रविवार, 30 अप्रैल 2023

राजनीति के आगे जब चैम्पियन्स हाथ जोड़ने को मजबूर हो जाएं...!!!


By Jayjeet Aklecha

यौन शोषण के आरोपों पर एफआईआर दायर होने के बाद भारतीय कुश्ती संघ के अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह की पहली प्रतिक्रिया थी कि वह पूरी तरह मजे में है। जिस व्यक्ति पर हत्या के प्रयास करने सहित पहले से ही अनगिनत मामले दर्ज हों (ADR के अनुसार चार और याचिकताकर्ताओं के वकील के अनुसार 40), जिस पर कभी दाऊद इब्राहिम के साथियों को शरण देने का संगीन आरोप भी लग चुका हो, वाकई उसे इन 'छोटे-मोटे' आरोपों से क्या फर्क पड़ेगा?
लेकिन आरोपी के मजे में होने, उसकी नजर में 'छोटे-मोटे' आरोप होने के बावजूद ये आरोप इसलिए गंभीर हैं, क्योंकि ये उन बेटियों ने लगाए हैं, जिनकी उपलब्धियों पर पूरा देश पार्टी लाइन से ऊपर उठकर गर्व करता है। ये आरोप गंभीर इसलिए भी हैं, क्योंकि बेटियों की उपलब्धियों की बात करते समय हमारे देश के प्रधानमंत्री की आंखें भी हमेशा गर्व से चमक उठती हैं। और ये आरोप इसलिए और भी गंभीर हैं, क्योंकि यह बृजभूषण उसी पार्टी से सांसद है, जो अक्सर उस सनातन संस्कृति की बात करती है, जहां 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः' श्लोक दोहराने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं छोड़ी जाती है।
पर दुर्भाग्यजनक पहलू यह है कि इस पूरे मसले का भी राजनीतिकरण हो गया है। हमारे यहां समस्या ही यह है कि हर मामले का राजनीतिकरण हो जाता है और भोली जनता उसकी बात को ही सच मानने लगती है, जिसकी राजनीति में ज्यादा दम होता है। अब देखिए ना, खबरें आ रही हैं कि यूपी के कुछ संतों ने भी भोलेपन में कह दिया है कि वे यौन शोषण के आरोपी बृजभूषण शरण सिंह के समर्थन में जंतर-मंतर पर जाकर पहलवानों के खिलाफ धरना देंगे।
पर एक चिंता यह भी है। अगर भविष्य में इनमें से कोई महिला पहलवान कभी पदक जीतकर लाती है तो हमारे देश के सर्वोच्च कर्णधाता की आंखों में उसकी उपलब्धि का बखान करते समय क्या वैसी ही चमक होगी? या उस चमक पर बृजभूषण जैसे लोगों की कालिमा का ग्रहण रहेगा?
वैसे यह केवल एक नैतिक सवाल है, जिसका आज के राजनैतिक माहौल में कोई अर्थ नहीं रह गया है। लेकिन यह सवाल तो हमेशा मौजूं रहेगा कि हमने जिन हाथों में मेडल देखे हैं, आखिर सिस्टम के सामने में वे हाथ जुड़ने को मजबूर क्यों हो गए?

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