कोरोनिल की बात कर रहे हो? घंटा डरे उससे... सॉरी मुंह से निकल गया ऐसा अप्रिय शब्द।

रिपोर्टर : मतलब, यहां की भाषा में भी प्रवीण हो रहे हैं आप.. बहुत बढ़िया। अच्छा बीते दिनों आपकी नेताओं से भी खूब मुलाकातें हुईं। उनसे मुलाकात का अनुभव कैसा रहा?

कोरोना : हां, कई नेताओं से मुलाकात हुई। मोटा भाई, नड्डा जी, शिवराज जी। कई कांग्रेसी नेता भी थे।

रिपोर्टर : उनसे कोई रोचक बात हुई हो तो साझा कीजिए।

कोरोना : हां, शिवराज जी मुझसे मजाक में कहा था कि भाई कोरोना, हम नेताओं के गले मत पड़ो। हमारा तो कुछ ना होने वाला। मुझे आपकी चिंता हो रही है। वाह, बड़ा ही मजेदार आदमी हैं आपका मामू, आई मीन मामाजी...

रिपोर्टर : कांग्रेसी नेताओं से भी आपकी चर्चा हुई होगी।

कोरोना : हां, पर सब स्साले हूं हूं करते रहे। ज्यादा पूछो तो कहते राहुल भैया का वो डॉगी, क्या नाम है उसका पीडी, उससे पूछके बताएंगे। अब ये क्या बात हुई भला! इसीलिए कांग्रेस की ऐसी औकात हो रही है।

रिपोर्टर : किसी सेलेब्रिटी के साथ कोई खट्टा-मीठा अनुभव रहा?

कोरोना : मत पूछो भैया। लॉकडाउन की बात है। रोड पे मजदूरों के रेले देख-देखके थोड़ा डिप्रेस हो रहा था। तो सोचा कि चलो किसी खूबसूरत एक्ट्रेस से मिल आते हैं। जस्ट फॉर चेंज, फील गुड के लिए। तो मैं एक एक्ट्रेस के बंगले पर गया। वह बालकनी में खड़ी थी। मैं दीदार के लिए बॉलकनी की रैलिंग पर उसके और भी नजदीक पहुंच गया। उसने चेहरे पर मास्क लगा रखा था और वो मोबाइल पर बात कर रही थी। मैं थोड़ा और पास खिसका। और भी पास.. बिल्कुल नजदीक पहुंचने ही वाला था कि तभी हवा के झोंके से उसका मास्क निकल गया। अरे बाप रे...उसका चेहरा देखकर तो मेरा दिल धक्क बैठ गया। आप विश्वास ना करेंगे, पर मुझे गहरा सदमा लगा था। यहां तक सोचने लगा था कि चीन निकल जाऊं और वॉल ऑफ चाइना से लटक के जान दे दूं। फिर थोड़ा नार्मल हुआ तो ध्यान आया कि मेरे कारण तो लॉकडाउन चल रहा है। तो मेकअप-शेकअप वाले कहां से आएंगे। बेचारी उस एक्ट्रेस का क्या कसूर? बस इतना ही...

रिपोर्टर : पिछले साल मैंने ही आपका पहली बार इंटरव्यू लिया था। उसके बाद अरनब गोस्वामी ने आपसे बात करने की कोशिश की थी। आपके साथ हॉट टॉक भी हुई थी। तफ्सील से बताइए ना कि क्या हुआ था?
कोरोना : अरनब ने फोन करके अपनी वाली स्टाइल से पूछा - नेशन वांट्स टु नो कि तू इस समय भारत में क्या कर रहा है? और तू यहां से कब जाएगा? अब तू-तकारा भले ही उसके स्टूडियो में आने वाले लोग सहन कर लेते होंगे, अपन को पसंद नहीं। तो अपन ने भी उधर से बोल दिया - मैं तेरे बाप का नौकर नहीं जो तुझे जवाब दूं। बस इतना सुनते ही अरनब इतने जोर से चीखे कि बाजू वाले स्टूडियो की एक छत ढह गई।

रिपोर्टर : आम भारतीयों को लेकर आपका क्या विचार है?

कोरोना : बहुत ही गजब लोग हैं। मैं यहां आतंक फैला रहा था और भारतीय लोग मुझ पर मीम्स, जोक्स बना रहे थे। मतलब, नॉन सीरियसनेस की हद है यह तो।

रिपोर्टर : अगला सवाल यह है कि...

कोरोना बीच में ही टोकते हुए ... : सर, अब मुझे ड्यूटी पर भी जाना है...
रिपोर्टर : हां, मैं समझता हूं, लोगों को संक्रमित करने जाना होगा...

कोरोना : संक्रमित करने नहीं भाई, सब्जी लेने जाना है... अब आपको क्या बताऊं। पिछली देवउठनी पर मैंने एक सुंदर-सुशील कोरोनी से शादी कर ली। तो पहली ड्यूटी तो यही है रोज सुबह उठकर सब्जी लेने जाना, बीवी को शॉपिंग-वॉपिंग करवाना। इसी में थक जाता हूं...

रिपोर्टर : चलिए, अंतिम सवाल। एक जिज्ञासा है। मुझसे बातचीत करते समय आपने भी मास्क पहन रखा है। दो गज की दूरी भी मैंटेन कर रहे हैं। ऐसा क्यों?

कोरोना : छह महीने पहले मैं भी इंसानी वायरस से संक्रमित हो चुका हूं। मुंह में गाली-गलौज, दिल में बेईमानी, एक-दूसरे के प्रति नफरत के भाव, बहुत सारी इंसानी चीजें आ गई हैं। तो मेरे डॉक्टर ने सचेत किया है कि अगर दोबारा मैं संक्रमित हुआ तो फिर इंडियन पॉलिटिक्स करने के अलावा मैं किसी काम का ना रहूंगा। इसीलिए बचकर रहता हूं... चलता हूं। चाइना लौटने से पहले अगर इंसानी संक्रमण के दोबारा अटैक से बच सका तो फिर मिलूंगा...।


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रविवार, 21 मार्च 2021

Political Satire : जान बचाकर भागा रिपोर्टर, जब घोषणा पत्र ने सुना दी कविता ...

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By Jayjeet

दो दिन पहले ममता दीदी ने अपना घोषणा-पत्र जारी किया था। आज बीजेपी ने भी जैसे ही घोषणा-पत्र जारी किया, रिपोर्टर क्विक इंटरव्यू के चक्कर में तुरत-फुरत घोषणा-पत्र के पास पहुंच गया...

रिपोर्टर : बधाई हो, राजनीतिक दलों ने फिर से आप पर भरोसा जताया है...

घोषणा पत्र : हां जी, संतोष की बात है ये। नेता लोग अब तक मुझे भूले नहीं हैं। कभी वचन पत्र तो कभी संकल्प पत्र, अलग-अलग नामों से जारी कर ही देते हैं।

रिपोर्टर : लेकिन हर बार आप जनता के लिए तो छलावा ही साबित होते हैं?

घोषणा पत्र : जनता का मुझसे क्या लेना-देना?

रिपोर्टर : आपको जारी तो आम जनता के लिए ही किया जाता है ना?

घोषणा पत्र : अच्छा...? तो पहले मेरे एक सवाल का जवाब दीजिए।

रिपोर्टर : वैसे तो सवाल मैं लिखकर लाया हूं। पूछने का नैतिक अधिकार भी मेरा ही है। फिर भी एक ठौ पूछ लीजिए।

घोषणा पत्र : इस साल न्यू ईयर पर आपने कोई रिजोल्यूशन जैसा कुछ लिया था?

रिपोर्टर : हां, लिया तो था। बड़ा अच्छा-सा था कोई, पर अब याद नहीं आ रहा।

घोषणा : देख लो, ये है आम जनता की स्थिति। अपने रिजोल्यूशन, संकल्प तो याद रहते नहीं। और बात मेरे संकल्पों की करती है।

रिपोर्टर : फिर भी अपनी कसम खाकर कहिए कि अब आप केवल मखौल बनकर नहीं रह गए हैं।

घोषणा-पत्र : हां, कसम खाकर कहता हूं कि मैं मखौल बनकर नहीं रह गया हूं। मेरे अक्षर-अक्षर में ईमानदारी है, सच्चाई है, नैतिकता है, वगैरह-वगैरह...

रिपोर्टर (थोड़ी ऊंची आवाज में) : लो जी, कसम खाकर भी सरासर, खुल्लमखुल्ला झूठ बोल रहे हों? शरम नहीं आती आपको?

घोषणा-पत्र (मुस्कराते हुए) : सही कह रहे हों मित्र। शरम ही तो नहीं आती हमें। क्यों आएगी शरम बेचारी? नेताओं के साथ रहते-रहते हमने उम्र गुजार दी है सारी। हमारे बाप-दादाओं के जमाने से चली आ रही है नेताओं के साथ यारी। अब चल यहां से रिपोर्टर महोदय, बहुत हो गई तुम्हारी होशियारी। आज विश्व कविता दिवस भी है, ज्यादा पेल दूंगा तो पूरी रात दूर ना होगी मेरी कविता की खुमारी...।

रिपोर्टर : बस कर मेरे बाप... गलती हो गई आज। रिजोल्यूशन तो याद ना आया, पर आ बैल मुझे मार कहावत जरूर याद आ गई है। जा रहा हूं ...

Video : देखें गब्बर सिंह के मैनेजमेंट फंडे, कभी ना देखे होंगे, गब्बर की कसम...

शनिवार, 20 मार्च 2021

होली कब है, कब है होली : ऐसे ही 7 डायलॉग्स से सीखें गब्बर के मैनेजमेंट फंडे



By Jayjeet

ह्यूमर डेस्क। गब्बर सिंह केवल डाकू नहीं थे, बल्कि मैनेजमेंट के गुरु भी थे। वो तो केवल हम लोगों के दिमाग में मैनेजमेंट की बातें ठूंसने के लिए, हमें इंस्पायर करने के लिए उन्हें बंदूक उठानी पड़ी। 'होली कब है, कब है होली' (Holi kab he, kab he holi) जैसे उनके डायलॉग्स के जरिए सीखते हैं Guru Gabbar से मैनेजमेंट के कुछ फंडे ... 

1.होली कब है, कब है होली….
गुरु गब्बर अक्सर यह डायलॉग क्यों बोलते हैं? हमें यह सिखाने के लिए कि हमेशा भविष्य की प्लानिंग करके रखो। जो-जो इवेंट्स आने वाले हैं, उन्हें हमेशा दिमाग में रखो। साथ ही अपने लक्ष्य को ओझल मत होने दो। इसलिए बार-बार दिमाग को उंगली करते रहो, जैसे होली कब है, कब है होली… ।

2. जो डर गया, समझो मर गया…
गुरु गब्बर इसके जरिए यह कहना चाहते हैं कि आप चाहे कोई भी काम करो, आपको जिंदगी में रिस्क तो लेनी होगी। अगर आप रिस्क लेने में डर गए तो समझो आपके सपने भी उसी समय से मर गए।

3. यहां से पचास-पचास कोस दूर जब रात को बच्चा रोता है…
अपने इस बेहद इंस्पायरिंग डायलॉग के जरिए गुरु गब्बर दो बातें कहना चाहते हैं- एक, अपने ब्रांड/इमेज को इतना मजबूत बनाओ कि सब पर उसका प्रभाव हमेशा बना रहे। दूसरी, आपका अपना जो ब्रांड है, उस पर प्राउड करो, उसकी इज्जत करो। आप नहीं करोगे तो दूसरा भी नहीं करेगा।

4. अरे ओ साम्बा, कितना इनाम रखे है सरकार हम पर…
इसमें भी गुरु गब्बर खुद के ब्रांड को प्रमोट करने का ही ज्ञान दे रहे हैं। उनका कहना है कि बार-बार अपनी ब्रांडिंग करना आज के कॉम्पिटिशन के जमाने में बहुत महत्वपूर्ण है। नहीं करोगे तो कहीं के नहीं रहोगे।

5. कितने आदमी थे …
गुरु गब्बर कहना चाहते हैं कि अगर आपको अपने प्रतिस्पर्धी से आगे निकलना है तो पहले उसकी टीम और उसकी ताकत का आंकलन करना जरूरी है। इसीलिए वे बार-बार पूछते थे, कितने आदमी थे…

6. ले, अब गोली खा…
यहां गुरु गब्बर की प्रैक्टिकल सोच सामने आती है। वे यह कहना चाहते हैं कि कई बार ऑर्गनाइजेशन के हित में सख्त निर्णय भी लेने पड़ते हैं। यहां इमोशन वाला व्यक्ति फेल हो जाएगा। वैसे भी बीमार व्यक्ति को तो कड़वी गोली ही खिलाई जाती है।

7. छह गोली और आदमी तीन… बहुत नाइंसाफी है यह…
इसके पीछे गुरु गब्बर का सीधा-सा फंडा है – अगर आप लीडर की भूमिका में हैं तो अपने मातहतों को यह विश्वास दिलाते रहो कि आप केवल सही चीज में ही नहीं, नाइंसाफ टाइप की चीज में भी अपनी टीम के साथ है।

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देखे यह मजेदार वीडियो भी : 

रविवार, 14 मार्च 2021

Humor : राहुल का फनी इंटरव्यू ... हास्यास्पद सवालों के हास्यास्पद जवाब


 

राहुल का फनी इंटरव्यू ... हास्यास्पद सवालों के हास्यास्पद जवाब, पूरी गरिमा के साथ...

इसमें वे बता रहे हैं कांग्रेस को बचाने के अनूठे तरीके... उठा रहे हैं मोदी के आत्मनिर्भरता के नारे पर सवाल, कांग्रेसियों द्वारा दी गई कुर्बानी के बारे में भी दे रहे हैं लाजवाब तर्क... और एक सवाल उनकी समझदारी पर भी ...

(Disclaimer: इसका मकसद व्यक्तिगत कटाक्ष करना नहीं है, बल्कि इसके जरिए राजनीतिक व्यंग्य पैदा करना है।)

# rahul humour # rahul gandhi satire # congress satire


शनिवार, 13 मार्च 2021

#ओलागीरी : चाल-चलन में भी पक्का नेता ही निकला ओला बाबू

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By Jayjeet

मप्र, राजस्थान सहित कई प्रदेशों में कई जगहों पर ओले गिरे तो रिपोर्टर को तुरंत पहुंचना पड़ा एक ओले के पास...

रिपोर्टर : आप मुझे पहचान तो गए होंगे?

ओला : हां जी, ओले गिरने के बाद सबसे पहले किसान और फिर रिपोर्टर्स ही पहुंचते हैं। फिर बहुत बाद में पहुंचते हैं सरकारी अफसर…

रिपोर्टर :
 कुछ लोग आपकी नीयत पर सवाल उठा रहे हैं।

ओला : मैं सीधा-साधा ओला हूं। तिरछे सवाल क्यों पूछ रहे हों?

रिपोर्टर : कुछ लोगों का कहना है कि आप सरकारी अफसरों के साथ मिले हुए हों, ताकि फसलें खराब हों तो मुआवजे में उनका भी वारा-न्यारा हो सके।

ओला (रिपोर्टर की अज्ञानता पर हंसते हुए): अब तो मुआवजा सीधे किसानों के बैंक अकाउंट में जाता है। तो अफसरों का इसमें कुछ खास बचा नहीं है। मैं तो इसलिए गिरता हूं क्योंकि गिरना मेरी नियति है।

रिपोर्टर : अच्छा, तो आप स्वीकार कर रहे हैं कि आप गिरे हुए हों?

ओला : हां, पर गिरने का मेरी नीयत से क्या लेना-देना?

रिपोर्टर : गिरना आपकी सिफ़त है और गिरकर नुकसान पहुंचाना आपका शौक। यह सब बताता है कि कहीं न कहीं नेतागीरी से आपके पुराने संबंध हैं।

ओला : अच्छा, वैसे तो मेरा रंग भी सफेद है, नेताओं के सफेद झक्क कुरते की तरह। तो लगा दो मेरे नेता होने की अटकलें। अटकलबाजी के अलावा आप लोग कर भी क्या सकते हों?

रिपोर्टर : इसीलिए तो कह रहा था, अब तो मान लो कि आपमें और नेताओं में कोई अंतर नहीं है।

ओला : खुद को इंटेलेक्चुअल रिपोर्टर साबित करने के चक्कर में आप मुझे नेता साबित करके मेरा लगातार अपमान कर रहे हैं...

रिपोर्टर : परिस्थितिजन्य साक्ष्य यही इशारा कर रहे हैं। इसमें अपमान की क्या बात है!

ओला : धूप तेज हो रही है। लगता है मेरे जाने का टाइम आ गया है। तुम जैसे रिपोर्टर से बात करने से अच्छा है गायब हो जाना…

(और देखते ही देखते धूप में ओला पिघलकर गायब हो गया…)

रिपोर्टर : गिरकर तबाही के निशान फैलाना, फिर लोगों को खून के आंसू पिलाना…और फिर उन्हें उनके हाल पर छोड़कर नौ दो ग्यारह हो जाना… रंग-ढंग ही नहीं, चाल-चलन से भी तुम पक्के नेता ही निकले, ओला बाबू …

(और अपनी इमोशनल स्टोरी लिए रिपोर्टर निकल पड़ा संपादक के कैबिन की ओर ...)

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रविवार, 7 मार्च 2021

Video Jokes : जब आपदा में अवसर ही बन नई आपदा!

 


कोराना काल आपदा का काल था। इस काल में कई लोगों ने आपदा को अवसर में बदल दिया। लेकिन कुछ लोगों के लिए यह अवसर ही नई आपदा बन गई। कैसे, जानने के लिए देखें यह फनी वीडियो...

शनिवार, 6 मार्च 2021

Humor & Satire : 135 साल की बेबस कांग्रेस अम्मा से खास बातचीत, कहा- अब मुक्त होने का टाइम आ गया!

 

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By Jayjeet

आज रिपोर्टर का मन काम में नहीं लग रहा था। मन कुछ-कुछ कांग्रेसी हो रहा था। तो वह यूं ही 24 अकबर रोड पर टहलने चला गया। वहां के एक सुनसान इलाके में स्थित एक खंडहर इमारत, जिसे लोग आज भी कांग्रेस मुख्यालय के नाम से जानते हैं, के सामने से गुजरते हुए अचानक उसकी नजर एक पत्थर पर बैठी हुई एक बुढ़िया पर गई। टूटी हुई लाठी, झीने-से कपड़े, झुर्रियों में खोया-खोया चेहरा। हालांकि झुर्रियों के पीछे छिपे चेहरे पर हल्की-सी चमक यह भी बता रही थी कि इस बुढ़िया के कभी बड़े ठाठ रहे होंगे। खूब इज्जत, मान-सम्मान मिला होगा। पर अब चेहरे पर उपेक्षा का दंश है... रिपोर्टर पहले तो यह सोचकर डर गया कि चमगादड़ों से पटी इस इमारत में कहीं बुढ़िया के रूप में कोई भूत-वूत तो नहीं है। पर पैरे देखे तो सीधे थे। रिपोर्टर ने सुन रखा था कि भूत के पैर उलटे होते हैं। राहत की सांस ली। हिम्मत करके वह उस बूढ़ी अम्मा के पास पहुंच गया...

रिपोर्टर : आप इतने सुनसान से खंडहर में क्या कर ही हैं, अम्मा?

बुढ़िया ने नजरें ऊंची की, एनक पोंछी : कौन है, जो मुझसे इतने सालों के बाद बात कर रहा है?

रिपोर्टर : जी, मैं रिपोर्टर.. मैं भी सालों बाद इस खंडहर इमारत के सामने से गुजर रहा था तो आप दिख गईं। पहले तो मैं डर गया कि कहीं आप कोई भूत-वूत तो नहीं। फिर आपके पैरों से कंफर्म किया कि आप भूत ना हैं। आप कौन हैं?

बुढ़िया : तुम्हारा अंदाजा गलत था बेटा। मैं सीधे पैर वाली भूत ही हूं... (एक ठहाका)

(रिपोर्टर ढाई मिनट तक यूं ही निशब्द खड़ा रहा... भागना चाहता था, पर पैर वहीं जम गए...रिपोर्टर की हालत को वही समझ सकते हैं जिनका कभी भूतों से पाला पड़ा होगा। रिपोर्टर के होश में आने के बाद अब आगे पढ़ें आगे का इंटरव्यू...)

रिपोर्टर : आप भी अच्छा मजाक कर लेती हो अम्मा।

बुढ़िया : चलो मजाक ही मान लो, नहीं तो तुम्हारा भूत बन जाता। बताओ, तुम मेरे पास क्यों आए हो?

रिपोर्टर : ऐसा लग रहा है कि बहुत पहले किसी तस्वीर में आपको कहीं देखा है...

बुढ़िया : शायद तुमने अपने दादाजी या नानाजी के कमरे में लगी मेरी तस्वीर देखी होगी...

रिपोर्टर : हां, हां, बिल्कुल....याद आ गया। जब मैं छोटा था, उस समय दादाजी और उनके जितने भी दोस्त थे, उन सभी के घरों में आपकी तस्वीर लगी रहती थी।

बुढ़िया : पुराने जमाने में हर घर में मेरी तस्वीर लगी रहती थी....

रिपोर्टर : हां, उन तस्वीरों में आप बहुत ही सुंदर-शालीन नजर आती थीं। पर आप हैं कौन? आपने अपना परिचय नहीं दिया।

बुढ़िया : बेटा, अब मैं क्या परिचय दूं। परिचय के लिए कुछ बचा ही नहीं। फिर भी बता देती हूं, मैं कांग्रेस हूं... 135 साल की बुढ़िया। इसीलिए मैं खुद तो भूत कह रही थी.... अतीत वाला भूत..।

रिपोर्टर (आश्चर्य से) : अरे, अगर आप कांग्रेस हैं तो फिर 10 जनपथ पर जो एक संभ्रान्त महिता रहती हैं, अपने एक नन्ने-मुन्ने बालक के साथ, वो कौन हैं? मैं तो उन्हें ही कांग्रेस समझता आया हूं। सभी उन्हें ही कांग्रेस समझते हैं।

कांग्रेस अम्मा : अरे हां, वो। बेटा, उन्हें मेरा प्रणाम कहना, अगर मिल सको। वैसे तुम क्या मिल सकोंगे। मैं ही नहीं मिल पाती उनसे तो।

रिपोर्टर : आप कांग्रेस होकर उनसे नहीं मिल पातीं? क्या वे भी आपसे मिलने नहीं आतीं?

कांग्रेस अम्मा : कभी नहीं आईं। अब इसमें उनकी भी क्या गलती? हो सकता है उनके सलाहकारों ने उन्हें मेरे बारे में बताया ही ना हो। अगर उन्हें मेरे बारे में कोई बताता तो वे जरूर आतीं।

रिपोर्टर : और उनका नन्ना-मुन्ना बालक?

कांग्रेस अम्मा : हां, वह बालक कभी-कभार आ जाता है। कभी मेरी लकुटिया ले लेता है और कंधे पर लाठी रख जैसे किसान चलते हैं ना, वैसे ही चलने की एक्टिंग करता है। कभी मेरा ये टूटा हुआ ऐनक पहन लेता है और पूछता है- देखो दादी, मैं गांधी बाबा दिख रहा हूं ना...। जैसा भी है, पर है बहुत प्यारा बच्चा। पर आश्चर्य है, मेरे बारे में उसने भी अपनी मां को कभी नहीं बताया।

रिपोर्टर : आप इस खंडहर इमारत में सालों से अकेली रहती हों। अपने बारे में कुछ तो सोचिए।

कांग्रेस अम्मा : अब मेरा कुछ भरोसा नहीं बेटा। इस दुनिया से कब मुक्त हो जाऊं, क्या पता।

रिपोर्टर : अरे नहीं, इस देश को आपकी बहुत जरूरत है। भले ही अब आपके घर वाले ही आपको ना पूछते हो, लेकिन देश के लिए आपने क्या ना किया, मैं सब जानता हूं। मैंने किताबों में सब पढ़ा है। क्या-क्या नाम गिनाऊं, गोखले जी, तिलक जी लेकर बापू तक, सब आपकी ही छत्रसाया में पले-बढ़े। नहीं, अभी आपको जाना नहीं है...

कांग्रेस अम्मा : बस कर पगले, अब रुलाएगा क्या! (और बेबस आंखों से एक आंसू टपक पड़ा...)

रिपोर्टर : आप बहुत भावुक हो रही हैं। बढ़ती उम्र में ऐसा होता है। मोदीजी भी अभी भावुक हो गए थे। अरे हां, मोदीजी से याद आया, उन्होंने अभी-अभी कोरोना का टीका लगवाया है। आप भी लगवा लीजिए, फिर आप भी सेफ हो जाओगी।

कांग्रेस अम्मा : तू पत्रकार होकर भी इतना भोला कैसा है रे? मेरे शरीर में तो वंशवाद, चमचागीरी, दलाली जैसे संक्रमण भरे पड़े हैं। इन संक्रमणों ने ही मेरे तन-मन को तोड़कर रख दिया है। कोरोना वाले टीके से कुछ नहीं होगा।

रिपोर्टर : फिर भी कोई तो टीका ऐसा होगा जिनसे आप हमारे बीच हमेशा के लिए रह सकती है?

कांग्रेस अम्मा : लीडरशिप का, मेहनत का, सांगठनिक क्षमताओं का, इसके टीके की जरूरत है। ये है क्या ...?

रिपोर्टर (15-20 सेकंड की शांति के बाद) : माफ करना अम्मा, कम से कम आपके लिए तो ऐसा टीका अभी अवेलेबल नहीं है। पर, इस खंडहर से आप बाहर तो निकलिए...। टीका भी बन जाएगा।

कांग्रेस अम्मा : जब टीका बन जाए तो पहले उन कांग्रेसियों को जरूर लगवा देना जो घर बैठकर चमत्कार का इंतजार कर रहे हैं, मेरी जवानी फूटने के चमत्कार का इंतजार। और हां, मेरे नन्हे-मुन्ने बालक को मत भूल जाना...अब मैं चलती हूं...सोने का समय हो गया है...

रिपोर्टर काफी देर तक किंकत्तर्व्यविमूढ़ भाव से वहीं खड़ा रहा... उसे पता ही नहीं चला कि वह बूढ़ी अम्मा अचानक कहां ओझल हो गई.... क्या रिपोर्टर वास्तव में किसी भूत से बात कर रहा था? शायद!! पर जो भूतों को नहीं मानते, वे पाठक भला इसे क्या समझेंगे!!

शुक्रवार, 5 मार्च 2021

Humor & Satire Video : केजरीवाल ने क्यों पहना भर गर्मी में मफलर? Exclusive Interview में उन्हीं से जानिए इसका सच ...


केजरीवाल ने क्यों पहना गर्मी में मफलर? मौसम विभाग के लिए क्यों इतना अहम है उनका मफलर? इस फनी एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में वे बता रहे हैं इसका सच... देखिए, कार्टून कैरेक्टर्स में बना यह वीडियो...


मंगलवार, 2 मार्च 2021

Exclusive Interview : बढ़ते दामों के बीच गैस सिलिंडर को क्यों हुई नेहरूजी की चिंता?

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By jayjeet

जैसे ही कुछ लोगों द्वारा गैस सिलेंडर को लतियाने की खबर मिली, रिपोर्टर अपनी संवेदना जताने सिलेंडर के पास पहुंच गया..

रिपोर्टर : यह तो ठीक नहीं हुआ। आपको पैरों से लतियाया गया।
सिलेंडर : आ गए, जले को लाइटर लगाने। वैसे लतियाते पैरों से ही है, हाथों से नहीं... इट्स कॉमन सेंस...

रिपोर्टर : हां हां, पर कौन थे ये लोग?
सिलेंडर : रिपोर्टर आप हो। पता आपको होना चाहिए। और अब अगला डायलॉग जॉली एलएलबी फिलिम का यह मत मार देना- न जाने कहां से आते हैं ये लोग।

रिपोर्टर : हां, याद आया। ये मप्र यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ता थे। पर यह सवाल तो लाजिमी है - आज ये सालों बाद कहां से आ गए‌? बल्कि यह पूछना ज्यादा उचित होगा- बीच-बीच में कहां चले जाते हैं ये लोग?
सिलेंडर : युवा कांग्रेस पर तो मेरा मुंह मत खुलवाओ, यही अच्छा होगा।

रिपोर्टर : कहीं ऐसा तो नहीं कि एक तरफ तमिलनाडु में राहुल गांधी पुश-अप लगा रहे थे। तो शायद अपने नेता के सामने अपनी धाक जमाने के लिए युवा कांग्रेसियों ने आपको लतियाया हो!
सिलेंडर : हां, धाक तो गरीब पर ही जमाई जाती है। भाव गैस के ऊंचे हो रहे और लात हम गरीब खा रहे हैं। अगर धाक जमानी ही थी तो भरी हुई गैस वाले सिलेंडर के साथ जमाते। नानी याद आ जाती।

रिपोर्टर : इटली वाली ...!!!
सिलेंडर : आप कांग्रेसियों के नितांत पर्सनल इश्यू पर जा रहे हैं। इट्स नॉट फेयर। मैंने केवल मुहावरे का यूज किया था...

रिपोर्टर : खैर, असली मुद्दे पर आते हैं। यह सरकार कब समझेगी कि सिलेंडर जैसी चीजों, मेरा मतलब गैस के दाम बढ़ने से गरीबों को कितनी दिक्कत हो रही है।
सिलेंडर : जिस दिन समझ गई, उस दिन तो बेचारे नेहरूजी की शामत आ जाएगी।

रिपोर्टर : कैसे, इसका नेहरूजी से क्या लेना-देना?
सिलेंडर : अगर सरकार की पार्टी वाले मतलब बीजेपियों को यह लग गया कि गैस के दाम बढ़ने से उनके मतदाता बिचक रहे हैं तो वे नेहरूजी के पुतले फूंकना शुरू कर देंगे, यह कहते हुए कि आज गैस के दाम इसलिए बढ़ रहे हैं, क्योंकि 50 साल पहले नेहरू सरकार ने कुछ नहीं किया...

रिपोर्टर : वाह, आप तो बड़े दूरंदेशी हैं... तो फिर करना क्या चाहिए?
सिलेंडर : देखो भाई, बहुत सवाल हो गए, और सब के सब फालतू के सवाल। अब और पूछकर मेरा बीपी मत बढ़ाओ। लतियाने की वजह से मैं पहले से ही मेंटली परेशान हूं। टेंशन से मेरा सिर फटा जा रहा है, मैं पूरा फटूं, उससे पहले ही नौ दो ग्यारह हो जाओ... नहीं तो तुम्हारी ब्रेकिंग न्यूज बन जाएगी...

रिपोर्टर : रुको भाई, भागता हूं मैं...

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