रविवार, 22 अगस्त 2021

Thousand Feet Above : क्या गजब का नॉवेल लिखा है इस बालिका ने

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ऊर्जा अपने नॉवेल 'Thousand Feet Above' के साथ।

By रत्नेश

देश में एक असल फिक्शन राइटर का पदार्पण हो चुका है जिसमें असीम संभावनाएं नजर आ रही हैं। यह फिक्शन राइटर हैं महज 16 साल की ऊर्जा अकलेचा (Urja Aklecha)। इनका पहला उपन्यास नॉवेल 'Thousand Feet Above' हाल ही में जाने-माने पब्लिशर Notion Press से न केवल भारत में प्रकाशित हुआ है, बल्कि इसे अमेरिका, ब्रिटेन, जापान सहित करीब 150 देशों में लॉन्च किया गया है।

करीब 200 पेजों का यह नॉवेल 14 साल की एक किशोर बालिका 'अवनि' की कहानी है। यह कहानी कल्पनातीत है। इसे पढ़कर आपको एक बार तो भरोसा ही नहीं होगा कि 16 साल की यंग राइटर किसी कथा को इतनी खूबी के साथ बुन सकती है। लेकिन ऊर्जा ने यह कमाल कर दिखाया है।

'Thousand Feet Above' पहला पार्ट है। यह नॉवेल अपने आप में पूर्ण है, लेकिन इसके आखिर पेज पर लिखा हुआ है - To be Continued... यानी नॉवेल का अगला पार्ट जरूर आएगा।

इस नॉवेल को इसलिए पढ़ना जरूरी है क्योंकि यह बताता है कि फैंटेसी में अब केवल वेस्टर्न राइटर्स का एकाधिकार नहीं रहा है। भारतीय राइटर्स भी फैंटेसी को बुनने लगे हैं, बल्कि बेहतरीन तरीके से बुनने लगे हैं। हालांकि इसका टारगेट रीडर्स 15 से 25 साल के युवा हैं। उन्हीं की भाषा में यह लिखा गया है। भाषा बहुत ही सरल है। इसलिए बेसिक इंग्लिश जानने वाले पाठक भी इसे आसानी से पढ़ सकते हैं। वैसे इसे यह मानकर पढ़ेंगे कि यह केवल 16 साल की बच्ची ने लिखा है, तो और भी मजा आएगा। 

नॉवेल की कीमत भारत में 229 रुपए रखी गई है। भारत में यह नॉवेल तीन साइट पर उपलब्ध हैं जिनकी लिंक्स नीचे दी जा रही हैं। नोशन प्रेस और फ्लिपकार्ट पर डिलिवरी चार्ज जीरो है। अमेजन पर 50 रुपए अलग से चार्ज लिया जा रहा है। ई-बुक्स पढ़ने वाले इसकी ई-बुक्स का इंतजार कर सकते हैं जो 30 अगस्त तक आने की संभावना है। उसकी कीमत करीब 50 से 100 रुपए के बीच हो सकती है, यानी काफी सस्ती।


इन लिंक्स के जरिए बुलवा सकते हैं यह नॉवेल : 

नोशन प्रेस के लिए यहां क्लिक करें (फ्री डिलिवरी)

अमेजन के लिए यहां क्लिक करें 

फ्लिपकार्ड के लिए यहां क्लिक करें  (फ्री डिलिवरी)


(Originally published on hindisatire )

शुक्रवार, 20 अगस्त 2021

Satire : चौराहे पर काबुलीवाला और तमाशबीनों की तालियां

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चौराहे पर सवालों की झोली के साथ अकेला खड़ा काबुलीवाला।


 By ए. जयजीत

काबुलीवाला ... हां, वही काबुलीवाला। याद ही होगा सबको। गुरुदेव रवींद्रनाथ की कहानी का पात्र। पांच साल की बच्ची मिनी का अधेड़ दोस्त। गलियों में घूम-घूमकर ड्रायफ्रूट्स बेचता, मिनी में अपनी बेटी को याद करता काबुलीवाला।

आज यह काबुलीवाला फिर आया है। चौराहे पर खड़ा है, अकेला। उसकी यादों में अब कोई बेटी नहीं है, क्योंकि अपनी बेटी को तो वह तालिबानियों के रहमो-करम पर छोड़ आया है। उसकी झोली में अब वे ड्रायफ्रूट्स भी नहीं हैं। कुछ हैं तो चंद सवाल। कुछ पुराने, कुछ नए। वह शायद जानता है कि उसे या उसके सवालों को सुनने वाला भी कोई नहीं है। फिर भी उसने अपनी झोली में कम से कम कुछ सवाल तो बचा रखे हैं।

जब आदमी को कोई सुनने वाला नहीं होता है तो वह खुद से बातें करने लगता है। तब वह पागल भी करार दिया जाता है। और जब कोई पागल जैसी हरकतें करता है तो तमाशा बन ही जाता है। तमाशबीन जुट ही जाते हैं। काबुलीवाला आज पागल की तरह चौराहे पर खड़ा है। झोली से सवाल निकाल रहा है। उसके सवालों के जवाब किसी के पास नहीं हैं। या हैं भी तो जवाब कोई देगा नहीं। तो अपने सवालों के जवाब भी वह खुद ही दे रहा है।

पागलपन बढ़ते ही मजमा भी बढ़ता चला जाता है। काबुलीवाले का मजमा भी बढ़ता जा रहा है। तमाशा देखने के लिए पूरी दुनिया जुट गई है। यह लेखक भी चुपचाप उसी तरह तमाशबीन भीड़ का हिस्सा है, जैसे कई और भी हैं।

काबुलीवाले ने अपनी झोली से पहला सवाल निकाला और खुद ही बड़बड़ाते हुए पूछने लगा :  'हे संयुक्त राष्ट्र, तू क्यों चुप बैठा है? तुझ पर तो हर साल 3 अरब डॉलर खर्च होते हैं। यह इतना पैसा है कि हमारे जैसे कई मुल्कों के बाशिंदों को एक वक्त की रोटी मिल सकती है। मगर यहां रोटी भी नसीब नहीं है। न बहन-बेटियों को इज्जत। फिर भी तू चुप बैठा है? तुझे हमारी कोई चिंता नहीं?'

 पागलपन में आदमी अक्सर अदबी भूल जाता है। नहीं तो काबुलीवाले की क्या औकात कि संयुक्त राष्ट्र से तू-तड़ाके से बात करे! किसी और की भी क्या हैसियत संयुक्त राष्ट्र के सामने!

पर बेचारा संयुक्त राष्ट्र भी क्या करे। उसे तो मालूम भी नहीं होगा कि कोई काबुलीवाला उससे सवाल कर रहा है।  पता नहीं, उसे यह भी मालूम है या नहीं कि दुनिया में अफ़ग़ानिस्तान नाम की कोई जगह भी है। और मालूम करके करेगा भी क्या! अफ़ग़ानिस्तान जैसे तो न जाने कितने देश होंगे। सबकी इतनी फिक्र करेगा तो बड़े देशों की जी-हुजूरी करने का समय कब मिलेगा। जी-हुजूरी को छोटा काम ना समझें। बड़े झंझट होते हैं इसमें। न जाने कितनी बार सिर झुकाना होता है। उनके प्रपोजलों पर हस्ताक्षर करने होते हैं, वह भी आंख बंद करके। उफ्फ!  कितना मुश्किल होता होगा ये सब।  तो उसे अफ़ग़ानिस्तान जैसे छोटे-छोटे मसलों पर फंसाना ठीक नहीं। इसलिए संयुक्त राष्ट्र से सवाल पूछने से बड़ा तालिबानी जुर्म और क्या होगा! वैसे अगर संयुक्त राष्ट्र खुद उस चौराहे पर उपस्थित होता, तब भी इस सवाल का जवाब देना उचित नहीं समझता। हो सकता है किसी अन्य भेष में वह उस चौराहे पर तमाशबीन बना बैठा भी हो।

खुद काबुलीवाला भी जानता है कि संयुक्त राष्ट्र से इसका जवाब नहीं मिलना है। तो उसने खुद ही संयुक्त राष्ट्र की ओर से धीमी मगर सधी हुई आवाज में जवाब देना शुरू किया। वैसे ही जैसे ऐसी संभ्रांत संस्थाओं के कुलीन अफसर देते हैं।

'चिंता मत करो हे काबुलीवाला। हम बहुत ही शिद्दत से तुम्हारे साथ हैं। पिछले कई दिनों से हम तुम्हारे लिए चिंता जता रहे हैं। तीन दिन पहले ही हमारे महासचिव ने पूरी दुनिया को तुम्हारे मामले में साथ आने को कहा है। और क्या चाहिए तुम्हें? वैसे क्या तुम्हारे लिए यह गर्व  की बात नहीं है कि हमारे सभी अफसर अफ़ग़ानिस्तान के ड्रायफ्रूट्स खाकर ही अपने दिन की शुरुआत करते हैं। कसम से, क्या कमाल के ड्रायफ्रूट्स पैदा करते हों तुम लोग। लेकिन यहीं पर हमारे लिए एक चिंता की बात और है...'

काबुलीवाला ने खुद ही प्रतिप्रश्न पूछा -  'और क्या चिंता रह गई?'

'अरे क्या तुमने वे क्लीपिंग्स नहीं देखी जब तालिबान के लीडर्स भी ड्रायफ्रूट्स खा रहे थे। कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारे यहां के सारे ड्रायफ्रूट्स पर तालिबानियों का कब्जा हो जाए। कितनी बेरहमी से वे ड्रायफ्रूटस खा रहे थे। पूरी दुनिया ने देखे हैं वे दृश्य। वाकई दिल को दहला देते हैं। बहुत ही बर्बर हैं तुम्हारे यहां के तालिबानी। वहां के ड्रायफ्रूट्स को लेकर हम वाकई बहुत चिंतित हैं। हम फिर कह रहे हैं, अपना ध्यान रखना और हमारे ड्रायफ्रूट्स का भी। हम जल्दी ही एक मीटिंग भी करने वाले हैं। उस मीटिंग में भी हम जोरदार शब्दों में चिंता जताएंगे। तुम बिल्कुल भी चिंता मत करना।'

काबुलीवाला ठहरा पागल । संयुक्त राष्ट्र को तुरंत छोड़कर उसने झोले से दूसरा सवाल निकाल लिया। यह सवाल अमेरिका से था। सवाल था तो घिसा-पीटा ही, फिर भी सुन लीजिए - 'तू तो खुद को पूरी दुनिया का चौधरी मानता है। तो अब अचानक अफ़ग़ानिस्तान को मझधार में छोड़कर क्यों जा रहा है? तेरे सारे हथियार चूक गए हैं क्या?'

अमेरिका की तरफ से काबुलीवाला ने ही जवाब दिया - 'क्यों भूल गया हमारे सारे अहसान? अहसान फ़रामोश! मैंने सालों तुम्हारे बेरोजगार मुजाहिदीनों को पाला-पोसा। उनके हथियारों पर करोड़ों-अरबों का खर्च किया। पर इसके बदले में मुझे क्या मिला? एक ओसामा बिन लादेन। फिर उससे छुटकारा पाने के लिए अरबों-खरबों खर्च करने पड़े। फिर अफ़ग़ानिस्तान की भ्रष्ट सरकारों को पालना-पोसना पड़ा। इतना तो किया? अब अफ़ग़ानिस्तान को बर्बाद करने का पूरा ठेका हमने ही थोड़े ले रखा है।'

अमेरिका का जवाब शायद काबुलीवाला ने सुना नहीं। हां, तमाशबीनों की भीड़ ने सुन लिया है। इसीलिए तालियों की आवाज़ आ रही है।

काबुलीवाला के झोले में तो कई सवाल हैं। अगला सवाल पाकिस्तान से था। उसने सवाल को बड़ी ही हिकारत से देखा और जमीन पर फेंककर उसे पैर से मसल दिया। फिर और भी कई सवाल निकले - रूस से, चीन से, पश्चिमी मुल्कों से। पब्लिक वेलफेयर का दावा करने वाली विश्व संस्थाओं से। वह सभी सवालों को जमीन पर फेंकता जा रहा है। अब तो पूरा ही पागल जैसा बर्ताव करने लगा है। इसलिए तमाशबीनों को और भी मजा आने लगा है। तालियों की आवाज बढ़ गई है। वे सब भी शायद तमाशबीन का हिस्सा ही हैं, जिनसे पूछने के लिए काबुलीवाले के झोले में सवाल हैं।

अब उसके झोले में बस एक अंतिम सवाल बाकी है। निकालते ही उसे चूम लिया। उसे याद आ गई कोलकाता की वह गली जहां वह पहली बार उस बच्ची मिनी से मिला था। उसे ड्रायफ्रूट्स देता था। लेकिन अब न वह मिनी रही होगी, न वह गली। जिससे वह सवाल है, वह तमाशबीनों की भीड़ में शामिल नहीं है, लेकिन उसके साथ भी नहीं है। वह कहीं दूर उसकी ओर पीठ किए हुए हैं। वहां भी तो अब मानसिकता पर तालिबान चिपक गए हैं। तो जवाब देने का नैतिक साहस शायद उसके पास भी कहां होगा!

काबुलीवाला की आंखों के किनारे से आंसू की एक बूंद टपक पड़ी। तमाशबीन का हिस्सा बने इस लेखक की आंखें भी नम हैं, पर उसे तो तटस्थ रहना है। तटस्थता ही सबसे मुफ़ीद होती है।

काबुलीवाला ने वह सवाल ससम्मान अपने झोले में सरका दिया है। शायद यह सोचकर कि जब आमने-सामने मुलाकात होगी तो पूछेगा- क्यों भुला दिया अपने काबुलीवाले को! क्यों भुला दिया उस गांधार को जिसे जीतने के लिए भीष्म ने एक पल की भी देरी नहीं की थी? अपने पितामह को याद करके भी क्यों तुम्हारी भुजाएं अब फड़कती नहीं?

पूछेगा, जरूर पूछेगा...। जवाब तो देना होगा!

(ए. जयजीत खबरी व्यंग्यकार हैं। संवाद शैली में लिखे व्यंग्यों के लिए चर्चित हैं।)

रविवार, 15 अगस्त 2021

Satire & humor : एक डंडे के फासले से मिलता है सिस्टम

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By Jayjeet

और उस दिन तंत्र की जन से मुलाकात हो गई। पाठकों को लग सकता है कि भाई तंत्र और जन दोनों की मुलाकात का क्या चक्कर है? दोनों तो साथ ही रहते हैं - जनतंत्र। 

जी नहीं, ऐसे लिखे हुए पर बिल्कुल ना जाइए। इसमें तो भारी धोखा है। ऐसा लिखा हुआ तो खूब मिलेगा। कानूनों की किताबों में खूब अच्छी-अच्छी बातें मिलेंगी, पर सब अच्छा-अच्छा होता है क्या! दरअसल, जन और तंत्र दोनों जनतंत्र नहीं, जन-तंत्र की तरह रहते आए हैं। जन और तंत्र के बीच एक बहुत बड़ा डैश है। सरकारी स्कूलों का मास्टर उसे समझाने के लिए डंडा कहता है। यही डंडा तंत्र के पास है, जन के पास नहीं। इसलिए दोनों साथ-साथ रहते हुए भी साथ नहीं हैं। एक डंडे का फासला है दोनों के बीच। जन जब मजबूरी में तंत्र से मिलने के लिए उसके पास जाता है, कभी थाने में, कभी तहसील कार्यालय में, कभी कोर्ट-कचहरी में, तो इसी एक डंडे के फासले पर मिलता है।

पर अभी तो तंत्र ही जन से मिलने आया है। ऐसा कैसे? तंत्र को क्या पड़ी कि अपनी कुर्सी छोड़कर जन से मिलने चला आए? होती है भाई, साल में कम से कम दो बार तंत्र की जन से मुलाकात होती है। वे दिन ही ऐसे होते हैं। उन दिनों तंत्र बहुत भावुक हो जाता है। राष्ट्रभक्ति के गीत उसे रुलाने लगते हैं। उसे बापू, नेताजी बोस, भगतसिंह याद आने लगते हैं और इसी भावुकतावश वह जन से मिलने चले आता है।

 तंत्र आज फिर जन से मिला है। इतना पुनीत मौका है तो व्यर्थ की बातें छोड़कर उनकी बातें सुन लेते हैं। 

'नमस्कार जन महोदय, कैसे हों?' विनम्रता का दिखावा करते हुए भी एटीट्यूड तो वही है जो तंत्र में होता है। जरूरी भी है। नहीं तो दो टके के जन को सिर चढ़ने में समय नहीं लगता है। 

'अरे सर। आज आप कैसे? हमारा अहोभाग्य। आप खुद मिलने चले आए।' जन जितना संभव हो सके, झुकने की कोशिश में है। वैसे पिछले 75 साल में झुकते-झुकते वह झुकने के मैग्जीमम लेवल पर तो पहुंच ही चुका है। फिर भी तंत्र के इगो को सेटिस्फाई करने के लिए कोशिश करते दिखना जरूरी है।    

'अबे, पहली बार मिल रहे हैं क्या? याद ना आ रहा? तंत्र ने हल्की सी झिड़की लगाई जो न चाहते हुए भी तगड़ी हो गई। ऐसी कभी-कभार की सौजन्य मुलाकातों से आदतें थोड़ी बदलती हैं। इसलिए 'अबे' यकायक मुंह से निकल गया। विनम्रता साइड में चली गई। 

'सर माफी चाहूंगा, याद ना आ रहा। पर आप अचानक मिलने क्यों आए?' देखिए जन का हरामीपना। अपनी छोटी-छोटी समस्याओं में याद ही नहीं रहता कि कुछ माह पहले ही तो तंत्र उससे मिलने आया था। 26 जनवरी के आस-पास का ही समय होगा। साल में दो बार मिलते ही हैं तंत्र महोदय, फिर भी भूल जाता है जन। 

पर आज तंत्र ने बुरा नहीं माना। बुरा मानने का अभी मौका नहीं है। बोला, 'तूफान से लाए हैं कश्ती निकालकर टाइप कुछ सुना तो अचानक भावुक हो गया और लगा कि तुमसे मिलने का वक्त फिर आ गया है। ऐसे गाने पता नहीं कौन लिख गया। कसम से, रुला देते हैं।' हाथ जेब में रखे रुमाल की ओर जाते-जाते रुक गया। आंखों को भी पता है कि कहां रोना है। जन के सामने भावुकताभरी बातें कहने से ही काम चल जाता है, तो झूठे आंसू बहाने का क्या मतलब। 

 'जी सर। प्रदीप जी लिख गए।' जन ज्ञान बघारने का मौका नहीं छोड़ता, वाट्सऐप हो या सीधे तंत्र से बातचीत। 'वैसे सर, मुझे तो अभी पिछले हफ्ते बाढ़ की वजह से जो हालात हुए, उन्हें देख-देखकर रोना आ रहा है। बेचारे कितने लोग बेघर हो गए, कितनी फसलें नष्ट हो गईं।' जन ने बात जारी रखी। 

'फिर वही तुच्छ बातें। भाई, जरा अपना स्तर बढ़ाओ। वो कौन-सा गीत था ना! उसे सुनकर तो पंडितजी भी रो दिए थे। अपने वर्तमान पीएम साहब भी अभी किसी बड़ी बात पर रो दिए थे। देखो, बड़े लोग कैसी बड़ी-बड़ी बातों पर रोते हैं और तुम स्साला छोटी-छोटी चीजों का ही रोना रोते रहते हों कि सड़क खराब है, पानी गंदा आ रहा है, कचरा गाड़ी नहीं आ रही, फसल खराब हो गई, काम-धंधा नहीं है। इसीलिए हम तंत्र लोगन को तुम जन लोगन से मिलने की इच्छा नहीं होती।' तंत्र भावुकता के साथ व्यावहारिकता का पुट डाल रहा है। 

'पर सर, स्तर बढ़ाने के लिए अतिरिक्त चार पैरों की जरूरत पड़ती है। वे कहां से लाएं?' यह बात जन ने कटाक्ष में कही या असल में, जन ही जाने। उसका इशारा कुर्सी की ओर है। ऐसा कहते हुए उसकी रीढ़ दो इंच ऊपर उठ गई है। हिम्मत भले ही अनजाने में की गई हो, रीढ़ की हड्‌डी को थोड़ा ऊंचा कर ही देती है।

इधर, चार पैरों का उल्लेख होते ही तंत्र के चेहरे पर मलाई जैसी चमक आ गई। तंत्र को बखूबी पता है इन चार पैरों की इस ताकत के बारे में। उसे ना पता होगा तो किसे होगा। तंत्र और चार पैर अब एक-दूसरे के पूरक हो चुके हैं। पूरा तंत्र इन चार पैरों पर चलता है। चार पैरों की महिमा ही है कि तंत्र के दरवाजे के बाहर चार पैर वाले स्टूल पर बैठे हुए चपरासी में भी तंत्र की वही शक्ति आ जाती है, जो दरवाजे के अंदर बड़ी-सी कुर्सी पर बैठे किसी मंत्री या अफसर के पास होती है। भले ही मौके-बेमौकों पर भावुकतावश तंत्र अपने दो पैरों पर जन से मिलने चला आता हो, लेकिन जन यह न मान ले कि तंत्र अपने चार पैर कहीं छोड़कर उससे मिलने आता है। चार पैरों का दंभ उसकी मानसिकता के साथ चिपककर उसके साथ ही आता है। 

75 साल का यही हिसाब-किताब है। यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है! देवलोक में बैठे हमारे स्वतंत्रता सेनानी इस पर अक्सर आंसू बहाते हैं। आज खुशी का मौका है। तो उन्हें खुशी के आंसू ही मान लेते हैं..!! 

(ए. जयजीत खबरी व्यंग्यकार हैं। संवाद शैली में लिखे व्यंग्यों के लिए चर्चित हैं।)

शुक्रवार, 13 अगस्त 2021

चंदन चाचा के बाड़े में, नाग पंचमी की कविता (Nag panchami classic kavita )



नागपंचमी (Nag panchami) से संबंधित कविता चंदन चाचा के बाड़े में ...( chandan chacha ke bade me)। इसे मप्र के जबलपुर के कवि नर्मदा प्रसाद खरे ने लिखा था। इसे सबसे पहले 1960 के दशक में कक्षा 4 की बाल भारती में शामिल किया गया था। हालांकि कुछ सोर्स इसके कवि सुधीर त्यागी बताते हैें। 

नर्मदा प्रसाद खरे
सूरज के आते भोर हुआ
लाठी लेझिम का शोर हुआ
यह नागपंचमी झम्मक-झम
यह ढोल-ढमाका ढम्मक-ढम
मल्लों की जब टोली निकली।
यह चर्चा फैली गली-गली
दंगल हो रहा अखाड़े में
चंदन चाचा के बाड़े में।।

सुन समाचार दुनिया धाई,
थी रेलपेल आवाजाई।
यह पहलवान अम्बाले का,
यह पहलवान पटियाले का।
ये दोनों दूर विदेशों में,
लड़ आए हैं परदेशों में।
देखो ये ठठ के ठठ धाए
अटपट चलते उद्भट आए
थी भारी भीड़ अखाड़े में
चंदन चाचा के बाड़े में।।

वे गौर सलोने रंग लिये,
अरमान विजय का संग लिये।
कुछ हंसते से मुसकाते से,
मूछों पर ताव जमाते से।
जब मांसपेशियां बल खातीं,
तन पर मछलियां उछल आतीं।
थी भारी भीड़ अखाड़े में,
चंदन चाचा के बाड़े में॥

यह कुश्ती एक अजब रंग की,
यह कुश्ती एक गजब ढंग की।
देखो देखो ये मचा शोर,
ये उठा पटक ये लगा जोर।
यह दांव लगाया जब डट कर,
वह साफ बचा तिरछा कट कर।
जब यहां लगी टंगड़ी अंटी,
बज गई वहां घन-घन घंटी।
भगदड़ सी मची अखाड़े में,
चंदन चाचा के बाड़े में॥

वे भरी भुजाएं, भरे वक्ष
वे दांव-पेंच में कुशल-दक्ष
जब मांसपेशियां बल खातीं
तन पर मछलियां उछल जातीं
कुछ हंसते-से मुसकाते-से
मस्ती का मान घटाते-से
मूंछों पर ताव जमाते-से
अलबेले भाव जगाते-से
वे गौर, सलोने रंग लिये
अरमान विजय का संग लिये
दो उतरे मल्ल अखाड़े में
चंदन चाचा के बाड़े में।।

तालें ठोकीं, हुंकार उठी
अजगर जैसी फुंकार उठी
लिपटे भुज से भुज अचल-अटल
दो बबर शेर जुट गए सबल
बजता ज्यों ढोल-ढमाका था
भिड़ता बांके से बांका था
यों बल से बल था टकराता
था लगता दांव, उखड़ जाता
जब मारा कलाजंघ कस कर
सब दंग कि वह निकला बच कर
बगली उसने मारी डट कर
वह साफ बचा तिरछा कट कर
दंगल हो रहा अखाड़े में
चंदन चाचा के बाड़े में।।

# nag-panchami-kavita  # नागपंचमी की कविता

बुधवार, 4 अगस्त 2021

Satire : और अचानक सत्य से हो गई मुलाकात....

(आज अगर अचानक हमारी सत्य नामक जीव से मुलाकात हो जाए तो वह हमें दूर ग्रह का एलियन टाइप ही दिखेगा... सोचिए उस रिपोर्टर की जिसकी अचानक ऐसे ही एलियन से मुलाकात हो गई...)


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सत्य आज कुछ-कुछ ऐसा ही एलियन टाइप नजर आएगा। 

By Jayjeet

सच इन दिनों ट्रेंड में है। हर कोई सच की तलाश में है। कोई पेगासस जासूसी कांड का सच जानना चाहता है तो किसी को किसान आंदोलन के पीछे के सच की चिंता है। पर सच जानकर करेंगे क्या? यह किसी को भी पता नहीं। 


लेकिन सच है कहां? क्या वाकई कहीं सच है भी? उस रिपोर्टर का तो यही दावा था कि हां, उसने सच को ढूंढ निकाला।


हुआ यूं कि उस दिन रिपोर्टर किसी ब्रेकिंग न्यूज की तलाश में नगर निगम के बाजू में स्थित बापू की प्रतिमा के पास खड़ा था। उसे वहीं एक कोने में पड़े कचरे के ढेर से एक साया झांकता हुआ नजर आया। रिपोर्टर ने ब्रेकिंग न्यूज के फेर में उसी साये को पकड़कर ढेर से बाहर निकाल लिया। पर यह क्या! एलियन जैसी आकृति! रिपोर्टर ऐसी आकृति पहली बार देख रहा था। तो चौंकना लाजिमी था। शुक्र है आसपास कोई और ना था। (नोट : दी गई तस्वीर उसी रिपोर्टर द्वारा दिए गए ब्योरे के आधार पर बनाई गई है।)


"आप कौन? इससे पहले तो आपको कभी देखा नहीं!' रिपोर्टर ने उस अनूठी एलियन टाइप की आकृति से बड़े ही अचरज के साथ पूछा। 


"मैं बताना तो नहीं चाहता, पर झूठ भी नहीं बोल सकता।' कचरे को झाड़ते हुए एलियन टाइप के साये ने जवाब दिया। अब वह गांधी मूर्ति के पास बहुत ही सतर्क होकर बैठ गया। 


"अच्छा...तो सच ही बोल दीजिए।' रिपोर्टर ने कुटिल मुस्कान के साथ ऐसे कहा मानो कोई बहुत बड़ा कटाक्ष कर दिया हो।


"जी मैं सत्य ही हूं।' बेचारा सत्य, रिपोर्टर के कटाक्ष को क्या जाने और क्या समझे। 


"अच्छा..... वही सत्य जिसकी लोग हमेशा तलाश में रहते हैं?'

 

रिपोर्टर को भरोसा नहीं हो रहा है। इसलिए उसने दो बार अपनी आंखें मसली, आकृति को छूकर सत्य की पुष्टि करनी चाही। फिर जेब से 100 रुपए का नोट निकाला। उलट-पलटकर देखा। गांधीजी की तस्वीर के बाजू में लिखे सत्यमेव जयते में "सत्य' आलरेडी उपस्थित था। तो यह कोई फेक सत्य तो नहीं! रिपोर्टर दुविधा में है। फिर उसने नोट को जेब के अंदर सरकाते हुए मामले का और भी सच जानने का निश्चय किया। 


"क्या सोच रहे हो महोदय?' सत्य ने बड़ी ही अधीरता के साथ इधर-उधर झांकते हुए कहा। उसकी अलर्टनेस बढ़ गई है। थोड़ी घबराहट भी।


"आप वाकई सत्य हो? पर उस कोने में पड़े कचरे के ढेर में क्या कर रहे थे?' रिपोर्टर ने तफ्तीश शुरू की।


"भाई, मेरी वहीं जगह है। आप लोगों ने ही तय की हाेगी। मैं तो कब से कोने वाले उसी कचरे के ढेर मंे पड़ा हूं। अच्छा होता, मुझे आप वहीं अंदर ही रहने देते। मैं जब तक छिपा हूं, तभी तक सुरक्षित हूं।' सत्य लगातार इधर-उधर देख रहा है। असुरक्षा और घबराहट के भाव बरकरार हैं। 


"आप इतने डरे-डरे, सहमे-सहमे से क्यों हों?'


"मुझे देखते ही कहीं लोग मेरा एनकाउंटर न कर देें। वैसे अब तो लिंचिंग का भी फैशन चल पड़ा है। इसीलिए... कृपया मुझे तुरंत जाने दीजिए। मैं वहीं ठीक हूं।'


"पर आपको डरना क्यों चाहिए? वैसे भी कहा ही गया है, सांच को आंच नहीं। अगर आप वाकई सत्य हो तो फिर काहें का डर?' रिपोर्टर ने सत्य की सत्यता की पुष्टि करने के लिए बचपन में पढ़ा हुआ मुहावरा फेंका।

  

"जब नेता टाइप के लोग मेरी रोटी बनाकर मुझे सेंकते हैं तो आंच मुझे भी लगती है।'  


"हो सकता है, वे आपके साथ प्रयोग करते हों, जैसे कभी बापू ने किए थे। मैंने कहीं पढ़ा था- गांधीजी के सत्य के प्रयोग। ऐसा ही कुछ...' रिपोर्टर ने एक ठहाका लगाया। पता नहीं क्यों लगाया। शायद अपनी ही बचकानी बात पर मोहर लगाने के लिए।


"भाई साहब, आप भी अच्छा मजाक कर लेते हों। अच्छा मुझे जाने दीजिए...' सत्य भी रिपोर्टर के मजाक को समझ गया। अब भी जाने की जिद पर अड़ा है।


"मैं आपके साथ हूं ना। आप घबराइए मत। आपका कुछ नहीं होने वाला।' राजनीतिक रिपोर्टिंग करते-करते इस तरह के आश्वासन रिपोर्टर्स की जबान पर भी स्थाई भाव की तरह चिपक ही जाते हैं।


"पुलिस, सीबीआई या सीआईडी वाले, इनसे आप बचा लोंगे? सबसे ज्यादा डर तो इनसे ही लगता है।' भयंकर घबराया हुआ सा है सत्य।


"लेकिन सत्य जी, पुलिस, सीबीआई, सीआईडी, ये तो हमेशा से ही आप के मुरीद रहे हैं। सत्य को ढूंढने की इन पर एक महती जिम्मेदारी भी है। अगर आप इनसे बचकर रहेंगे तो कैसे काम चलेगा? जनता तक सच पहुंचेगा कैसे?'


"नहीं भाई, दो-चार बार मैं इनसे मिला भी तो इन्होंने मेरा ये हाल किया कि उसे याद करके आज भी सिहर उठता हूं। मुझे इतना तोड़ा-मरोड़ा कि मैं, मैं ना रहा।'


"ऐसा वे क्या करते हैं? हम भी तो जानें जरा...' रिपोर्टर ने अनजान बनने का नाटक करते हुए पूछा। 

 

"इनके पास पहले से ही झूठ का सांचा रहता है। बस, उस सांचे में मुझे तोड़-मरोड़कर पटक देते हैं।' 


"लेकिन इसके लिए तो आप ही जिम्मेदार हैं।' रिपोर्टर ने शायद बड़ी बात कह दी।


"कैसे भला? अब चौंकने की बारी सत्य की थी। रिपोर्टर ने वाकई बड़ी बात ही कही थी। 


"आपकी तलाश में न जाने कितनी संसदीय समितियां बनती हैं, न जाने कितने बड़े-बड़े कमीशन बनते हैं। उनमें बड़े-बड़े अफसर नियुक्त होते हैं, सेवानिवृत्त जजों को तकलीफ दी जाती है। उनके ऑफिस, गाड़ियों पर खर्च अलग होता है। वह भी दो टके के सच, सॉरी, आई मीन सिर्फ आपकी तलाश में। एक सच को जानने के लिए कितनी मशक्कत करनी पड़ती है बेचारों को। और फिर जब वह नहीं मिलता है तो पुलिस, सीबीआई, सीआईडी की मदद लेनी ही पड़ती है। क्या करें वे भी।' रिपोर्टर ने नैतिक ज्ञान पेला। 


"मैं समझा नहीं।' सत्य वाकई मासूम ही है। 


रिपोर्टर बगैर रुके रौ में बोल रहा है, "या फिर उन्हें आपकी तलाश इसी वाले सत्यमेव जयते के "सत्य' पर जाकर खत्म करनी पड़ती है।' रिपोर्टर ने उसी 100 रुपए के नोट को जेब से निकालते हुए सत्यमेव जयते वाले सत्य की ओर उंगली दिखाते हुए एलियन टाइप सत्य से कहा।  


इस बीच रिपोर्टर के बॉस का फोन भी आ गया। रिपोर्टर सत्य से साक्षात्कार की ब्रेकिंग न्यूज को लेकर फोन पर ही अपने बॉस को कन्विंस करने में लगा है। उधर बॉस शायद हंस रहा है।  


इधर, सत्य किंकर्त्तव्यविमूढ़ खड़ा है और फिलहाल तो वह उसी कोने की ओर देख रहा है, जहां पड़े कचरे में से रिपोर्टर ने उसे ढूंढ निकाला था। ढूंढ क्या निकाला था, खींचकर जबरदस्ती बाहर निकाल लिया था। वह रिपोर्टर से नजरें बचाकर जल्दी से उसी ढेर में ओझल हो जाना चाहता है, लोगों को पता चले उससे पहले ही। फिर रिपोर्टर लाख दावा करें, कौन भरोसा करेगा। 

(ए. जयजीत खबरी व्यंग्यकार हैं। संवाद शैली में लिखे व्यंग्यों के लिए चर्चित हैं।)


रविवार, 1 अगस्त 2021

India in Olympic Games : हमें इमोशनल स्टोरीज की नहीं, क्रूर कहानियों की जरूरत है...

क्योंकि ओलिम्पिक में पदक जीतना केवल खेल नहीं, एक युद्ध है !!


By Jayjeet

हम भारतीय हद से ज्यादा इमोशनल हैं। या हो सकता है इमोशनल होने का नाटक करते हों। पक्के से कुछ नहीं कहा जा सकता। इमोशनल होना अच्छी बात है, लेकिन हर जगह नहीं! दिक्कत यह है कि हर सफलता या थोड़ी बहुत सफलता या विफलता के समय हम बहुत सारी इमोशनल स्टोरीज ले आते हैं। हमें एक सिल्वर पदक मिलता है तो इमोशनल स्टोरी, किसी खिलाड़ी ने हैट्रिक ठोंक ली तो इमोशनल स्टोरी। कोई हार गया तो इमोशनल स्टोरी। इमोशनल स्टोरीज का फायदा यह होता है कि हमें उस छोटी-मोटी सफलता पर ही संतुष्ट होने या हार के लिए बहाना मिल जाता है। 

ओलिम्पिक में इतनी सारी और बार-बार विफलताओं के बाद भी खेल अब भी हमारे लिए महज खेल क्यों है? पदक जीतने के लालायित जहां अन्य देश इसे युद्ध मानकर सबकुछ झोंक देते हैं, हम अपने खेल संगठनों पर राजनेताओं या राजनेता टाइप लोगों को बिठाकर आम हिंदुस्तानियों की आंखों में पल रहे सपनों पर धूल क्यों झोंकते रहते हैं? 

आज हमारे पास क्या नहीं है? पैसा नहीं है? प्रतिभा नहीं है? जजों को प्रभावित करने का सुवर पॉवर नहीं है (अमेरिका और चीन जैसा!)। तो फिर पदक क्यों नहीं है? लेकिन यह तब तक नहीं होगा, जब तक हम पूरी क्रूरता के साथ जवाबदेही तय नहीं करेंगे। हमें केवल इमोशनल स्टोरीज नहीं चाहिए। केवल जज्बे जैसे शब्द नहीं चाहिए। युद्ध जैसी तैयारियां चाहिए। जब हम सैन्य तैयारियों में अपने सैनिकों के साथ कोई मुरव्वत नहीं करते तो खिलाड़ियों के साथ क्यों होनी चाहिए? जब किसी मोर्चे पर छोटी-सी गलती पर उस मोर्चे के कर्नल या कमांडर के साथ कोर्ट मार्शल करने में नहीं हिचकते तो हमारे खेल संगठनों पर कुंडली जमाए बैठे नाकारा लोगों के साथ कोर्ट मार्शल जैसा कुछ करने से क्यों हिचकिचाते हैं? और सबसे बड़ी बात, जब हम छोटी-छोटी बातों पर भी सरकार/सरकारों को जवाबदेह ठहराने में पीछे नहीं रहते हैं तो ओलिंपिक में ऐसे लचर प्रदर्शन पर सरकार को क्यों बचा लेते हैं? क्या खेलों में सुपर पॉवर बनाने का जिम्मा सरकार का नहीं है? 

तो अगर हमें वाकई पदक जीतने की तमन्ना है, इमोशनल कहानियों को डस्टबीन में फेंकना होगा। इमोशन अक्सर कमजोर ही बनाता है। हमें क्रूरता की कहानियां चाहिए। नहीं तो बस टीवी सेट पर एक अदद कांसे की उम्मीदों को तलाशते रहिए। और हर उम्मीद टूटने के बाद बस क्रिकेट पर दोष मढ़ते रहिए।