शुक्रवार, 29 अक्तूबर 2021

Satire : ख़बरदार, डरना सख़्त मना है!



ए. जयजीत

अगर देश के गृह मंत्री बोल रहे हैं कि अब किसी को डरने की जरूरत नहीं है तो फिर वाकई डरने की जरूरत नहीं ही होगी, सिद्धांत: ऐसा माना जा सकता है। पर ऐसे भी कैसे मान लें? इसकी ग्राउंड लेवल पर पुष्टि भी तो जरूरी है। तो यही पुष्ट करने के लिए रिपोर्टर सीधे पहुंच गया एक आम आदमी के पास। इतिहास गवाह है कि सबसे ज्यादा डर तो आम आदमी को ही लगता है। इसलिए डर के लेवल के बारे में असली पुष्टि आम आदमी से ही हो सकती थी। 

'आप रिपोर्टर ही हो, इस बात की क्या गारंटी?' इधर-उधर देखकर आम आदमी ने पूछा। वह इंटरव्यू से बचने का कोई न कोई रास्ता तलाश रहा है। बेमतलब का लफड़ा नहीं चाहता।

'अजी इतना भी मत डरिए। मैं कोई पेगासस का जासूस नहीं हूं। बस, दो-चार सवाल पूछने हैं। अनुमति हो तो पूछ लूं।'

'अब अनुमति देने वाले हम कौन! हमसे कौन अनुमति लेता है! पूछ लीजिए। पर नाम मत छापना।' अंतत: नाम न छापने की शर्त पर आम आदमी डरते-डरते चर्चा के लिए राजी हुआ। 

'हमारे केंद्रीय गृह मंत्रीजी ने कहा है कि अब लोगों को डरने की जरूरत नहीं है। कश्मीर में उन्होंने अपना बुलेटप्रूफ ग्लास तक निकाल फेंका था। तो जब देश के गृह मंत्री ऐसा कह रहे हैं तो कुछ तो डर कम हुआ होगा?' रिपोर्टर तुरंत अपने मूल सवाल पर आया।

'भाई साहब, कहां मुझ जैसे दो टके के आम आदमी के डर से गृह मंत्रीजी की निडरता की तुलना कर रहे हो! हम आम लोग तो पैदाइशी ही डरे हुए होते हैं।'

'वो तो देख ही रहा हूं। आप कुछ कांप से रहे हैं। कहीं से कुछ ताजे डरे हुए लगते हो।'

'क्या बताएं। कल रात को मोहल्ले में कुछ वर्दीवाले आए थे। किसी चोरी की गाड़ी के बारे में आम लोगों से तफ्तीश कर रहे थे, इतनी भयंकर वाली कि क्या बताएं। बस, उसी डर के थोड़े-बहुत अवशेष अब भी बाकी हैं। इसीलिए पैर कांप रहे हैं।'

'पर आप तो कानून की इज्जत करने वाले आम आदमी हो। आपको क्या डर?'

'भाई साहब, कानून की इज्जत करने वाले को ही वर्दी से डरना पड़ता है। जो कानून को अंगूठे पर लेकर घूमते हैं, बस वे ही नहीं डरते।'

'हां, वर्दी से तो हर आम आदमी का डरना लाजिमी है, नहीं तो वर्दी के पास काम ही क्या रह जाएगा। खैर, बाकी मामलों में तो आप निडर होंगे ही।'

'अरे कहां, उस दिन बिजली का बिल भरने में दो दिन लेट हो गया तो विभाग से दो कर्मचारी आ गए। डराने लगे कि चाय-पानी की व्यवस्था नहीं की तो चार-दिन अंधेरे में रहना होगा। तो डरकर चाय-पानी की व्यवस्था करनी पड़ी। अब क्या करें, डरना पड़ता है।'

'खैर, रिश्वत देने पर आपका बस नहीं। पर इस बात से तो खुश होते होंगे कि इस मामले में आप खुद तो बिंदास हो, अच्छे-भले ईमानदार हो। यह भी कम साहस का काम नहीं है।' 

'ऐसा भी नहीं है। ऊपर वाले अफसरों के डर से थोड़ी बहुत रिश्वत लेनी पड़ती है। शुरू में मैंने मना किया तो बड़े साहब ने चमका दिया, तू स्साले, रिश्वत ना लेकर पूरे सिस्टम की वाट लगाना चाहता है? नौकरी करनी है कि नहीं? उसके बाद से डरकर रिश्वत लेने लगा।'

'अच्छा, पूजा करते हो या फिर...'। रिपोर्टर को अपनी चर्चा को सिस्टम पर से हटाकर धर्म पर लाना ज्यादा सुविधाजनक लगा। यह सवाल इसलिए भी परम आवश्यक था ताकि सामने वाले की धर्म-जाित का पता लग सके तो कुछ सवाल भी उसी के इर्द-गिर्द पूछे जा सकें।

'साहब, जरूरत पड़ने पर पूजा-पाठ ही करता हूं। कभी-कभी मंदिर भी चले जाता हूं।'

'चलो, कम से कम धर्म के मामले में आपको इस देश में कोई डर नहीं है। यह भी कम बात नहीं है।'

'अरे क्या खाक डर नहीं है!' आम आदमी कितना पक्का भीरू है, लगातार यही साबित करने पर उतारू है।

'क्यों?'

'चार दिन पहले की बात है। आप जानते ही हो कि मैं नियम-कायदों से डरने वाला आदमी हूं। सामने वाली सड़क के बीचों-बीच कुछ गायें खड़ी थीं। ट्रैफिक को रोक रही थीं। वैसे उसमें उन बेचारी गायों का कोई दोष नहीं था। तो मैंने सोचा कि चलो उनसे हटने की रिक्वेस्ट कर लेता हूं। मैं तो उन्हें बड़े ही प्यार से वहां से हटने का अनुरोध कर रहा था। लेकिन पता नहीं कहां से चार-छह गुंडे आ गए। वैसे प्योर गुंडे नहीं थे, मतलब गुंडे टाइप के थे। बस हाथों में लिए डंडों से गुंडे लग रहे थे। उन्हें लगा मैं गाय माताओं के साथ दुर्व्यहार कर रहा हूं। दो-चार लगा दिए।'

'पर आप तो पूजा-पाठी हों। आपको क्यों डरना चाहिए? बोल देते।'

'वो क्या था, उस दिन मेरी हल्की सी दाढ़ी थी। तो उन्हें गलतफहमी हो गई। कहने लगे, स्साले पहचान दिखा। अब मैं तो जनेऊ भी नहीं पहनता। एक कहने लगा, नंगा कर देते हैं स्साले को। अभी दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा। पर तभी पड़ोस से गुजरने वाले किसी परिचित ने आवाज लगा दी- शर्मा जी क्या हो रहा है? बस, उसी से बच पाया।' 

'तो आप उस दिन लिंचिंग से बच गए। उसके बाद से ही अब दाढ़ी साफ कर ली। लगता है, जनेऊ भी पहन ली है। चलिए, ये डर भी अच्छा है। इससे अब कुछ डर कम हो सकेगा।'

'उम्मीद तो नहीं है।' एक डरा हुआ आम आदमी डरने की हर संभावना की तलाश मरने तक जारी रखता है।

'अच्छा, चार दिन पहले भोपाल में एक वेब सीरिज को लेकर भी हंगामा हुआ था। आपका तो छोटा मामला था, पर वह बड़ा मामला था तो खबर बन गई। खबर तो पढ़ी ही होगी ना?'

'बिल्कुल नहीं, मैं उस खबर में झांका तक नहीं। क्या पता अखबार से निकलकर ही दो-चार गुंडे, आई मीन गुंडे टाइप के लोग बाहर आ जाए और मैं जब तक अपनी पहचान बताऊं, दो-चार डंडे चला ही दे।' एक डरे हुए आम आदमी की सफलता इसी में है कि वह खबरों से भी डरने लगे।

'पर भाई, वे तो धर्म के रक्षक हैं। हमारे-तुम्हारे धर्म की रक्षा करने के लिए ही तो उन्हें डंडे उठाते पड़ते हैं। उनसे डरिए नहीं, उनका सम्मान करना सीखिए। अब देखिए, आगे से मप्र में जिस भी वेब सीरिज या फिल्म की शूटिंग होगी, फिल्म मैकर अपनी स्क्रिप्ट पहले सरकार को भेजेंगे और सरकार जो भी करेक्शन करने का आदेश देगी, उसका वे पूरा सम्मान करेंगे। आप भी सम्मान करना सीखिए शर्माजी। बेमतलब डर का नाम देकर देश को बदनाम ना कीजिए।' रिपोर्टर अक्सर इंटरव्यू लेते-लेते ज्ञान भी देने लग जाते हैं।

'जी सर, कोशिश करूंगा। पर अभी तो टाइम हो गया। अब प्लीज खतम करते हैं। लेट हो गया तो पत्नी की दो-चार बातें सुननी पड़ेंगी।'

'मतलब घर भी डरमुक्त नहीं! कितना डरेंगे आप?'

'बताया ना, आम आदमी पैदा ही डरने के लिए होता है।'

'बस एक आखिरी सवाल। कभी तो आप दूसरों को डराते होंगे? सालों में कभी-कभार?'

देर तक सोचने के बाद, 'हां, जब नेता वोट मांगने आते हैं। हालांकि जाति-धर्म के अनुसार वोट करने का एक प्रेशर हम पर रहता है। फिर भी तब लगता है कि कम से कम एक ताकत हमारे पास है। हां, हां याद आ गया।'

'इस ताकत को उस समय के लिए बचाकर रखिए। जब तक उनमें इस ताकत का डर रहेगा, तब तक डर का बैलेंस बना रहेगा।'

रिपोर्टर ने इस अंतिम ज्ञान के साथ अपना इंटरव्यू खत्म किया। लेकिन यह बेमतलब का ज्ञान शायद डरे हुए आम आदमी को रास नहीं आया। इसलिए वह कुछ देर तक विचलित भाव के साथ खड़ा रहा। फिर पत्नी याद आ गई तो सरपट दौड़ पड़ा घर की ओर।

(ए. जयजीत संवाद की अपनी विशिष्ट शैली में लिखे गए तात्कालिक ख़बरी व्यंग्यों के लिए चर्चित हैं। मूलत: पत्रकार जयजीत फिलहाल भोपाल स्थित एक प्रतिष्ठित मीडिया हाउस में कार्यरत हैं। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया तीनों का उन्हें लंबा अनुभव रहा है।)


शुक्रवार, 15 अक्तूबर 2021

Humour : रात के अंधेरे में दो रावणों की मुलाकात!

 

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ए. जयजीत

जैसे-जैसे विजयादशमी नज़दीक आती है, बड़े रावण की छोटे वाले से कोफ़्त बढ़ती जाती है। विजयादशमी के दिन तो वह फूटी आंख नहीं सुहाता। सोचता, यह जितनी जल्दी यहां से टले, उतना अच्छा। लाज़िमी भी है। मंच पर भाषण वो दे, समिति वालों को चंदा वो दे और सारा अटेंशन लूट ले जाए मैदान में खड़ा छटाक भर का रावण। कद बड़ा हुआ तो क्या हुआ, रावणत्व में तो छोटा ही है।

छोटे रावण ने कभी अपहरण कांड करके अपनी मतिहीनता का परिचय दिया था। अब विजयादशमी की एक रात पहले ही छोटे वाले को निपटाने की प्लानिंग कर बड़ा रावण अपनी मतिहीनता का परिचय दे रहा है।

बड़े रावण ने इस काम को सहयोगियों को सौंपने का जोख़िम नहीं लिया। आजकल सहयोगियों का क्या भरोसा। कल विरोधियों के साथ मिलकर उसे सारे जहां में बदनाम कर दें। बदनामी से ये अपने वाला बड़ा रावण नहीं डरता। एक से बढ़कर एक बदनामियां उसके खींसे में हैं। लेकिन यह छोटी-सी बदनामी उसकी राजनीति पर दाग बन सकती है। वैसे तो दागों से भी बड़े रावण का कोई दुराव नहीं। करप्शन से लेकर रैप टाइप के बड़े-बड़े दाग। लेकिन यह मामला रिलेजियशली सेंसेटिव है। इसलिए किसी तरह का रिस्क लेना ठीक नहीं, यह सोचकर बड़ा रावण विजयादशमी की एक रात पहले दशहरा मैदान में पसरी चुप्पी के बीच स्वयं ही मोर्चे पर जुट गया। चुपचाप पेट्रोल की कैन हाथ में लिए सधे हुए कदमों से बीच मैदान में खड़े छोटे रावण के पास पहुंच गया। कुंभकर्ण तो हमेशा ही तरह सो रहा था। उधर, इतने सालों से हर साल मरते-मरते मेघनाथ भी किंकत्तर्व्यविमूढ़ हो चुका है। इसलिए वह भी 'कल मरना है तो आज टेंशन क्यों लेना' टाइप की बातें सोचकर मजे से खर्राटे ले रहा था।

हमारे अपने इस बड़े रावण को वैसे भी कुंभकर्ण और मेघनाथ से कोई खास लेना-देना नहीं था। उसे तो केवल छोटे रावण से ही इन्फीरियोरिटी कॉम्लेक्स रहा है। तो उसके निशाने पर छोटा रावण ही था जो छोटा होने के बावजूद करीब 71 फीट ऊंचा था। छोटे रावण ने केवल आंखें मूंद रखी थीं। उसकी आंखों में नींद कहां! बड़े रावण के कदमों की आहट सुनते ही आंखें खोल लीं। नीचे छोटे कद के बड़े रावण को देखते ही बोल उठा- 'आओ गुरु, तुम्हारा ही इंतज़ार कर रहा था।'

बड़ा रावण चौक गया। उसे छोटे रावण के बोलने से अचरज़ नहीं हुआ, पर अपनी प्लानिंग का भांडाफोड़ होने का डर सताने लगा। बड़े रावण ने घबराकर पेट्रोल की कैन को अपने सफेद कुर्ते के पीछे छिपाने की विफल कोशिश की। 

'मुझे मारने की प्लानिंग, वह भी पेट्रोल से! इसे ही कहते हैं विनाश काले विपरीत बुद्धि। मैं खुद एक बार इसका शिकार हो चुका हूं और उसी का ख़ामियाज़ा आज तक भुगत रहा हूं। सोचो, मुझे समय से पहले मारने के मामले की अगर कल फोरेंसिक जांच हो जाती तो तुम यूं ही फंस जाते। आखिर इन दिनों पेट्रोल कौन अफोर्ड कर सकता है? तुम जैसे गिने-चुने लोग ही, जिनके पास ऑलरेडी कई-कई पेट्रोल पंप हैं।'

बड़े रावण ने चुपचाप पेट्रोल की कैन अपनी जिप्सी में रख दी। मन ही मन सोचा- स्साला ऐसे ही ज्ञानी नहीं कहलाता है। और यह सोचकर छोटे रावण के प्रति उसका विषाद और बढ़ गया। बड़ा रावण बखूबी जानता है कि वैसे तो उसने एक से एक नीच काम किए हैं, पर यह धार्मिक आस्था का मामला है। खुलासा होते ही उसकी राजनीति ख़त्म समझो। कैन रखकर वापस आने पर उसने अपनी सफाई देने की कोशिश की तो जबान लड़खड़ाने लगी। कोई कितना भी बेशर्म हो, गलत काम पकड़ में आने पर शुरू में तो हकलाने का नैतिक साहस आ ही जाता है।

छोटा रावण बड़े रावण की चिंता समझ गया - 'मैं जानता हूं कि इतना नीच काम तो तुमको ही शोभा देता है, फिर भी धर्म के मामले में तुमने यह गलती कैसे कर दी?'

इतना सुनते ही बड़ा रावण छोटे रावण के कदमों में गिर पड़ा - 'बताइए, मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूं? बस, आज की इस घटना के बारे में किसी से कुछ मत कहना। पब्लिक मेरे सौ गुनाह माफ़ कर सकती है, लेकिन धर्म के मामले में छोटी-सी गलती भी बर्दाश्त नहीं करेगी। भाई साहब बचा लो। नहीं तो मेरी राजनीति डूब जाएगी।' बड़ा होकर भी छोटे को कब भाई साहब कहना है, बड़े रावण इस मामले में ज्यादा ज्ञानी हैं।

'क्या कर सकते हो तुम?' छोटे रावण को थोड़ी दिल्लगी करने का मन हुआ। पूरी रात बची थी। करता भी क्या तो सोचा कुछ टाइम पास ही कर लेते हैं।

'मैं आपके लिए सबकुछ कर सकता हूं। आपको अपने किसी रिश्तेदार के लिए कोई एजेंसी-वेजेंसी चाहिए या किसी को दारू का ठेका दिलवाना हो तो बताइए।' बड़े रावण ने पहला ऑफ़र पटका।

'मेरे दो प्रिय रिश्तेदार तो यहीं हैं। हमेशा की तरह ये भी कल मेरे साथ ही जाएंगे।'

'फिर भी कोई भतीजा-भांजा। साला, बहनोई। अपन किसी को भी ओब्लाइज कर सकते हैं। बस आप इशारा कीजिए।'

छोटा रावण चुप रहा। अंदर ही अंदर मंद-मंद अट्टहास करता रहा।

'या आप कहें तो आपकी यह रात सजा दूं? शराब-शबाब एक से बढ़कर एक। बताओ तो सही।' बड़े रावण ने कुटिल मुस्कान के साथ कहा। काफ़ी अनुभवी रहे हैं इस मामले में बड़े रावणजी।

अब छोटा रावण बड़े रावण की इस मूर्खतापूर्ण बात पर क्या कहें, मन ही मन अट्‌टहास करने के सिवाय। इधर छोटे रावण की चुप्पी अब बड़े रावण को भयभीत कर रही है। स्साला पता नहीं क्या चाह रहा है? लगता है ऑफ़र बढ़ाने होंगे।

'कोई केस हटवाना हो? रैप से लेकर मर्डर तक, कोई भी केस। किसी के भी ख़िलाफ़। अपनी सब सेटिंग है। या किसी शत्रु के ख़िलाफ़ सीबीआई की कोई रेड डलवानी हो?' उसने एक और ऑफ़र पटका।

छोटा रावण अब भी चुप है। बड़े रावण की बेचैनी बढ़ती जा रही है। और निकट आकर उसने फुसफुसाते हुए कहा - 'इन दिनों अपन ड्रग्स के धंधे में भी आ गए हैं। भतीजा संभालता है सबकुछ। बहुत चोखा धंधा है। आप कहो तो 15 टका आपका।'

इधर छोटा रावण भी बेचैन हो रहा है। बड़ा रावण नीच है, यह तो उसे पहले से ही मालूम था, पर इतना नीच निकलेगा, इसका ज्ञान उस जैसे ज्ञानी को भी आज ही हुआ। उसने कुंभकर्ण और मेघनाथ पर नज़रें दौड़ाई। यहां मैदान में इतनी बड़ी-बड़ी बातें हो रही हैं, पर दोनों को कोई फिक्र नहीं। खर्राटे लेकर मजे से सो रहे हैं स्साले। काश मेघू ये सब सुन पाता। गुस्से का तो शुरू से तेज रहा है। तो बड़े रावण का दहन यहीं इसी समय हो जाता। पर क्या करें, सोने से फुर्सत मिले तब तो!  

इधर बड़े रावण की बेचैनी का तो पूछो ही मत। 'भाई साहब, आप चाहते क्या हो? खुद ही बता दो।' छोटे रावण को चुप देखकर एक और ऑफ़र पटका- 'चलिए, आपको पर्सनल फेवर नहीं चाहिए, कोई बात नहीं। इन दिनों आपके लंकावालों की चीन के साथ बड़ी पींगे बढ़ रही हैं। कोई गुप्त कागजात, नक्शे-वक्शे उपलब्ध करवाना हो तो वह बता दीजिए। आपके लिए यह भी करने की कोशिश कर सकता हूं।'

बड़ा रावण और क्या करता। बेचारा कितनी कोशिश करता। ऑफ़र पर ऑफ़र। ऐसे ही सुबह हो गई।

पौ फटते ही जब नाइट ड्यूटी वाले गार्ड्स आंखें मलते हुए मैदान पर आए तो अनहोनी की ख़बर तुरंत समिति वालों को दी गई। समिति वाले भी आए तो छोटा रावण मैदान पर आड़ा पड़ा हुआ था। बड़ी अनहोनी घट चुकी थी।

पहले तो गार्ड्स को फटकारा - स्सालो, सोते रहते हों! रात को क्या हुआ, तुम्हें नहीं पता तो किसको होगा? फिर उन्होंने प्रश्नवाचक निगाहों से मेघनाथ की ओर देखा। पर स्वयं मेघनाथ के चेहरे पर ही प्रश्नवाचक नज़र आया- पिताश्री हमसे पहले ही कैसे निकल लिए? उधर कुंभकर्ण तो अब भी सो रहा था।

बहुत कोशिश की, लेकिन समिति वाले छोटे रावण को खड़ा नहीं कर पाए। समिति के अध्यक्ष जो संयोग से डॉक्टर भी थे, ने कहा, रात को शायद कोई तगड़ा आघात लगा हो। इसलिए अटैक आ गया होगा।

सचिव ने कहा - कोई बात नहीं सर। हम नेताजी से रिक्वेस्ट कर लेंगे। वे आड़े रावण का ही अंतिम संस्कार कर देंगे। इस मामले में बड़े नेक हैं।

अब यह हकीकत शायद ही किसी को पता चले कि छोटे रावण ने सुबह होते-होते अपनी दिव्य शक्तियों के बल पर सुसाइड कर लिया था।

(ए. जयजीत संवाद की अपनी विशिष्ट शैली में लिखे गए तात्कालिक ख़बरी व्यंग्यों के लिए चर्चित हैं। मूलत: पत्रकार जयजीत फिलहाल भोपाल स्थित एक प्रतिष्ठित मीडिया हाउस में कार्यरत हैं। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया तीनों का उन्हें लंबा अनुभव रहा है।)


शनिवार, 9 अक्तूबर 2021

Satire : आजम खान की उसी भैंस का एक्सक्लूसिव इंटरव्यू जो मंत्री पुत्र की तरह "मिसिंग' हो गई थी!

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By Jayjeet

केंद्रीय मंत्री अजय मिश्र के पुत्र के मिसिंग होने की खबर क्या आई, उसमें वैल्यू एडिशन करने के चक्कर में रिपोर्टर पहुंच गया सीधे उसी वर्ल्ड फेमस भैंस के पास जिसे उप्र की पुलिस ने सालों पहले बड़ी मशक्कत के बाद ढूंढ निकाला था। आजम साहब की तरह आज भैंस भी बूढ़ी हो चुकी है, वैसी निस्तेज भी। पर रिपोर्टर को देखते ही पूछा-

भैंस : क्यों आए हो भैया?

रिपोर्टर : मैं रिपोर्टर।

भैंस : रिपोर्टर हो, यह तो शक्ल-सूरत से ही पता चल जाता है। पर आए क्यों हो? दूहने के लिए कुछ ना बचा मेरे पास।

रिपोर्टर : मैं जानता हूं, आपमें और देश में कोई अंतर नहीं रहा है।

भैंस : गलत बात। देश पर नेताओं-अफसरों का भरोसा बाकी है। अब भी उसमें बहुत कुछ बाकी है दूहने के लिए। इसीलिए अपनी दूसरी पीढ़ी के भी हाथ मजबूत करने में लगे हैं ताकि दोहते-दोहते जान चली जाए, पर हाथ ना थके। खैर, मुद्दे पर आओ।

रिपोर्टर : आपने तो दूसरी पीढ़ी की बात कहकर मेरे लिए बात आसान कर दी। मैं माननीय मंत्रीजी के उस सुपुत्र के संदर्भ में ही आपसे चर्चा करने आया हूं जिसे उप्र पुलिस अब तक ढूंढ नहीं पाई है। किसी जमाने में आपने भी पुलिस की नाक में दम कर दिया था। अपने अनुभव बताइए ना जरा।

भैंस : (शर्माते हुए) अब क्या बताऊं। वो तो मैं भैंस कुमार के चक्कर में जरा घर से बाहर निकल गई थी। वह पूरा मामला पर्सनल था, पर मंत्रीजी की भैंस होने के कारण पब्लिक हो गया था। फिर शर्मिंदगी से बचने के लिए मेरी चोरी और मिसिंग की रिपोर्ट दर्ज करवानी पड़ी।

रिपोर्टर : तो फिर पुलिस ने आपको ढूंढा कैसे?

भैंस : हूम..पुलिस क्या खाक ढूंढती। वो तो मुझे पता चला कि पुलिस हमारी ही किसी दूसरी बहन के साथ मारपीट कर उससे यह कबूलवाने की कोशिश कर रही थी कि वह वही भागी हुई भैंस यानी मैं हूं। यह अन्याय मैं कैसे देख सकती थी! तो पुलिस के पास खुद ही आ गई।

रिपोर्टर : पर आरोप यह है कि जब आप मिसिंग हुई थी तो आपको ढूंढने के लिए उप्र का पूरा पुलिस महकमा लग गया था। और अब मंत्री पुत्र मिसिंग है तो पुलिस हाथ पर हाथ धरकर बैठी है। कुछ ना कर रही।

भैंस : आप पत्रकारों की यही दिक्कत है। दूसरों ने आरोप लगा दिया और आपने मान लिया। भाई, यहां भी तो पूरा महकमा लगा है मंत्री पुत्र के लिए। वो जिस बंगले में ठहरा है, उसके आसपास भारी संख्या में पुलिस बल तैनात कर रखा है। उससे बाहर आने का सविनय अनुरोध किया गया है। जल्दी ही बाहर आ जाएगा। अब अगर पुलिस जोर-जबरदस्ती करती तो तुम्हीं लोग उसका इश्यू बना देते।

रिपोर्टर : पर वो तो आरोपी है। उसकी इतनी सुरक्षा?

भैंस : पुलिस के लिए वह केवल मंत्री पुत्र है। आरोप है तो कोर्ट को तय करने दो। बेचारी पुलिस को क्यों इस झमेले में डाल रहे हो। वह अपना कर्त्तव्य निभा रही है, उसे निभाने दो।

रिपोर्टर : आपको पुलिस के साथ बड़ी हमदर्दी है?

भैंस : जिस दिन आप वीआईपी बन जाआगे तो उस दिन से आपको भी पुलिस के साथ पूरी हमदर्दी हो जाएगी। पुलिस को समझना हर किसी के लिए आसान नहीं है। वीआईपी या वीआईपी पुत्र या वीआईपी भैंस बनकर ही पुलिस को समझा जा सकता है। आप जैसे आम आदमी टाइप के लोग क्या समझोगे। अब फिनिश कीजिए, मेरे ख्याल से आपका वैल्यू एडिशन हो गया होगा। टीवी चैनलों से फोन आने लगे हैं।

(ए. जयजीत संवाद की अपनी विशिष्ट शैली में लिखे गए तात्कालिक ख़बरी व्यंग्यों के लिए चर्चित हैं। मूलत: पत्रकार जयजीत फिलहाल भोपाल स्थित एक प्रतिष्ठित मीडिया हाउस में कार्यरत हैं। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया तीनों का उन्हें लंबा अनुभव रहा है।)


गुरुवार, 7 अक्तूबर 2021

Satire : मसख़रे ना होते तो भारतीय राजनीति का क्या होता?

 


By जयजीत

हम मसख़रों पर हंस सकते हैं, लेकिन उनकी अवहेलना नहीं कर सकते। क्योंकि इसका मतलब होगा देश की पूरी राजनीति और लोकतंत्र को ख़तरे में डाल देना। याद रखें, उन्हें लोकतंत्र को गाहे-बगाहे ख़तरे में डालने का अधिकार है, हमें नहीं। तो हम क्या करें? एक मसख़रे से बात ही कर लेते हैं।

- आप मसख़रे होकर भी राजनीति में हैं?

- (जोरदार ठहाका) बर्बाद गुलिस्तां करने को बस एक ही मसख़रा काफ़ी था, यहां तो मसख़रों की दुकान सजी है...। भाई, राजनीति में जिधर देखो, उधर मसख़रे ही मसख़रे हैं और तुम पूछ रहे हो मैं मसख़रा होकर भी राजनीति में क्यों हूं? इससे वाहियात सवाल नहीं हो सकता था क्या? मैं मसख़रा हूं, इसीलिए तो राजनीति में हूं।

- मतलब आप यह कहना चाहते हैं कि मसख़रा होना भी राजनीति की एक योग्यता है?

- (फिर जोरदार ठहाका) मसख़रा होना भी? अरे भाई, मसख़रा होना ही राजनीति की अनिवार्य योग्यता है। आज से नहीं हमेशा से यह अनिवार्य योग्यता रही है। मैं बहुत सारे नाम गिनवा सकता हूं, पर इसलिए नहीं गिनवा रहा हूं क्योंकि जिनके नाम नहीं लूंगा, उनके समर्थक-भक्त बुरा मान जाएंगे कि हमारे नेता का नाम क्यों नहीं लिया। क्या वे मसख़री में किसी से कम थे!

- आप एक अलग तरह के मसख़रे हैं और आपके जो विरोधी हैं, वे अलग तरह के मसख़रे हैं। तो मसख़रे-मसख़रे में भी अंतर होता है?

- (इस बार ठहाका नहीं) वैसे तो मसख़रों को बांटना नहीं चाहिए। मसख़रे धर्म-जात-पांत के भेदभाव से परे होते हैं। उनका मसख़रा होना ही पर्याप्त होता है। पर चूंकि बांटना हम नेताओं की फितरत होती है तो हमने मसख़रों को भी दो वर्गों में बांट रखा है। एक मसख़रे वे होते हैं जो पैदाइशी ही मसख़रे होते हैं। मसख़रापना उनके लिए गॉड गिफ्टेड की तरह होता है। ऐसे मसख़रे राजनीति में बड़े सहज होते हैं, बल्कि कहना चाहिए राजनीति उनके साथ कहीं ज्यादा सहज और सुरक्षित महसूस करती है। दूसरे प्रकार के मसख़रे वे होते हैं, जिनका जन्म तो सामान्य मनुष्य की तरह होता है। लेकिन उन्हें मसख़रा बनने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है। जैसे-जैसे इनका मसख़रापना बढ़ता और निखरता जाता है, राजनीति में ये ऊंचे पायदानों पर पहुंचते जाते हैं। हमारी राजनीति में अधिकांश मसख़रे इसी श्रेणी के हैं।

- यह फर्जीवाड़े का दौर है। हर तरफ़ फेक ही फेक नज़र आता है। तो क्या इन दिनों राजनीति में फेक मसख़रों का ख़तरा बढ़ नहीं गया है?

- सच्चाई छुप नहीं सकती बनावट के उसूलों से। कि खुशबू आ नहीं सकती कभी कागज़ के फूलों से। यह शेर सुना ही होगा। यही स्थिति फेक मसख़रों के साथ होती है। राजनीति में ऐसे फेक मसख़रे ज्यादा दिन नहीं टिकते। जरा-सा गंभीर होते ही उनका फर्जीवाड़ा सामने आ जाता है। राजनीति के सच्चे मसख़रे केवल ईमानदारी की बात करते हैं, सिद्धांतों की बात करते हैं, अपने राज्य की प्रतिष्ठा की बात करते हैं, भ्रष्टाचार को मिटाने की बात करते हैं। अपनी इन बातों पर थोड़ा-सा भी अमल करते ही उनका पर्दाफाश हो जाता है। समझ लीजिए ऐसे फेक मसख़रे देश-समाज के लिए बड़े घातक हैं और हम सभी को इनसे बचकर रहने की ज़रूरत है। वैसे ईमानदारी की बात यह भी है कि भले ही हर जगह फेक चीजें बढ़ रही हैं, लेकिन राजनीति में फेक मसख़रे कम हो रहे हैं। अब तो कॉम्पीटिशन इस बात को लेकर है कि मेरा मसख़रापना तेरे मसख़रेपने से कितना खरा। इस बात पर ठोंको ताली।

- राजनीति में मसख़रेपने के क्या फायदे हैं?

- फायदे ही फायदे हैं। इसीलिए तो राजनीति में हर कोई मसख़रा होने के लिए मरा जाता है। इसका सबसे बड़ा फायदा तो यही है कि कोई भी आपको गंभीरता से नहीं लेता। गंभीरता से नहीं लेने के अनेक फायदे हैं। आप बिना बात के भी जोर-जोर से हंस सकते हैं। आपके इस हंसने पर भी कोई आप पर हंसेगा नहीं। आप कैसी भी शेरो-शायरी सुना सकते हैं। उसे सुनकर कोई अपने बाल नहीं नोंचेगा। आप चाहे बात-बात में तालियां बजा या बजवा सकते हैं। इसमें भी बेनिफिट ऑफ डाउट आपको ही जाएगा क्योंकि आप तो मसख़रे हैं।

- लेकिन जब आपको कोई गंभीरता से नहीं लेगा तो हाईकमान भी आपको गंभीरता से क्यों लेगा?

- (इस बार जोर का ठहाका) क्या कभी उल्लू को रात में सोते देखा है, क्या कभी मछलियों को साबुन से नहाते देखा है? अरे हाईकमान किसी भी पार्टी का हो, क्या उसे गंभीर होते देखा है? लगता है आपके पास सवाल खत्म हो गए हैं। अगर कोई हाईकमान में बैठा है तो वह मसख़रेपन की तमाम स्टेजों को पार करके ही तो वहां पहुंचा होगा ना। सिम्पल बात, लेकिन सिम्पल बातें ही आजकल बड़ी काम्प्लीकैटेड हो गई हैं।

- आखिरी सवाल। अगर आप मसख़रे ना होते तो क्या होते?

- यह तो वैसा ही सवाल है कि अगर कमला की मूंछे होतीं तो वह क्या होती? तो वह कमला नहीं, कमल होती। अगर मैं मसख़रा ना होता तो यूं आपके सामने ना होता। आप जनाब यूं मुझसे सवाल ना पूछ रहे होते। मैं भी आप जैसे आम लोगों की भीड़ का हिस्सा रहा होता। इसलिए मसख़रों को गंभीरता से लेना सीखिए। सवाल तो यह बनता है कि मसख़रे ना होते तो भारतीय राजनीति का क्या होता? चूंकि आपने यह पूछा नहीं तो इसका जवाब भी मैं नहीं दूंगा। आप खुद ही अंदाजा लगा लीजिए। ताली ठोंकिए और मुझे अनुमति दीजिए।

(ए. जयजीत संवाद की अपनी विशिष्ट शैली में लिखे गए तात्कालिक ख़बरी व्यंग्यों के लिए चर्चित हैं। मूलत: पत्रकार जयजीत फिलहाल भोपाल स्थित एक प्रतिष्ठित मीडिया हाउस में कार्यरत हैं। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया तीनों का उन्हें लंबा अनुभव रहा है।)


रविवार, 3 अक्तूबर 2021

Satire & Humor : अकबर रोड का वह भूत; कभी हंसता है, कभी रोता है…

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ए. जयजीत

हिंदुस्तान के एक अज़ीम शासक अकबर के नाम पर बनी सड़क पर स्थित है वह महल। आज खंड खंड। नींव मजबूत है, लेकिन कंगुरे या तो ढह चुके हैं या ढहने के कगार पर हैं। ढहते कंगुरों से लटके शीर्षासन करते चमगादड़ महल के भूतिया गेटअप को बढ़ाने का ही काम करते हैं। इस अफवाह के बाद कि इस खंड-खंड इमारत से अक्सर किसी भूत के रोने की आवाजें आती हैं, आज पूरे मामले की तफ्तीश करने निकला है वह भूतिया रिपोर्टर। हाथ में टिमटिमाती लालटेन के साथ वह उस इमारत के सामने खड़ा है। भानगढ़ के भूतिया किले से कई बार रिपोर्ट कर चुका वह जांबाज रिपोर्टर भूत मामलों का एक्सपर्ट हैं। भूतिया रिपोर्टर्स के हाथों में पेन या माइक टाइप का तामझाम हो या ना हो, लेकिन पुरानी वाली टिमटिमाती लालटेन होती ही होती है। भूतिया महलों की रिपोर्टिंग करने वाले अनुभवी रिपोर्टर जानते होंगे कि ऐसे मौकों पर टिमटिमाटी लालटेन भूतों के लिए "बिल्डिंग कॉन्फिडेंस' का काम करती है।

तो आइए चलते हैं उसी खंड खंड इमारत के पास...

एक हाथ में लालटेन लिए रिपोर्टर ने दूसरे हाथ से जैसे ही इमारत का मुख्य दरवाजा खोला, सफेद बालों में खड़ा भूत सामने ही नजर आ गया। रिपोर्टर चौंका - हें, ये कैसा नॉन ट्रेडिशनल टाइप का भूत है जो तुरंत आ गया। न सांय-सायं की आवाज आई। काली बिल्ली भी झांकती नजर नहीं आई। उसे खटका तो उसी समय हो गया था, जब दरवाजा भी बहुत स्मूदली खुल गया था। और फिर स्साले चमगादड़ भी कंगुरों पर लटके हुए टुकुर-टुकुर देखते ही रहे। मजाल जो उड़कर माहौल बनाने आ जाए। सालों से एक जगह पड़े-पड़े उनके परों में जैसे जंग लग गया हो। खैर, तुरंत अपनी विचारतंद्रा को तोड़ते हुए भूतिया रिपोर्टर ने टांटनुमा डायलॉग मारा, "हम पूरी तरह आए भी नहीं और आप उससे पहले ही पधार गए! कुछ इंतजार तो करते। माहौल-वाहौल तो बनने देते। भूतों के लिए इतनी अधीरता ठीक नहीं।'

"मैं गया ही कहां था जो आऊंगा़? मैं तो यहीं था। शुरू से यहीं था। लोगों ने जरूर मेरे पास आना छोड़ दिया। शुक्र है आप तो आए बात करने।'

"मतलब? आप हैं तो भूत ही ना?' रिपोर्टर को अब भी भरोसा नहीं हो रहा। दरअसल, भानगढ़ के किले में चिरौरी करनी पड़ती, तब कोई आता।

"हां भई, अब मैं भूत ही हूं। 135 साल पुराना भूत। एंड आई एम प्राउड ऑफ माय भूतपना।'

"वाह जी, ऐसा भूत तो पहली बार देख रहा हूं जिसे अपने भूतपने पर प्राउड हो रहा है।'

"जब वर्तमान ठीक न हो और भविष्य नजर न आ रहा हो तो अपने भूतपने पर ही प्राउड करना चाहिए। वैसे आप तनिक आराम से बैठो और अपनी लॉलटेन बुझा दो। तेल वैसे भी बहुत महंगा हो गया है। विरोध करने वाला भी कोई नहीं है।'

"लेकिन... लेकिन भूत जैसे कोई लक्षण तो हैं नहीं। आपके तो उलटे पैर भी नहीं हैं। भानगढ़ के भूतिया किले के तो सभी भूतों के पैर उलटे होते हैं।' रिपोर्टर बार-बार कंफर्म कर रहा है। कहीं ऐसा न हो कि धोखा हो जाए।

"अरे भाई, किसने कहा कि भूत के लिए उलटे पैर होना जरूरी हैं? कांग्रेस होना ही काफी है।'

"अच्छा, तो आप कांग्रेस के भूत हैं? तभी लोगों को अक्सर यहां से रोने की आवाजें सुनाई देती हैं।'

"हां भाई, रोऊं नहीं तो क्या करुं?'

"लेकिन अगर आप कांग्रेस के भूत हैं तो फिर 10 जनपथ पर कौन हैं?'

"वो कांग्रेस का वर्तमान है, पर कांग्रेस का भूत तो मैं ही हूं। पक्का...।'

"और भविष्य?'

"यह भूत से नहीं, वर्तमान से पूछो। भविष्य तो वर्तमान ही तय करता है, भूत नहीं।'

यह कंफर्म होने के बाद कि वह भूत से ही बात कर रहा है, भूतिया रिपोर्टर अब सहज हो चुका है। भूत की एडवाइज पर लालटेन बुझा दी है। दरवाजा बंद कर दिया है ताकि ढहते हुए कंगुरों पर जोंक की तरह चिपके चमगादड़ उसके इंटरव्यू को पहले ही लीक ना कर दें।

"तो आप अक्सर रोते ही हैं?' भूतिया रिपोर्टर ने इंटरव्यू की शुरुआत करते हुए एक घटिया-सा सवाल दागा।

"आपने तो भानगढ़ के किले में काफी भूतों को कवर किया है। फिर भी ऐसा भूतिया टाइप का सवाल पूछ रहे हैं? आप तो जानते ही होंगे कि भूत दो काम बहुत ही एफिशिएंसी के साथ करते हैं। एक, रोने का और दूसरा हंसने का। मैं दोनों काम बखूबी करता हूं। अपने अतीत को देख-देखकर मुस्कुराता हूं, हंसता हूं, ठहाके लगता हूं। वर्तमान को देखकर रोता हूं।'

"अकेले रोते या हंसते हुए आप बोर नहीं हो जाते हैं?'

"अक्सर शहंशाह-ए-अकबर का भूत भी इस सड़क पर आ जाता है, खैनी मसलने के लिए। वह भी तो इन दिनों फालतू है।'

"अच्छा, इस अकबर रोड पर?'

"हां, उसके नाम पर रोड रखी है तो वह यही मानता है कि ये उसी के बाप की, आई मीन उसी की रोड है। तो वह अपनी इस रोड पर अक्सर मिल जाता है। फिर हम दोनों सामूहिक रूप से रोनागान करते हैं।'

"आपका रोना तो समझ में आता है। पर वह क्यों रोता है?'

"फिर वही भूतिया सवाल। अरे भाई, जैसे मेरे वंशजों ने मुझे बर्बाद किया, तो उसके भी बाद के वंशज कहां दूध के धुले थे। इसलिए वह भी बेचारा जार-जार रोता है।'

.... और बातचीत का सिलसिला चलता रहा, चलता रहा, चलता रहा। बाहर कंगुरों पर लटके चमगादड़ों में अब बेचैनी होने लगी थी। पंख फड़फड़ाने लगे थे। इस बीच, काली बिल्ली की भी एंट्री हो गई थी। मुंह बनाते हुए झांककर दो-तीन बार देख भी गई थी। खिड़की में एक साया भी झांकते हुए नजर आया, पर तुरंत लौट भी गया। शायद अकबर का भूत होगा। अब बारी कुछ अंतिम सवालों की थी -

"बताइए, मैं आपके लिए क्या कर सकता हूं?' सवाल इस बार का संकेत था कि भूत अपनी पूरी रामकहानी बहुत ही दुखद अंदाज में सुना चुका था और भूतिया रिपोर्टर के लिए सहानुभूति दर्शाने की यह औपचारिकता निभानी भी जरूरी थी।

"बस, अब बहुत हो गया। मेरी मुक्ति का इंतजाम करवाइए।' भूत ने उसी बेचारगी के भाव के साथ कहा, जैसा उसने पूरे इंटरव्यू के दौरान बनाए रखा होगा।

"उसकी तो मोदीजी कोशिश कर रहे हैं। लेकिन अगर आप पूरी तरह से मुक्त हो जाएंगे तो फिर झंडेवालां पर बैठे लोगों को डराएगा कौन? वे न वर्तमान से डरते हैं, न भविष्य से। उन्हें तो केवल आपसे डर लगता है। और यह डर अच्छा है। उन लोगों के लिए भी, देश के लिए भी और देश की जनता के लिए भी।'

"अच्छा!! तो मैं दूसरों के लिए यूं ही भटकता रहूं, रोता रहूं जार-जार?'

"इंतजार कीजिए ना। हो सकता है, आपके भूत से ही भविष्य पैदा हो। जब वर्तमान नपुंसक हो तो भविष्य को पैदा करने की जिम्मेदारी भूत को ही उठानी पड़ती है। जिम्मेदारियों से मत भागिए। सोचिए, क्या कर सकते हैं। तब तक मैं यह रिपोर्ट फाइल करके आपसे फिर मिलता हूं...'

और लॉलटेन जलाकर दरवाजे से बाहर निकल गया भूतिया रिपोर्टर। ढहते कंगुरों पर उलटे लटके चमगादड़ अब सीधे खड़े हो गए हैं। फिलहाल वे वेट एंड वॉच की मुद्रा में हैं...!

(ए. जयजीत संवाद की अपनी विशिष्ट शैली में लिखे गए तात्कालिक ख़बरी व्यंग्यों के लिए चर्चित हैं। मूलत: पत्रकार जयजीत फिलहाल भोपाल स्थित एक प्रतिष्ठित मीडिया हाउस में कार्यरत हैं। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया तीनों का उन्हें लंबा अनुभव रहा है।)

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