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रविवार, 19 सितंबर 2021

Satire : ग्राउंडवॉटर रिचार्ज करेंगी मप्र की ये सड़कें


 

By Jayjeet

मेरे शहर में दो सड़कें हैं। वैसे तो कई सड़कें हैं, लेकिन आज हम इन दो सड़कों की बात ही करेंगे। एक ख़ास सड़क है। वह उतनी ही ख़ास है जितना कि ख़ास कोई नेता या अफ़सर या जज या इनकी पत्नियां होती हैं। इसे कहने को वीआईपी रोड कह सकते हैं। वैसे ये ख़ास रोड है तो हुजूर, सरकार, जी मालिक, जी मालकिन टाइप के संबोधन अधिक फबते हैं। दूसरी आम सड़क है। ऐसी आम सड़कों की भरमार है। जिधर देखो उधर आम ही आम सड़कें। यह वैसी ही आम है, जैसे मैं और आप। चूंकि ये आम सड़क है तो आप इन्हें प्यार से अबे, ओए, स्साली जैसा कुछ भी कह सकते हैं। ये बुरा नहीं मानती हैं। आप इन पर थूक सकते हैं, कचरा फेंक सकते हैं। टेंट गाढ़ने के लिए कुदाली चला सकते हैं। मतलब वह सबकुछ कर सकते हैं, जो आप करना चाहें। बड़ी सहिष्णु होती हैं ये आम सड़कें। उफ्फ तक नहीं करतीं।

ये दोनों तरह की सड़कें किसी भी शहर में हो सकती हैं। होती ही हैं। ख़ासकर राजधानियों में। तो फिर आज अचानक इनकी याद कैसे आ गई? बताते हैं हम...

दरअसल, हुआ यूं कि चलते-चलते अचानक ख़ास और आम सड़क की मुलाकात हो गई। ख़ास सड़क ने बाजू ने गुजरती हुई आम सड़क को रोककर हालचाल पूछे। यह कोई मामूली बात है भला! वैसे हालचाल पूछे तो कुछ तो ख़ास बात होगी। कोई ख़ास यूं ही आम टाइप की चीजों से राब्ता नहीं बनाता...

'और कैसी हो आम सड़क?' ख़ास सड़क ने थोड़ी विनम्रता और थोड़े एटीट्यूड के साथ पूछा।

'ठीक ही हूं हुजूर। आज कैसे याद किया?' आम सड़क ने उतनी ही मिमियाती हुई आवाज में पूछा जितना कि एक आम से अपेक्षित होता है।

'इन दिनों तो बड़े जलवे हैं। हर जगह तुम्हारी ही चर्चा है। सुंदर-सुशील महिलाएं कैटवॉक कर रही हैं। अखबारों में तस्वीरें छपी थीं। देखी थी मैंने।' ख़ास सड़क ने बड़े ही ख़ास अंदाज में कहा।

यह एक सहज गुण है कि कभी किसी दिन गरीब को दो जून की रोटी से एक रोटी भी ज्यादा मिल जाती है तो अमीर के पेट में दर्द-सा उठ जाता है। ख़ास सड़क भी इससे परे नहीं है। दिनभर ख़ासों के साथ रहते-रहते यह ख़ासियत भी आ गई है उसमें।

'वो तो बस यूं ही...।' आम सड़क शर्म से तनिक गुलाबी लाल हो गई। फिर जोड़ा, 'मुझ पर से जो भी गुजरेगा, वह ऐसा ही लगेगा कि कैटवॉक कर रहा है। वे महिलाएं तो सिंपली मुझ पर चलकर गई थीं, लेकिन उनकी वह वॉक ही कैटवॉक बन गई। अख़बारों में तस्वीरें छप गईं। अब देखिए ना उस ऑटो को। देखो तो, कैसे बचता-बचाता चला आ रहा है और ऐसा लग रहा है कि कैटवॉक कर रहा है। सब बरसाती गड्ढों की महिमा है।'

'हूम....।'

ख़ासों के साथ रहते-रहते ख़ास सड़क भी हूम, हम्म करना सीख गई है। जब कुछ जवाब नहीं सूझता तो हूम, हम्म से अच्छा कोई जवाब नहीं होता। ऐसे जवाब अक्सर ख़ास लोगों के मुंह से झरते रहते हैं। बहुत सुंदर लगते हैं। देखिएगा कभी ध्यान से...

'वैसे शिवराज भैया जब चार साल पहले अमेरिका गए थे और कहा था कि अमेरिका की सड़कों से अच्छी तो हमारे यहां की सड़कें हैं तो वे आपकी ही तो बात कर रहे थे।' आम सड़क ने भी अपनी तारीफ़ के जवाब में ख़ास सड़क की तारीफ़ कर बात आगे बढ़ाई।

'हां, वो तो है।' एक हल्की-सी मुस्कान ख़ास के चिकने-चुपड़े चेहरे पर तैर गई। पर बरसाती गड्ढों को देखकर मुस्कान फिर रश्क में बदल गई। इसी ईर्ष्या में गड्ढों को लेकर सुनी-सुनाई बात उसकी जुबान पर आ गई - 'सुना है तुम्हारे इन गड्ढों को लेकर सरकार एक पायलट प्रोजेक्ट पर काम कर रही है!'

'अब ख़ास लोगों के साथ तो आप ही रहती है। तो आपने सही ही सुना होगा। हम क्या कहें। पर गड्ढों पर पायलट प्रोजेक्ट, यह क्या नया तमाशा है?' आम सड़क हो या आम आदमी, उसके लिए सभी प्रोजेक्ट तमाशे से ज्यादा नहीं होते।

'एक्चुअली, कल दो अफ़सर अपनी कार में बैठकर जा रहे थे और तुम्हारे इन्हीं गड्ढों के बारे में बात कर रहे थे। कह रहे थे कि गड्ढों से ग्राउंड वॉटर रिचार्ज करने के प्रोजेक्ट को सरकार ने स्वीकार कर लिया है। बारिश में इन गड्ढों का इस्तेमाल भूजल स्तर में बढ़ोतरी के लिए किया जाएगा।'

'अच्छा? और क्या कह रहे थे?' आम सड़क की दिलचस्पी अचानक उसी प्रोजेक्ट में जाग गई है जिसे वह कुछ देर पहले तमाशा कह रही थी।

'कह रहे थे कि अब सरकार ठेकेदारों को उसी तरह की सड़कें बनाने को पाबंद करेगी जो पहली बारिश में ही पर्याप्त गड्ढेयुक्त हो जाए।'

'हां, यह तो ठीक रहेगा। अभी दो-तीन बारिश का पानी यूं ही बह जाता है। तब जाकर थोड़े बहुत गड्ढे होते हैं। सेटिस्फैक्टरी गड्ढे होने में तो आधा मानसून ही बीत जाता है। पर इस प्रोजेक्ट से सरकार को क्या फायदा होगा?'

हां, मुद्दे की बात तो थी ही। आखिर सरकार को इससे क्या फायदा होगा? क्यों अफ़सर, बड़े अफ़सर, मिनिस्टर, हेड ऑफ मिनिस्टर्स जैसे लोग इतनी मेहनत करें। उनके पास तो जनहित के और भी कई काम होते हैं।

'अफ़सर कह रहे थे कि जब प्रोजेक्ट लागू हो जाएगा तो झीलों-तालाबों में पानी इकट्ठा करने की ज़रूरत ख़त्म हो जाएगी। पूरा पानी जब सीधे ज़मीन के भीतर ही चला जाएगा तो झील-तालाब की ज़मीनों का इस्तेमाल बिल्डरों के कल्याण कार्य हेतु किया जा सकेगा।' ख़ास सड़क ने बात ख़त्म की। दरअसल, यही बताने के लिए ही तो ख़ास सड़क ने आम सड़क से बात शुरू की थी। गॉसिप्स किसी के भी पेट में टिकते नहीं, फिर वह इंसान हो या सड़क अथवा ख़ास हो या आम।

'वॉव! आज पहली बार मुझे आम सड़क होने पर गर्व हो रहा है।' आम सड़क ने केवल सोचा, लेकिन कहा नहीं। क्या पता, ख़ास सड़क बुरा मान जाए।

ख़ास सड़क पहली बार अपनी किस्मत को कोस रही है। वह गड्ढेयुक्त होती तो यह प्रोजेक्ट खुद ही हथिया लेती। हालांकि कहा उसने भी कुछ नहीं। मन मसोसकर रह गई।

दोनों ने अपनी-अपनी राह ली।

शुक्रवार, 20 अगस्त 2021

Satire : चौराहे पर काबुलीवाला और तमाशबीनों की तालियां

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चौराहे पर सवालों की झोली के साथ अकेला खड़ा काबुलीवाला।


 By ए. जयजीत

काबुलीवाला ... हां, वही काबुलीवाला। याद ही होगा सबको। गुरुदेव रवींद्रनाथ की कहानी का पात्र। पांच साल की बच्ची मिनी का अधेड़ दोस्त। गलियों में घूम-घूमकर ड्रायफ्रूट्स बेचता, मिनी में अपनी बेटी को याद करता काबुलीवाला।

आज यह काबुलीवाला फिर आया है। चौराहे पर खड़ा है, अकेला। उसकी यादों में अब कोई बेटी नहीं है, क्योंकि अपनी बेटी को तो वह तालिबानियों के रहमो-करम पर छोड़ आया है। उसकी झोली में अब वे ड्रायफ्रूट्स भी नहीं हैं। कुछ हैं तो चंद सवाल। कुछ पुराने, कुछ नए। वह शायद जानता है कि उसे या उसके सवालों को सुनने वाला भी कोई नहीं है। फिर भी उसने अपनी झोली में कम से कम कुछ सवाल तो बचा रखे हैं।

जब आदमी को कोई सुनने वाला नहीं होता है तो वह खुद से बातें करने लगता है। तब वह पागल भी करार दिया जाता है। और जब कोई पागल जैसी हरकतें करता है तो तमाशा बन ही जाता है। तमाशबीन जुट ही जाते हैं। काबुलीवाला आज पागल की तरह चौराहे पर खड़ा है। झोली से सवाल निकाल रहा है। उसके सवालों के जवाब किसी के पास नहीं हैं। या हैं भी तो जवाब कोई देगा नहीं। तो अपने सवालों के जवाब भी वह खुद ही दे रहा है।

पागलपन बढ़ते ही मजमा भी बढ़ता चला जाता है। काबुलीवाले का मजमा भी बढ़ता जा रहा है। तमाशा देखने के लिए पूरी दुनिया जुट गई है। यह लेखक भी चुपचाप उसी तरह तमाशबीन भीड़ का हिस्सा है, जैसे कई और भी हैं।

काबुलीवाले ने अपनी झोली से पहला सवाल निकाला और खुद ही बड़बड़ाते हुए पूछने लगा :  'हे संयुक्त राष्ट्र, तू क्यों चुप बैठा है? तुझ पर तो हर साल 3 अरब डॉलर खर्च होते हैं। यह इतना पैसा है कि हमारे जैसे कई मुल्कों के बाशिंदों को एक वक्त की रोटी मिल सकती है। मगर यहां रोटी भी नसीब नहीं है। न बहन-बेटियों को इज्जत। फिर भी तू चुप बैठा है? तुझे हमारी कोई चिंता नहीं?'

 पागलपन में आदमी अक्सर अदबी भूल जाता है। नहीं तो काबुलीवाले की क्या औकात कि संयुक्त राष्ट्र से तू-तड़ाके से बात करे! किसी और की भी क्या हैसियत संयुक्त राष्ट्र के सामने!

पर बेचारा संयुक्त राष्ट्र भी क्या करे। उसे तो मालूम भी नहीं होगा कि कोई काबुलीवाला उससे सवाल कर रहा है।  पता नहीं, उसे यह भी मालूम है या नहीं कि दुनिया में अफ़ग़ानिस्तान नाम की कोई जगह भी है। और मालूम करके करेगा भी क्या! अफ़ग़ानिस्तान जैसे तो न जाने कितने देश होंगे। सबकी इतनी फिक्र करेगा तो बड़े देशों की जी-हुजूरी करने का समय कब मिलेगा। जी-हुजूरी को छोटा काम ना समझें। बड़े झंझट होते हैं इसमें। न जाने कितनी बार सिर झुकाना होता है। उनके प्रपोजलों पर हस्ताक्षर करने होते हैं, वह भी आंख बंद करके। उफ्फ!  कितना मुश्किल होता होगा ये सब।  तो उसे अफ़ग़ानिस्तान जैसे छोटे-छोटे मसलों पर फंसाना ठीक नहीं। इसलिए संयुक्त राष्ट्र से सवाल पूछने से बड़ा तालिबानी जुर्म और क्या होगा! वैसे अगर संयुक्त राष्ट्र खुद उस चौराहे पर उपस्थित होता, तब भी इस सवाल का जवाब देना उचित नहीं समझता। हो सकता है किसी अन्य भेष में वह उस चौराहे पर तमाशबीन बना बैठा भी हो।

खुद काबुलीवाला भी जानता है कि संयुक्त राष्ट्र से इसका जवाब नहीं मिलना है। तो उसने खुद ही संयुक्त राष्ट्र की ओर से धीमी मगर सधी हुई आवाज में जवाब देना शुरू किया। वैसे ही जैसे ऐसी संभ्रांत संस्थाओं के कुलीन अफसर देते हैं।

'चिंता मत करो हे काबुलीवाला। हम बहुत ही शिद्दत से तुम्हारे साथ हैं। पिछले कई दिनों से हम तुम्हारे लिए चिंता जता रहे हैं। तीन दिन पहले ही हमारे महासचिव ने पूरी दुनिया को तुम्हारे मामले में साथ आने को कहा है। और क्या चाहिए तुम्हें? वैसे क्या तुम्हारे लिए यह गर्व  की बात नहीं है कि हमारे सभी अफसर अफ़ग़ानिस्तान के ड्रायफ्रूट्स खाकर ही अपने दिन की शुरुआत करते हैं। कसम से, क्या कमाल के ड्रायफ्रूट्स पैदा करते हों तुम लोग। लेकिन यहीं पर हमारे लिए एक चिंता की बात और है...'

काबुलीवाला ने खुद ही प्रतिप्रश्न पूछा -  'और क्या चिंता रह गई?'

'अरे क्या तुमने वे क्लीपिंग्स नहीं देखी जब तालिबान के लीडर्स भी ड्रायफ्रूट्स खा रहे थे। कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारे यहां के सारे ड्रायफ्रूट्स पर तालिबानियों का कब्जा हो जाए। कितनी बेरहमी से वे ड्रायफ्रूटस खा रहे थे। पूरी दुनिया ने देखे हैं वे दृश्य। वाकई दिल को दहला देते हैं। बहुत ही बर्बर हैं तुम्हारे यहां के तालिबानी। वहां के ड्रायफ्रूट्स को लेकर हम वाकई बहुत चिंतित हैं। हम फिर कह रहे हैं, अपना ध्यान रखना और हमारे ड्रायफ्रूट्स का भी। हम जल्दी ही एक मीटिंग भी करने वाले हैं। उस मीटिंग में भी हम जोरदार शब्दों में चिंता जताएंगे। तुम बिल्कुल भी चिंता मत करना।'

काबुलीवाला ठहरा पागल । संयुक्त राष्ट्र को तुरंत छोड़कर उसने झोले से दूसरा सवाल निकाल लिया। यह सवाल अमेरिका से था। सवाल था तो घिसा-पीटा ही, फिर भी सुन लीजिए - 'तू तो खुद को पूरी दुनिया का चौधरी मानता है। तो अब अचानक अफ़ग़ानिस्तान को मझधार में छोड़कर क्यों जा रहा है? तेरे सारे हथियार चूक गए हैं क्या?'

अमेरिका की तरफ से काबुलीवाला ने ही जवाब दिया - 'क्यों भूल गया हमारे सारे अहसान? अहसान फ़रामोश! मैंने सालों तुम्हारे बेरोजगार मुजाहिदीनों को पाला-पोसा। उनके हथियारों पर करोड़ों-अरबों का खर्च किया। पर इसके बदले में मुझे क्या मिला? एक ओसामा बिन लादेन। फिर उससे छुटकारा पाने के लिए अरबों-खरबों खर्च करने पड़े। फिर अफ़ग़ानिस्तान की भ्रष्ट सरकारों को पालना-पोसना पड़ा। इतना तो किया? अब अफ़ग़ानिस्तान को बर्बाद करने का पूरा ठेका हमने ही थोड़े ले रखा है।'

अमेरिका का जवाब शायद काबुलीवाला ने सुना नहीं। हां, तमाशबीनों की भीड़ ने सुन लिया है। इसीलिए तालियों की आवाज़ आ रही है।

काबुलीवाला के झोले में तो कई सवाल हैं। अगला सवाल पाकिस्तान से था। उसने सवाल को बड़ी ही हिकारत से देखा और जमीन पर फेंककर उसे पैर से मसल दिया। फिर और भी कई सवाल निकले - रूस से, चीन से, पश्चिमी मुल्कों से। पब्लिक वेलफेयर का दावा करने वाली विश्व संस्थाओं से। वह सभी सवालों को जमीन पर फेंकता जा रहा है। अब तो पूरा ही पागल जैसा बर्ताव करने लगा है। इसलिए तमाशबीनों को और भी मजा आने लगा है। तालियों की आवाज बढ़ गई है। वे सब भी शायद तमाशबीन का हिस्सा ही हैं, जिनसे पूछने के लिए काबुलीवाले के झोले में सवाल हैं।

अब उसके झोले में बस एक अंतिम सवाल बाकी है। निकालते ही उसे चूम लिया। उसे याद आ गई कोलकाता की वह गली जहां वह पहली बार उस बच्ची मिनी से मिला था। उसे ड्रायफ्रूट्स देता था। लेकिन अब न वह मिनी रही होगी, न वह गली। जिससे वह सवाल है, वह तमाशबीनों की भीड़ में शामिल नहीं है, लेकिन उसके साथ भी नहीं है। वह कहीं दूर उसकी ओर पीठ किए हुए हैं। वहां भी तो अब मानसिकता पर तालिबान चिपक गए हैं। तो जवाब देने का नैतिक साहस शायद उसके पास भी कहां होगा!

काबुलीवाला की आंखों के किनारे से आंसू की एक बूंद टपक पड़ी। तमाशबीन का हिस्सा बने इस लेखक की आंखें भी नम हैं, पर उसे तो तटस्थ रहना है। तटस्थता ही सबसे मुफ़ीद होती है।

काबुलीवाला ने वह सवाल ससम्मान अपने झोले में सरका दिया है। शायद यह सोचकर कि जब आमने-सामने मुलाकात होगी तो पूछेगा- क्यों भुला दिया अपने काबुलीवाले को! क्यों भुला दिया उस गांधार को जिसे जीतने के लिए भीष्म ने एक पल की भी देरी नहीं की थी? अपने पितामह को याद करके भी क्यों तुम्हारी भुजाएं अब फड़कती नहीं?

पूछेगा, जरूर पूछेगा...। जवाब तो देना होगा!

(ए. जयजीत खबरी व्यंग्यकार हैं। संवाद शैली में लिखे व्यंग्यों के लिए चर्चित हैं।)

बुधवार, 4 अगस्त 2021

Satire : और अचानक सत्य से हो गई मुलाकात....

(आज अगर अचानक हमारी सत्य नामक जीव से मुलाकात हो जाए तो वह हमें दूर ग्रह का एलियन टाइप ही दिखेगा... सोचिए उस रिपोर्टर की जिसकी अचानक ऐसे ही एलियन से मुलाकात हो गई...)


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सत्य आज कुछ-कुछ ऐसा ही एलियन टाइप नजर आएगा। 

By Jayjeet

सच इन दिनों ट्रेंड में है। हर कोई सच की तलाश में है। कोई पेगासस जासूसी कांड का सच जानना चाहता है तो किसी को किसान आंदोलन के पीछे के सच की चिंता है। पर सच जानकर करेंगे क्या? यह किसी को भी पता नहीं। 


लेकिन सच है कहां? क्या वाकई कहीं सच है भी? उस रिपोर्टर का तो यही दावा था कि हां, उसने सच को ढूंढ निकाला।


हुआ यूं कि उस दिन रिपोर्टर किसी ब्रेकिंग न्यूज की तलाश में नगर निगम के बाजू में स्थित बापू की प्रतिमा के पास खड़ा था। उसे वहीं एक कोने में पड़े कचरे के ढेर से एक साया झांकता हुआ नजर आया। रिपोर्टर ने ब्रेकिंग न्यूज के फेर में उसी साये को पकड़कर ढेर से बाहर निकाल लिया। पर यह क्या! एलियन जैसी आकृति! रिपोर्टर ऐसी आकृति पहली बार देख रहा था। तो चौंकना लाजिमी था। शुक्र है आसपास कोई और ना था। (नोट : दी गई तस्वीर उसी रिपोर्टर द्वारा दिए गए ब्योरे के आधार पर बनाई गई है।)


"आप कौन? इससे पहले तो आपको कभी देखा नहीं!' रिपोर्टर ने उस अनूठी एलियन टाइप की आकृति से बड़े ही अचरज के साथ पूछा। 


"मैं बताना तो नहीं चाहता, पर झूठ भी नहीं बोल सकता।' कचरे को झाड़ते हुए एलियन टाइप के साये ने जवाब दिया। अब वह गांधी मूर्ति के पास बहुत ही सतर्क होकर बैठ गया। 


"अच्छा...तो सच ही बोल दीजिए।' रिपोर्टर ने कुटिल मुस्कान के साथ ऐसे कहा मानो कोई बहुत बड़ा कटाक्ष कर दिया हो।


"जी मैं सत्य ही हूं।' बेचारा सत्य, रिपोर्टर के कटाक्ष को क्या जाने और क्या समझे। 


"अच्छा..... वही सत्य जिसकी लोग हमेशा तलाश में रहते हैं?'

 

रिपोर्टर को भरोसा नहीं हो रहा है। इसलिए उसने दो बार अपनी आंखें मसली, आकृति को छूकर सत्य की पुष्टि करनी चाही। फिर जेब से 100 रुपए का नोट निकाला। उलट-पलटकर देखा। गांधीजी की तस्वीर के बाजू में लिखे सत्यमेव जयते में "सत्य' आलरेडी उपस्थित था। तो यह कोई फेक सत्य तो नहीं! रिपोर्टर दुविधा में है। फिर उसने नोट को जेब के अंदर सरकाते हुए मामले का और भी सच जानने का निश्चय किया। 


"क्या सोच रहे हो महोदय?' सत्य ने बड़ी ही अधीरता के साथ इधर-उधर झांकते हुए कहा। उसकी अलर्टनेस बढ़ गई है। थोड़ी घबराहट भी।


"आप वाकई सत्य हो? पर उस कोने में पड़े कचरे के ढेर में क्या कर रहे थे?' रिपोर्टर ने तफ्तीश शुरू की।


"भाई, मेरी वहीं जगह है। आप लोगों ने ही तय की हाेगी। मैं तो कब से कोने वाले उसी कचरे के ढेर मंे पड़ा हूं। अच्छा होता, मुझे आप वहीं अंदर ही रहने देते। मैं जब तक छिपा हूं, तभी तक सुरक्षित हूं।' सत्य लगातार इधर-उधर देख रहा है। असुरक्षा और घबराहट के भाव बरकरार हैं। 


"आप इतने डरे-डरे, सहमे-सहमे से क्यों हों?'


"मुझे देखते ही कहीं लोग मेरा एनकाउंटर न कर देें। वैसे अब तो लिंचिंग का भी फैशन चल पड़ा है। इसीलिए... कृपया मुझे तुरंत जाने दीजिए। मैं वहीं ठीक हूं।'


"पर आपको डरना क्यों चाहिए? वैसे भी कहा ही गया है, सांच को आंच नहीं। अगर आप वाकई सत्य हो तो फिर काहें का डर?' रिपोर्टर ने सत्य की सत्यता की पुष्टि करने के लिए बचपन में पढ़ा हुआ मुहावरा फेंका।

  

"जब नेता टाइप के लोग मेरी रोटी बनाकर मुझे सेंकते हैं तो आंच मुझे भी लगती है।'  


"हो सकता है, वे आपके साथ प्रयोग करते हों, जैसे कभी बापू ने किए थे। मैंने कहीं पढ़ा था- गांधीजी के सत्य के प्रयोग। ऐसा ही कुछ...' रिपोर्टर ने एक ठहाका लगाया। पता नहीं क्यों लगाया। शायद अपनी ही बचकानी बात पर मोहर लगाने के लिए।


"भाई साहब, आप भी अच्छा मजाक कर लेते हों। अच्छा मुझे जाने दीजिए...' सत्य भी रिपोर्टर के मजाक को समझ गया। अब भी जाने की जिद पर अड़ा है।


"मैं आपके साथ हूं ना। आप घबराइए मत। आपका कुछ नहीं होने वाला।' राजनीतिक रिपोर्टिंग करते-करते इस तरह के आश्वासन रिपोर्टर्स की जबान पर भी स्थाई भाव की तरह चिपक ही जाते हैं।


"पुलिस, सीबीआई या सीआईडी वाले, इनसे आप बचा लोंगे? सबसे ज्यादा डर तो इनसे ही लगता है।' भयंकर घबराया हुआ सा है सत्य।


"लेकिन सत्य जी, पुलिस, सीबीआई, सीआईडी, ये तो हमेशा से ही आप के मुरीद रहे हैं। सत्य को ढूंढने की इन पर एक महती जिम्मेदारी भी है। अगर आप इनसे बचकर रहेंगे तो कैसे काम चलेगा? जनता तक सच पहुंचेगा कैसे?'


"नहीं भाई, दो-चार बार मैं इनसे मिला भी तो इन्होंने मेरा ये हाल किया कि उसे याद करके आज भी सिहर उठता हूं। मुझे इतना तोड़ा-मरोड़ा कि मैं, मैं ना रहा।'


"ऐसा वे क्या करते हैं? हम भी तो जानें जरा...' रिपोर्टर ने अनजान बनने का नाटक करते हुए पूछा। 

 

"इनके पास पहले से ही झूठ का सांचा रहता है। बस, उस सांचे में मुझे तोड़-मरोड़कर पटक देते हैं।' 


"लेकिन इसके लिए तो आप ही जिम्मेदार हैं।' रिपोर्टर ने शायद बड़ी बात कह दी।


"कैसे भला? अब चौंकने की बारी सत्य की थी। रिपोर्टर ने वाकई बड़ी बात ही कही थी। 


"आपकी तलाश में न जाने कितनी संसदीय समितियां बनती हैं, न जाने कितने बड़े-बड़े कमीशन बनते हैं। उनमें बड़े-बड़े अफसर नियुक्त होते हैं, सेवानिवृत्त जजों को तकलीफ दी जाती है। उनके ऑफिस, गाड़ियों पर खर्च अलग होता है। वह भी दो टके के सच, सॉरी, आई मीन सिर्फ आपकी तलाश में। एक सच को जानने के लिए कितनी मशक्कत करनी पड़ती है बेचारों को। और फिर जब वह नहीं मिलता है तो पुलिस, सीबीआई, सीआईडी की मदद लेनी ही पड़ती है। क्या करें वे भी।' रिपोर्टर ने नैतिक ज्ञान पेला। 


"मैं समझा नहीं।' सत्य वाकई मासूम ही है। 


रिपोर्टर बगैर रुके रौ में बोल रहा है, "या फिर उन्हें आपकी तलाश इसी वाले सत्यमेव जयते के "सत्य' पर जाकर खत्म करनी पड़ती है।' रिपोर्टर ने उसी 100 रुपए के नोट को जेब से निकालते हुए सत्यमेव जयते वाले सत्य की ओर उंगली दिखाते हुए एलियन टाइप सत्य से कहा।  


इस बीच रिपोर्टर के बॉस का फोन भी आ गया। रिपोर्टर सत्य से साक्षात्कार की ब्रेकिंग न्यूज को लेकर फोन पर ही अपने बॉस को कन्विंस करने में लगा है। उधर बॉस शायद हंस रहा है।  


इधर, सत्य किंकर्त्तव्यविमूढ़ खड़ा है और फिलहाल तो वह उसी कोने की ओर देख रहा है, जहां पड़े कचरे में से रिपोर्टर ने उसे ढूंढ निकाला था। ढूंढ क्या निकाला था, खींचकर जबरदस्ती बाहर निकाल लिया था। वह रिपोर्टर से नजरें बचाकर जल्दी से उसी ढेर में ओझल हो जाना चाहता है, लोगों को पता चले उससे पहले ही। फिर रिपोर्टर लाख दावा करें, कौन भरोसा करेगा। 

(ए. जयजीत खबरी व्यंग्यकार हैं। संवाद शैली में लिखे व्यंग्यों के लिए चर्चित हैं।)


बुधवार, 21 जुलाई 2021

Satire : दो जासूस, करे महसूस कि जमाना बड़ा खराब है...

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By Jayjeet

दो जासूस, दोनों के दोनों प्रगतिशील किस्म के। देश-दुनिया की समस्याओं पर घंटों चर्चा करके चर्चा के कन्क्लूजन को अपनी तशरीफ वाली जगह पर छोड़कर जाने वाले। दोनों एक कॉफ़ी हाउस में मिले। वैसे तो दोनों अक्सर इसी कॉफ़ी हाउस में मिलते रहते हैं, लेकिन आज का मिलना ज्यादा क्रांतिकारी है। अब ये जासूस कौन हैं, क्या हैं, इसका खुलासा ना ही करें तो बेहतर है। देखो ना, पेगासस नाम के किसी जासूस का खुलासा होने से कितनी दिक्कतें आ गईं। विपक्ष को हंगामा करने को मजबूर होना पड़ा। कांग्रेस कहां पंजाब में अपने दो सरदारों के बीच सीजफायर करवाने के बाद थोड़ा आराम फरमा रही थी कि उसे फिर जागना पड़ा। और बेचारी सरकार। कब तक छोटे-छोटे हंगामों को राष्ट्र को बदनाम करने की साजिशें घोषित करती रहेगी। उसकी भी तो कोई डिग्नेटी है कि नहीं। कई बड़े-बड़े पत्रकार, नेता, बिल्डर, वकील, तमाम तरह के माफिया इस बात से अलग चिंतित हैं कि उनका नाम सूची में क्यों नहीं है! तो एक खुलासे से कितनी उथल-पुथल मच गई। इसलिए हम भी इन दोनों जासूसों के नाम नहीं बता रहे। हां, एक को करमचंद जासूस टाइप का मान लीजिए और दूसरे को जग्गा जासूस टाइप का। वैसे भी जासूस तो विशेषण है, संज्ञा का क्या काम। काले रंग का कोट, बड़ी-सी हेट, काला चश्मा, हाथ में मैग्नीफाइंग ग्लास वगैरह-वगैरह कि आदमी दूर से ही पहचान जाए कि देखो जासूस आ रहा है। दूर हट जाओ। पता नहीं, कब जासूसी कर ले।

तो जैसा कि बताया, ये दो जासूस एक कॉफ़ी हाउस में मिले। इसी कॉफ़ी हाउस में दोनों का उधार खाता पता नहीं कब से चला आ रहा है। कई मैनेजर बदल गए, पर खाता अजर-अमर है। कॉफ़ी हाउस में मुंह लगने वाले हर कप को मालूम है कि इन दिनों ये भयंकर फोकटे हैं। इन दिनों क्या, कई दिनों से ही ये फोकटे हैं। कई बार कोट से बदबू भी आती है। जब किसी के पास ज्यादा पैसे ना हों तो ड्रायक्लीन पर खर्च अय्याशी ही माना जाना चाहिए। तो ये जासूस अक्सर इस तरह की अय्याशी से बचते हैं। वैसे इन दोनों जासूसों ने अपने बारे में यह किंवदंती फैला रखी है कि जब ये वाकई जासूसी करते थे, तो उनके पास जूली या किटी टाइप की सुंदर-सी सेक्रेटरी भी हुआ करती थीं, एक नहीं, कई कई। देखी तो किसी ने नहीं, पर अब जासूसों से मुंह कौन लगे। कपों की तो मजबूरी है। बाकी बचते हैं।

खैर, मुद्दे पर आते हैं। तो आइए, इन दो प्रगतिशील जासूसों की जासूसी भरी बातें भी सुन लेते हैं। आज तो चर्चा का एक ही विषय है - पेगासस।

"और बताओ, क्या जमाना आ गया?' पहले ने शुरुआत वैसे ही की, जैसी कि अक्सर की जाती है।

"सही कह रहे हो। पर ये पेगासस है कौन?' दूसरा तुरंत ही मूल मुद्दे पर आ गया, क्योंकि आज तो फालतू बातों के लिए इन दोनों के पास बिल्कुल भी वक्त नहीं है।

"कोई जासूस है स्साला। फ्री में हर ऐरे-गैरे की जासूसी करता फिरता रहता है।' पहले ने थोड़ा ज्ञानी होने के दंभ के साथ कहा।

"बताओ, ऐसे ही जासूसों के कारण हमारी कोई इज्जत नहीं रही।' दूसरे ने यह बात इतनी संजीदगी से कही मानों उनकी कभी इज्जत रही होगी।  

"और एक-दो की नहीं, पूरी दुनिया की जासूसी करने का ठेका उठा लिया है इस पेगासस ने।' पहले ने जताया कि मामला वाकई गंभीर है।

"हां, रोज ही लिस्ट पे लिस्ट आ रही है, मानों चुनाव में खड़े होने वाले उम्मीदवारों की सूचियां निकल रही हों।' दूसरे ने गंभीरता की हवा निकाल दी।

दोनों जोर से हंसते हैं। फिर अचानक अपने-अपने होठों पर उंगली रखकर शांत रहने का इशारा करते हैं। लोगों को लगना नहीं चाहिए कि दो जासूस मूर्खतापूर्ण टाइप की बातें कर रहे हैं, जो हंसी की वजह बन रही है। भले ही बातें करें, पर लगे नहीं। इसलिए दोनों फिर धीमी आवाज में चर्चा शुरू देते हैं...

"यह भी क्या जासूसी हुई? अब आप नेताओं की जासूसी करवा रहे हों? नेताओं की जासूसी करता है क्या कोई?' पहला फिर गंभीर हो गया।

"हां, मतलब नेताओं के नीचे से आप क्या निकाल लोगे? कोई बड़ा राज निकाल लोगे? और जासूसी करके बताओंगे क्या? इतने करोड़ रुपए स्विस बैंक में, इतने करोड़ घर में, इतने करोड़ की बेनामी संपत्ति, इतने लोगों को ठिकाने लगाने के लिए ये पलानिंग, वो पलानिंग। जो चीज सबको मालूम है, वो आप बताओगे। ये क्या जासूसी हुई भला।' दूसरे ने पहले की गंभीरता में गंभीरता के साथ पूरा साथ दिया।

"बताओ, क्या जमाना आ गया।' पहला फिर जमाने को दोष देने लगा।

"पर ये जासूसी करवा कौन रहा है?' दूसरा अब पॉलिटिकल एंगल ढूंढने की जासूसी में लग गया है।

"कोई भी करवाए, हमें क्या मतलब?' पहले के भीतर का प्रगतिशील जासूस अब आम मध्यमवर्गीय औकात में बदलने की तैयारी करने लगा है। कप की कॉफ़ी खत्म जो होने लगी है।

दूसरा भी तुरंत सहमत हो गया। उसकी भी कॉफ़ी खत्म हो रही है। वह इस बात पर सहमत है कि हमें ऐसे फालतू के मामलों में ज्यादा चिंता करने की जरूरत नहीं। चिंता या तो सरकार करे जिसे हर उस मामले में देश की चिंता रहती ही है जिस मामले में उस पर सवाल उठाए जाते हैं। या फिर विपक्ष करे, जो अब इस भयंकर चिंता में मरा जा रहा है कि मामले को जिंदा रखने के लिए कुछ दिन और एक्टिव रहना होगा। संसद सत्र अलग शुरू हो गया है। रोज हंगामा खड़ा करना होगा। कैसे होगा यह सब!

खैर, दोनों की कॉफ़ी खत्म हो गई है। तो चर्चा भी खत्म। तशरीफ को झाड़कर दोनों उठ खड़े हुए। कॉफ़ी हाउस अब राहत की सांस ले रहा है।

(ए. जयजीत खबरी व्यंग्यकार हैं। अपने इंटरव्यू स्टाइल में लिखे व्यंग्यों के लिए चर्चित हैं।)

रविवार, 18 जुलाई 2021

Humor : पंजाब में अमरिंदर और सिद्धू की लड़ाई से क्यों खुश हुई कांग्रेस?

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By Jayjeet

 

10 जनपथ पर स्थित बड़े से बंगले के बड़े से गेट के बाहर फुटपाथ पर आज अचानक कांग्रेस अम्मा से मुलाकात हो गई। किनारे बैठी हुई। लेकिन घोर आश्चर्य, पोपले मुंह पर बड़ी ही स्मित मुस्कान! रिपोर्टर को रुकना ही था। अम्मा से यह दूसरी मुलाकात थी।

रिपोर्टर : पहचाना अम्मा?

कांग्रेस अम्मा : अरे हां, रिपोर्टर ना?

रिपोर्टर : बड़ी तेज याददाश्त है आपकी। मान गए आपको!

कांग्रेस अम्मा : बूढ़ी हो गई तो क्या हुआ, अब भी कुछ सांसें चल रही हैं (पोपले मुंह से जोरदार ठहाका)।

रिपोर्टर : आज बड़ी खुश नजर आ रही हों?

कांग्रेस अम्मा : बात ही ऐसी है। पंजाब से बड़ी अच्छी खबर आ रही है।

रिपोर्टर (चौंकते हुए) : अच्छी खबर? वहां तो आपके ही दो बेटे आपस में लड़ रहे हैं।

कांग्रेस अम्मा : यही तो अच्छी खबर है।

रिपोर्टर (लगता है बुढ़िया सठिया टाइप गई है) : कांग्रेस के दो नेता आपस में लड़ रहे हैं। इसमें क्या अच्छाई है?

कांग्रेस अम्मा : एक राज्य में कांग्रेस के पास दो-दो नेता हैं और दोनों की दोनों एक-दूसरे पर भारी। बेटा इससे अच्छी खबर और क्या होगी?

रिपोर्टर : पर वे तो आपस में लड़ रहे हैं अम्मा? (रिपोर्टर ने यह बात तीसरी बार रिपीट की)

कांग्रेस अम्मा : लड़ तो रहे हैं? यह कम है क्या? कांग्रेसियों को लड़ते हुए देखे तो जमाना हो गया। पर तुम मीडियावालों को कांग्रेस की खुशी देखी नहीं जाती। (बुढ़ापे की वजह से अम्मा शायद भूल गई कि थोड़े बहुत तो उसके राजस्थान के बेटे भी लड़े थे।)

रिपोर्टर : ऐसी बात नहीं है अम्मा। बंगाल में जब बीजेपी की हार पर आपने मोतीचूर के लड्डू बंटवाए थे, तो हम सबने बराबर खाए थे। हमारे ही कई लोगों ने तो खुद बंटवाए थे। पर अम्मा पंजाब में कांग्रेसियों के इस तरह लड़ने से क्या संदेश जाएगा? अच्छी बात है ये क्या?

कांग्रेस अम्मा : बेटा वही तो नहीं समझ रहे हो तुम। खुद को बड़ा रिपोर्टर कहते हो। भैया, इससे तो कांग्रेसियों में जान फूंक जाएगी। उन्हें इस बात का एहसास होगा कि वे भी लड़ सकते हैं। केवल घर बैठकर चर्बी चढ़ाना ही एकमात्र ऑप्शन नहीं है।

रिपोर्टर : लेकिन लड़ना तो सरकार के खिलाफ चाहिए ना?

कांग्रेस अम्मा (थोड़ी नाराजगी के साथ) : नवजोत क्या कर रहा है? सरकार के खिलाफ ही तो लड़ रहा है ना?

रिपोर्टर : पर वहां तो आपकी ही सरकार है? वहां वे क्यों लड़ रहे हैं?

कांग्रेस अम्मा : बेटा सरकार आज है, कल न रहे, पर अगर लड़ना सीख लिया तो यह दूसरी सरकारों के खिलाफ भी काम आएगा कि नहीं? बता, तू तो रिपोर्टर है ना!

रिपोर्टर ने बुढ़िया से ज्यादा मगजमारी करना मुनासिब नहीं समझा। आखिरी सवाल पर आ गया।

- अम्मा, चलिए आप खुश तो हम खुश। पर आप तो ये बताओ, उप्र में चुनाव आ रहे हैं। बाकी पार्टियों ने तैयारियां भी शुरू कर दी हैं। आपकी क्या तैयारी है?

कांग्रेस अम्मा : उप्र? ये क्या है? (कुछ याद आने के बाद) अच्छा, योगी के उत्तर प्रदेश की बात कर रहा है? तैयारी कर रहे हैं हम, बिल्कुल कर रहे हैं।

रिपोर्टर : वही तो पूछ रहे हैं। क्या तैयारी कर रहे हैं?

कांग्रेस अम्मा (10 जनपथ निवास की ओर इशारा करते हुए) : वो अंदर जाकर पूछो ना, वे ही बताएंगे?

रिपोर्टर : अरे अम्मा, हमारी वहां तक कहां पहुंच है। आप तो पहुंच सकती हैं। आप ही बताइए ना।

कांग्रेस अम्मा : बेटा, पहुंच तो मेरी भी कहां है! इसीलिए तो फुटपाथ पर बैठकर पंजाब को लेकर खुशी मना रही हूं। चल अब यहां से जा, अंदर कोई समझौता हो जाए और सब पहले ही तरह घर बैठ जाएं, उससे पहले इस बुढ़िया को खुशी मना लेने दें। ऐसे मौके बार-बार नहीं आते।

(ए. जयजीत खबरी व्यंग्यकार हैं। अपने इंटरव्यू स्टाइल में लिखे व्यंग्यों के लिए चर्चित हैं।)
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बुधवार, 7 जुलाई 2021

Satire & Humor : जब राजा के दर्पण ने की दिल की बात, मतलब बड़ी वाली बदतमीजी!!

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By Jayjeet

सुबह नित्य कर्म, योगासन और ध्यान-स्नान से फ्री होते ही वे अपने बालों को संवारने के लिए हमेशा की तरह दर्पण के सामने थे। लेकिन बाल संवारते-संवारते आज उन्हें दर्पण में कुछ हलचल महसूस हुई। शायद दर्पण कुछ कहना चाहता है। हालांकि दर्पण कहना तो काफी दिनों से चाहता था, लेकिन महसूस उन्होंने आज किया। पर उनके सामने कुछ कहने की क्या कोई मजाल कर सकता है? इसलिए उनके ईगो को हलकी-सी ठेस लगी। वे एक कदम पीछे हो गए और फिर दर्पण से मुंह फेर लिया। लेकिन तभी उन्हें आवाज सुनाई दी - राजन ओ राजन...। यह दर्पण से ही आ रही थी।
आवाजों को इग्नोर करना उन्होंने सीख लिया था। राजा चाहे कोई भी हो, किसी भी काल-युग का हो, धीरे-धीरे इग्नोरेंस उसका स्थाई भाव बन जाता है। वे चाहते तो इस आवाज को भी इग्नोर करके अपनी राह पर आगे बढ़ सकते थे। यह उनकी प्रतिष्ठा में चार चांद ही लगाता। लेकिन फिर अभिमानी मन ही आड़े आ गया। तो दर्पण से दूर होते कदम ठिठक गए और चेहरा फिर से दर्पण की ओर घूम गया, मानो चुनौती देते हुए कह रहे हैं कि ए तुच्छ दर्पण, बता, क्या है तेरी रज़ा!
दर्पण धीरे से कुछ बुदबुदाया.... लेकिन आवाज साफ नहीं आ पाई। कॉन्फिडेंस का अभाव था।
'क्या तू कुछ कहना चाहता है दर्पण?'
'जी जी, मैं कुछ बातें करना चाहता हूं...।' दर्पण के मुंह से हकलाते हुए कुछ शब्द फूटे।
'अच्छा, अपने मन की बात करना चाहता है?' राजा अपनी चिर-परिचित शैली में मुस्कुराए।
'मन की बात तो राजन आप बहुत कर चुके, मैं तो दिल की बात करना चाहता हूं...'
'अच्छा! तू मेरा दर्पण होकर दिल की बात करना चाहता है? तुझे पता नहीं, राजाओं के महलों में लगे दर्पण कभी अपने दिल की नहीं करते?'
'हां, राजन। अच्छे से पता है। राजाओं के महलों के दर्पण भी बस राजाओं के प्रतिबिम्ब होते हैं। वे तो केवल राजाओं के मन की बात ही करेंगे। फिर भी आज दिल की कुछ कहना चाहता हूं, मगर ...'
'मगर क्या? '
'बता तो दूं, मगर डरता भी हूं।'
'अरे, तू मेरा दर्पण है, तुझमें मेरा ही प्रतिबिम्ब है। तुझे इस बात का इल्म नहीं कि हमने कभी डरना सीखा नहीं, फिर तू कैसे डर सकता है?' राजाओं का अभिमान पल-पल में जागता रहता है।
'डरता इसलिए हूं क्योंकि दिल, वह भी दर्पण का, कभी झूठ नहीं बोलता। और सच सुनाने की हिम्मत नहीं हो रही।'
'अच्छा, लेकिन ऐसा कौन-सा सच है जो हमसे छुपा हुआ है? मेरे दरबारी मुझे हमेशा सच से बाख़बर रखते हैं।'
'लेकिन दरबारी वही सच सुनाते हैं जो राजा सुनना चाहता है।'
'लेकिन तुम सच ही बोलोगे, इसका क्या भरोसा?'
'क्योंकि कहा ना, दर्पण झूठ नहीं बोलते।'
'इतना अभिमान?'
'सब आपसे ही सीखा, आपके ही महल में रहते-रहते।' शायद ज्यादा बोल गया दर्पण। इस बात का तुरंत एहसास होते ही उसने मिमियाती आवाज में एक ठहाका लगाया। ठहाका लगाने से वातावरण का तनाव दूर हो जाता है। इतने सालों में दर्पण ने यह भी सीखा और देखा है।
'हमसे और क्या-क्या सीखा?' राजा ने भी चुटकी ली।
'खुद को पॉलिश करके रखना। देखो, कितना चकाचक हूं, आपके ही वस्त्रों की तरह।' दर्पण अब थोड़ी सीमा उलांघने की गुस्ताखी करने लगा है।
'मतलब सूटेड-बूटेड होना गलत नहीं है ना!' राजा को अब उसकी बातों में मजा आने लगा है। बातचीत इनफॉर्मल होने लगी है।
'बिल्कुल नहीं। यह तो विकास का एक बड़ा पैमाना है।' राजा का दर्पण है तो बात कुछ-कुछ राजा के मनमाफिक करना भी जरूरी है।
'वाह दर्पण, तू ही है जो मेरे मन की बात अच्छे से समझता है। तू तो विकास का शोकेस बन सकता है, विकास का प्रतिबिम्ब।'
'अभी तो केवल आप मेरे सामने हैं। तो मैं फिलहाल आपका ही प्रतिबिम्ब हूं।' अब दर्पण ने चुटकी ली। अब दर्पण थोड़ा-थोड़ा खुलने लगा है।
'बहुत डिप्लोमैटिक भी हो गया है रे तू।'
'यह भी आपसे ही सीखा है राजन।'
"तूने अच्छा किया जो मुझसे बात कर ली। मैं तो भूल ही गया था कि तेरा भी हम राज्य के हित में बेहतर इस्तेमाल कर सकते हैं।' वही राजा कुशल होता है जो हर मौके पर अपने काम की बात निकाल ले।
'वह कैसे भला?' दर्पण चाैंका। राजा की मंशा पर मन की मन शक करने की गुस्ताखी की।
'इन दिनों प्रजा के बीच विश्वास का बड़ा संकट है। राज्य के विकास संबंधित तमाम आंकड़े हम तेरे जरिए ही दिखाएंगे तो लोग सच मान लेंगे। क्योंकि भोली प्रजा भी तो यही मानती है कि दर्पण कभी झूठ नहीं बोलता।'
'मगर गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई जैसे आंकड़ों का सच मैं कैसे छिपाऊंगा? मैं धोखा तो नहीं दे सकता।' दर्पण ने अचानक अपनी औकात की सीमा के बाहर कदम रख दिया है।
लेकिन दर्पण की इस बात से राजा को गुस्सा नहीं आया, बल्कि उसकी मासूमियत पर मुस्कुरा भर दिए। राजा चाहते तो हंस भी सकते थे। बात ही इतनी हास्यास्पद थी। फिर भी मुस्कुराए भर।
'राजन, हर आंकड़े का सच प्रजा को मालूम होना ही चाहिए।' दर्पण अब नैतिकता पर उतरने का दुस्साहस करने लगा है।
'तू बहुत छोटा है दर्पण। हर आंकड़ा तुझ में नहीं समा सकता। तो हम वही आंकड़े दिखाएंगे, जो राज्य के विकास का प्रतिबिम्ब दर्शाए।' राजा ने बागी होते जा रहे दर्पण को बहलाने की कोशिश की।
'लेकिन मैं सहमत नहीं हूं।' दर्पण की बदतमीजी बढ़ती गई।
'तू एक राजा के महल का दर्पण है। यह बात कैसे भूल गया?' राजा का धैर्य जवाब दे गया। इसलिए मुट्‌ठी भींचकर राजा चीख पड़े।
दर्पण भी एक पल के लिए कांप उठा, फिर संभलकर बोला, 'गुस्ताखी माफ राजन, दर्पण तो दर्पण होता है, फिर वह गरीब की झोपड़ी में लगा हो या किसी राजा के महल में?'
दर्पण की जबान कड़वी होती जा रही थी। शायद दर्पण थोड़ा-थोड़ा स्वाभिमानी हो रहा था। फिर बात आगे बढ़ी... बढ़ती गई... बढ़ती ही चली गई... फिर इतनी बढ़ी कि दर्पण ने औकात की तमाम सीमाएं पार कर ली।
मगर राजा तो राजा है। गुस्ताख दर्पण के साथ वही होना था जिसके वह लायक था। वह अब जमीन पर था। टुकड़े-टुकड़े। उस गुस्ताख दर्पण को सजा मिल चुकी थी। राजा की सहृदयता पर गुस्ताखी करने का नतीजा क्या होता है, दर्पण के उन टुकड़ों से यही कहने के लिए राजा नीचे की ओर झांके, थोड़ा झुके भी। लेकिन अब वहां एक दर्पण नहीं था। टुकड़े-टुकड़े कई दर्पण थे और सभी गुस्ताखी कर रहे थे। अपने दिल की बात सुना रहे थे। बात एक दर्पण ने शुरू की थी। अब कई दर्पण तक पहुंच गई थी। राजा ने घबराकर अपने हाथों से कान ढंक लिए। आंखें बंद कर ली। मुंह फेर लिया।

(ए. जयजीत खबरी व्यंग्यकार हैं। अपने इंटरव्यू स्टाइल में लिखे व्यंग्यों के लिए चर्चित हैं।)

शुक्रवार, 4 जून 2021

व्यंग्य : सरकार के बनने और दौड़ने की एक दंतकथा


 By ए. जयजीत 

सरकार नामक व्यवस्था का निर्माण कैसे हुआ, इसकी भी एक दिलचस्प दंतकथा है। 

बहुत पुरानी बात है। बात जितनी पुरानी होती है, उतनी ही दमदार होती है। तो यह दमदार बात भी है। एक दिन ऊपर बैठी हुई ईश्वरीय शक्ति, जिसे हम आगे शॉर्ट में ईश्वर ही कहेंगे, को बोध हुआ कि धरती पर लोग कुछ भी करते-धरते नहीं हैं। तो क्यों न लोगों को कुछ काम दिया जाए। उसने एक व्यवस्था बनाने पर कार्य शुरू किया। इस व्यवस्था को बाद में कुछ लोगों ने शासन प्रणाली कहा तो कुछ ने सरकार। हम यहां शॉर्ट में इसे सरकार ही कहेंगे क्योंकि शासन प्रणाली उच्चारित करना जरा कठिन है। कठिन चीजों से हमेशा बचना चाहिए।

तो सरकार के तहत कुछ लोगों को भर्ती किया गया। बाद में ईश्वर यह बात भूल गए कि उन्होंने कोई व्यवस्था बनाने की बात सोची थी, कुछ भर्तियां भी की थी। बात आई-गई हो गई। जिन लोगों की भर्ती की गई थी, वे यूं ही निठल्ले बैठे रहते, जैसे कि पहले बैठे हुए थे। यही लोग बाद में चलकर सरकारी कर्मचारी कहलाए। 

महीनों बीत गए। फिर उनमें से कुछ ने खुद ही सोचा कि बैठे-बैठे क्या करें, करते हैं कुछ काम। तो वे कुछ करने को निकले। सबसे पहले उन्होंने ऐसी जगह ढूंढने की ठानी जहां बैठकर वे बगैर काम किए भी वे खुद को बिजी दिखला सकें। तो उन्होंने ऐसे ठिकाने ढूंढ लिए। यही ठिकाने बाद में सरकारी दफ्तर कहलाए। ठिकानों पर पहुंचकर सब लोग खुश हुए। सरकारी नौकरी लगने पर खुश होने की महान परंपरा का यहीं से जन्म हुआ। इस तरह सरकार ने पहला कदम आगे बढ़ाया।

अब कर्मचारी थे। दफ्तर भी थे, मगर खाली-खाली थे। महसूस हुआ कि दफ्तर में फर्नीचर, पंखे, फाइलें तो होनी ही चाहिए। और हां, पानी के मटके भी। कुछ मूर्खों ने कहा, चलो फ्री तो बैठे ही हैं। बाजार चलकर खरीद लाते हैं। लेकिन समझदार लोगों ने समझाया - सब कुछ सिस्टेमैटिक होना चाहिए। आखिर सरकारी काम है। कहीं ऊंच-नीच हो जाए तो जवाब कौन देगा? यह दफ्तरों में सवाल पूछने की परंपरा का आगाज था। सबसे इसका स्वागत किया। सदियां बीत गईं, यह उसी 

सवाल का प्रताप है कि आज भी  हर दफ्तर में जवाबदेही से ज्यादा सवालदेही मिलती है। 

हर काम सिस्टैमेटिक हो, पर कैसे हों? इस पर कई लोग साथ बैठते, भर-भरकर विचार करते। यह

मीटिंग्स का शुरुआती काल था जो कालांतर में प्राइवेट दफ्तरों में खूब फला-फूला। खैर, मीटिंग्स पर मीटिंग्स के बाद अंतत: सामान की खरीदी के लिए प्रपोजल्स मंगवाने पर एकराय बनी। जो इस एकराय पर एकमत नहीं थे, वे मीटिंग्स से बाहर चले गए, कानाफूसी करने। तो इस मीटिंग्स से सरकारी दफ्तरों में दो चीजें एकसाथ अस्तित्व में आईं- कानाफुसी और टेंडर। इससे तीन फायदे हुए। दफ्तरों में लोगों को तीन तरह के काम मिलने शुरू हुए - मीटिंग्स करना, कानाफुसी करना और खरीदी के टेंडर निकालना।

तो कुछ चीजों के लिए टेंडर निकाले गए। टेंडर के कार्य के लिए टेबलें जरूरी थीं। तो उन्हें पिछले दरवाजें से बुलवाना पड़ा, बगैर टेंडर के। यहां कर्मचारियों को एक महाज्ञान की प्राप्ति भी हुई - कुछ काम नॉन-सिस्टेमैटिक तरीके से भी हो सकते हैं। जिन्होंने पहले यह ज्ञान दिया कि था कि सब कुछ सिस्टेमैटिक होना चाहिए, वे भी इस नए महाज्ञान पर आसक्त हो गए।

टेंडर के काम के लिए टेबलें तो आ गईं, लेकिन कुर्सियां बुलाना भुल गए। चूंकि वह शुरुआती काल था। तो लोग कुर्सी की महिमा से इतने परिचित नहीं थे। सो, कुर्सी न होने पर भी उन्होंने उस समय मलाल नहीं किया। कुछ लोग टेबलों के ऊपर बैठ गए और कुछ लोग टेबलों के नीचे। नीचे से काम फटाफट होने लगा। टेबलों के ऊपर बैठे लोग भी अब ऊंगली को नीचे करके इशारा करते। यहीं से एक और ज्ञान मिला - काम टेबलों के नीचे से ज्यादा आसानी से हो सकता है, बनिस्बत ऊपर के। इसलिए पंखों, फाइलों से लेकर मटकों तक के टेंडर फटाफट पास हो गए।

इस तरह सरकार और आगे बढ़ी।

इसी दौरान ईश्वर को अचानक याद आया कि उसे तो कोई व्यवस्था बनानी थी। उसने ऊपर से नीचे झांका। उसे यह देखकर बड़ी खुशी मिली कि कुछ समझदार इंसानों ने आत्मनिर्भर होकर खुद ही कुछ व्यवस्था बना ली। परंतु चूंकि उसे भी कुछ तो करना था। तो उसने उन्हीं इंसानों में से एक को सरकार का मुखिया बना दिया। और इस तरह ईश्वरीय दायित्व पूरा हुआ। इसके बाद से ही मतदान को आज भी ईश्वरीय दायित्व कहा जाता है।

अब मुखिया ने कुछ विभाग बनाए। कुछ को उन विभागों का प्रमुख बना दिया। लेकिन अब वे सब क्या करते? मीटिंग्स भी कितनी करते। कानाफुसी करना छोटा काम था और टेंडर निकालना नीचे वालों का काम था। तो ये विभाग प्रमुख तो निठल्ले के निठल्ले ही रहे।

फिर मुखिया को याद आईं वे फाइलें जो टेंडरों के जरिए खरीदी गई थीं। वे सब धूल खा रही थीं। उसने विभागों के प्रमुखों को आदेश दिया- फाइलें पुट-अप करो। विभागों के प्रमुखों के दिन फिरे। उन्हें अपनी हैसियत के अनुसार प्रॉपर काम मिला। फाइलें पुट-अप होने लगीं। सरकार के मुखिया लिखते- चर्चा करें। कभी लिखते- परामर्श करें।

इस तरह लोग अब मीटिंग्स के अलावा चर्चा और परामर्श भी करने लगे। जो लोग ये काम नहीं कर सकते थे, उन्हें फाइलों को इधर से उधर करने के काम में लगा दिया गया। अब इधर से उधर फाइलें ही फाइलें। एक ठिकाने से दूसरे ठिकाने तक, जो अब ऑफिशियली दफ्तर कहलाने लगे थे, फाइलें चलने लगीं। फाइलों के चलने की गति उस पर रखे गए वजन के समानुपाती होती थी। फाइल पर जितना ज्यादा वजन, उसकी गति उतनी तेज। तो अब सरकार दौड़ने लगी थी।

यहां छोटा-सा एक ब्रेक लेने का वक्त है। लेकिन चूंकि स्टोरी में एक ट्विस्ट आ गया है। तो पहले उस ट्विस्ट की बात कर लेते हैं…

इधर सरकार रुक-रुककर दौड़ रही थी और उधर राज्य में कुछ समाज विरोधी तत्व भी मर-मरकर पैदा हो रहे थे। ये तत्व बाद में क्या कहलाए, आप तय कीजिए, क्योंकि इनको लेकर थोड़ा वैचारिक कन्फ्यूजन है। खैर, इन समाज विरोधी तत्वों ने सरकार से ही सवाल पूछने शुरू कर दिए। वे पूछने लगे, सरकार क्या कर रही है? भला ये भी क्या सवाल हुए!

लेकिन सरकार का मुखिया विचलित नहीं हुआ। सरकार क्या कर रही है, इसी सवाल पर उसने जांच करवाने का ऐलान कर दिया। यहीं से जांच आयोग जैसी महान परंपराओं की शुरुआत हुई। समाज विरोधी तत्व चुप। जनता को तो ईश्वर ने मुखिया चुनने की शक्ति देकर पहले ही चुप करवा दिया था। भला जनता का ऐसे आलतू-फालतू सवालों से क्या लेना-देना?

तो सरकार चलती रही। इस बीच स्पीड ब्रेकर नामक एक महान आविष्कार भी हो चुका था। तो इन स्पीड ब्रेकरों पर सरकार रुकती भी रही और उछलती भी रही। यूं ही रुकते-उछलते-दौड़ते सालों बीत गए।

फिर एक दिन अचानक सरकार के मुखिया को जांच आयोग की रिपोर्ट मिली। लेकिन तब तक वह भूल चुका था कि उसने आखिर जांच आयोग क्यों बिठाया था। उसे कुछ समझ में नहीं आया तो उसने इसका पता लगाने के लिए कुछ कमेटियां बना दी। इसमें उन लोगों को काम मिला जो फाइलें पुट-अप करते-करते अब बूढ़े हो गए थे। बुढ़ापे की इस सरकारी व्यवस्था को तब तक रिटायरमेंट का नाम दे दिया गया था।

कमेटियों के गठन से सरकार और मजबूत हुई। उन कमेटियों की रिपोर्ट का क्या हुआ, सरकार ने कभी इसकी चिंता नहीं की। जनता तो वैसे भी नहीं करती है। तो सरकार चलती रही, दौड़ती रही। स्पीड ब्रेकरों पर रुकती रही और उछलती रही। यह परंपरा आज तक चली आ रही है।

 इति दंतकथा। अब एक लंबा ब्रेक ले लेते हैं...।


शनिवार, 6 मार्च 2021

Humor & Satire : 135 साल की बेबस कांग्रेस अम्मा से खास बातचीत, कहा- अब मुक्त होने का टाइम आ गया!

 

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By Jayjeet

आज रिपोर्टर का मन काम में नहीं लग रहा था। मन कुछ-कुछ कांग्रेसी हो रहा था। तो वह यूं ही 24 अकबर रोड पर टहलने चला गया। वहां के एक सुनसान इलाके में स्थित एक खंडहर इमारत, जिसे लोग आज भी कांग्रेस मुख्यालय के नाम से जानते हैं, के सामने से गुजरते हुए अचानक उसकी नजर एक पत्थर पर बैठी हुई एक बुढ़िया पर गई। टूटी हुई लाठी, झीने-से कपड़े, झुर्रियों में खोया-खोया चेहरा। हालांकि झुर्रियों के पीछे छिपे चेहरे पर हल्की-सी चमक यह भी बता रही थी कि इस बुढ़िया के कभी बड़े ठाठ रहे होंगे। खूब इज्जत, मान-सम्मान मिला होगा। पर अब चेहरे पर उपेक्षा का दंश है... रिपोर्टर पहले तो यह सोचकर डर गया कि चमगादड़ों से पटी इस इमारत में कहीं बुढ़िया के रूप में कोई भूत-वूत तो नहीं है। पर पैरे देखे तो सीधे थे। रिपोर्टर ने सुन रखा था कि भूत के पैर उलटे होते हैं। राहत की सांस ली। हिम्मत करके वह उस बूढ़ी अम्मा के पास पहुंच गया...

रिपोर्टर : आप इतने सुनसान से खंडहर में क्या कर ही हैं, अम्मा?

बुढ़िया ने नजरें ऊंची की, एनक पोंछी : कौन है, जो मुझसे इतने सालों के बाद बात कर रहा है?

रिपोर्टर : जी, मैं रिपोर्टर.. मैं भी सालों बाद इस खंडहर इमारत के सामने से गुजर रहा था तो आप दिख गईं। पहले तो मैं डर गया कि कहीं आप कोई भूत-वूत तो नहीं। फिर आपके पैरों से कंफर्म किया कि आप भूत ना हैं। आप कौन हैं?

बुढ़िया : तुम्हारा अंदाजा गलत था बेटा। मैं सीधे पैर वाली भूत ही हूं... (एक ठहाका)

(रिपोर्टर ढाई मिनट तक यूं ही निशब्द खड़ा रहा... भागना चाहता था, पर पैर वहीं जम गए...रिपोर्टर की हालत को वही समझ सकते हैं जिनका कभी भूतों से पाला पड़ा होगा। रिपोर्टर के होश में आने के बाद अब आगे पढ़ें आगे का इंटरव्यू...)

रिपोर्टर : आप भी अच्छा मजाक कर लेती हो अम्मा।

बुढ़िया : चलो मजाक ही मान लो, नहीं तो तुम्हारा भूत बन जाता। बताओ, तुम मेरे पास क्यों आए हो?

रिपोर्टर : ऐसा लग रहा है कि बहुत पहले किसी तस्वीर में आपको कहीं देखा है...

बुढ़िया : शायद तुमने अपने दादाजी या नानाजी के कमरे में लगी मेरी तस्वीर देखी होगी...

रिपोर्टर : हां, हां, बिल्कुल....याद आ गया। जब मैं छोटा था, उस समय दादाजी और उनके जितने भी दोस्त थे, उन सभी के घरों में आपकी तस्वीर लगी रहती थी।

बुढ़िया : पुराने जमाने में हर घर में मेरी तस्वीर लगी रहती थी....

रिपोर्टर : हां, उन तस्वीरों में आप बहुत ही सुंदर-शालीन नजर आती थीं। पर आप हैं कौन? आपने अपना परिचय नहीं दिया।

बुढ़िया : बेटा, अब मैं क्या परिचय दूं। परिचय के लिए कुछ बचा ही नहीं। फिर भी बता देती हूं, मैं कांग्रेस हूं... 135 साल की बुढ़िया। इसीलिए मैं खुद तो भूत कह रही थी.... अतीत वाला भूत..।

रिपोर्टर (आश्चर्य से) : अरे, अगर आप कांग्रेस हैं तो फिर 10 जनपथ पर जो एक संभ्रान्त महिता रहती हैं, अपने एक नन्ने-मुन्ने बालक के साथ, वो कौन हैं? मैं तो उन्हें ही कांग्रेस समझता आया हूं। सभी उन्हें ही कांग्रेस समझते हैं।

कांग्रेस अम्मा : अरे हां, वो। बेटा, उन्हें मेरा प्रणाम कहना, अगर मिल सको। वैसे तुम क्या मिल सकोंगे। मैं ही नहीं मिल पाती उनसे तो।

रिपोर्टर : आप कांग्रेस होकर उनसे नहीं मिल पातीं? क्या वे भी आपसे मिलने नहीं आतीं?

कांग्रेस अम्मा : कभी नहीं आईं। अब इसमें उनकी भी क्या गलती? हो सकता है उनके सलाहकारों ने उन्हें मेरे बारे में बताया ही ना हो। अगर उन्हें मेरे बारे में कोई बताता तो वे जरूर आतीं।

रिपोर्टर : और उनका नन्ना-मुन्ना बालक?

कांग्रेस अम्मा : हां, वह बालक कभी-कभार आ जाता है। कभी मेरी लकुटिया ले लेता है और कंधे पर लाठी रख जैसे किसान चलते हैं ना, वैसे ही चलने की एक्टिंग करता है। कभी मेरा ये टूटा हुआ ऐनक पहन लेता है और पूछता है- देखो दादी, मैं गांधी बाबा दिख रहा हूं ना...। जैसा भी है, पर है बहुत प्यारा बच्चा। पर आश्चर्य है, मेरे बारे में उसने भी अपनी मां को कभी नहीं बताया।

रिपोर्टर : आप इस खंडहर इमारत में सालों से अकेली रहती हों। अपने बारे में कुछ तो सोचिए।

कांग्रेस अम्मा : अब मेरा कुछ भरोसा नहीं बेटा। इस दुनिया से कब मुक्त हो जाऊं, क्या पता।

रिपोर्टर : अरे नहीं, इस देश को आपकी बहुत जरूरत है। भले ही अब आपके घर वाले ही आपको ना पूछते हो, लेकिन देश के लिए आपने क्या ना किया, मैं सब जानता हूं। मैंने किताबों में सब पढ़ा है। क्या-क्या नाम गिनाऊं, गोखले जी, तिलक जी लेकर बापू तक, सब आपकी ही छत्रसाया में पले-बढ़े। नहीं, अभी आपको जाना नहीं है...

कांग्रेस अम्मा : बस कर पगले, अब रुलाएगा क्या! (और बेबस आंखों से एक आंसू टपक पड़ा...)

रिपोर्टर : आप बहुत भावुक हो रही हैं। बढ़ती उम्र में ऐसा होता है। मोदीजी भी अभी भावुक हो गए थे। अरे हां, मोदीजी से याद आया, उन्होंने अभी-अभी कोरोना का टीका लगवाया है। आप भी लगवा लीजिए, फिर आप भी सेफ हो जाओगी।

कांग्रेस अम्मा : तू पत्रकार होकर भी इतना भोला कैसा है रे? मेरे शरीर में तो वंशवाद, चमचागीरी, दलाली जैसे संक्रमण भरे पड़े हैं। इन संक्रमणों ने ही मेरे तन-मन को तोड़कर रख दिया है। कोरोना वाले टीके से कुछ नहीं होगा।

रिपोर्टर : फिर भी कोई तो टीका ऐसा होगा जिनसे आप हमारे बीच हमेशा के लिए रह सकती है?

कांग्रेस अम्मा : लीडरशिप का, मेहनत का, सांगठनिक क्षमताओं का, इसके टीके की जरूरत है। ये है क्या ...?

रिपोर्टर (15-20 सेकंड की शांति के बाद) : माफ करना अम्मा, कम से कम आपके लिए तो ऐसा टीका अभी अवेलेबल नहीं है। पर, इस खंडहर से आप बाहर तो निकलिए...। टीका भी बन जाएगा।

कांग्रेस अम्मा : जब टीका बन जाए तो पहले उन कांग्रेसियों को जरूर लगवा देना जो घर बैठकर चमत्कार का इंतजार कर रहे हैं, मेरी जवानी फूटने के चमत्कार का इंतजार। और हां, मेरे नन्हे-मुन्ने बालक को मत भूल जाना...अब मैं चलती हूं...सोने का समय हो गया है...

रिपोर्टर काफी देर तक किंकत्तर्व्यविमूढ़ भाव से वहीं खड़ा रहा... उसे पता ही नहीं चला कि वह बूढ़ी अम्मा अचानक कहां ओझल हो गई.... क्या रिपोर्टर वास्तव में किसी भूत से बात कर रहा था? शायद!! पर जो भूतों को नहीं मानते, वे पाठक भला इसे क्या समझेंगे!!

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

Political Satire Video : चुनाव आते ही शुरू हुए अपशब्दों के बाउंसर, गालियों की गुगली...


पांच राज्यों में चुनाव नजदीक आते ही नेताओं के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है। ऐसे-ऐसे शब्द बोले जा रहे हैं कि डिक्शनरी भी शरमा जाए। चुनावी खेल में नेता एक-दूसरे पर अपशब्दों के बाउंसर डाल रहे हैं, तो गालियों की गुगली फेंकने से भी नहीं चूक रहे हैं।



शनिवार, 20 फ़रवरी 2021

Humour : बदल गई मच्छर की जिंदगी, दो दिन से पेल रहा है भाषण पर भाषण

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By jayjeet

हिंदी सटायर डेस्क। मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को सीधी के गेस्टहाउस में मच्छरों द्वारा काटने की जैसे ही खबर आईं, रिपोर्टर कुछ नया करने के जुनून से भर उठा। वह जुट गया उस सौभाग्यशाली मच्छर की तलाश में... कुछ ही घंटों के भीतर उसे गेस्टहाउस के पास मच्छरों का मजमा लगाए एक मच्छर मिला। कुछ समझदार मच्छरों से पूछताछ करने पर पता चला कि दो दिन पहले तक यह ठीक था। लेकिन पिछले दो दिन से यह भाषण पर भाषण पेले जा रहा है। सभी मच्छरानियों को माताएं-बहनें कह रहा है। छोटी-छोटी मच्छरियों से कह रहा है कि जब तक तुम्हारा मच्छर मामा है, तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है....रिपोर्टर की तलाश पूरी हो गई थी। उसे वह मिल गया था, जिसने शिवराज सिंह को काटा था। अपाइंटमेंट मिलते ही तुरंत शुरू हुआ यह इंटरव्यू। दुनिया का पहला इंटरव्यू किसी मच्छर के साथ...

रिपोर्टर : मच्छर महोदय, एक विशिष्ट हस्ती के साथ आप रूबरू हुए। उनके साथ कैसा अनुभव रहा?
मच्छर : मेरी पूरी जिंदगी ही बदल गई। एक दिव्य अनुभूति हुई है। आप देख ही रहे हैं, कैसा रूपान्तरण हो गया है मेरा। मेरे मुंह से भाषण पर भाषण फूट रहे हैं।

रिपोर्टर : आप आम आदमी को भी काटते हैं और आपने एक नेता को भी काटा। दोनों में क्या अंतर महसूस हुआ?
मच्छर : देखिए, एक आम आदमी को काटना बड़ा आसान होता है। उसकी चमड़ी तो चमड़ी जैसी होती ही नहीं। बिल्कुल झिल्ली सी। ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती। डंक टच करते ही वह चमड़ी को पार कर जाता है। लेकिन नेताओं के साथ बड़ी मुश्किल होती है। बड़ी मेहनत करनी पड़ती है। कई बार हमारे डंक तक टूट जाते हैं। जो नेता का खून पीकर आता है, उसका हमारे यहां बड़ा सम्मान भी होता है। उसे नेता डंकमणि की उपाधि तक दी जाती है।

रिपोर्टर : खून-खून में भी कुछ फर्क होता है?
मच्छर : बिल्कुल। क्वालिटी में अंतर होता है। आम आदमी का खून क्या होता है। बिल्कुल पानी होता है। कुछ भी न्यूट्रिशियस उसमें नहीं होता। और अगर वह आम आदमी और भी टुच्चा-सा हुआ, आई मीन गरीब-गुरबा तो फिर तो कई बार हमारी जान पर बन आती है। गंदा पानी और स्प्रिट मिली कच्ची दारू पीने और रुखी-सूखी दो-चार रोटियां खाने वाले के खून में भला होगा भी क्या! ऐसा दूषित खून पीकर तो कई बार हमारे मच्छर लोग बीमार पड़ गए। हमने तो गर्भवती मच्छरानियों, बूढ़े-बुजुर्गों को झुग्गियों या छोटी बस्तियों में न जाने की हिदायत तक दे रखी है।

रिपोर्टर : पर नेताओं के खून में ऐसा क्या होता है जिसके आप बड़े मुरीद होते हैं?
मच्छर : देखिए, जैसा मैंने पहले बताया कि नेताओं का खून तो हम बड़ी मुश्किल से पी पाते हैं। हां, सरकारी अफसरों की चमड़ी अपेक्षाकृत थोड़ी पतली होती है। तो उनका खून हमारे लिए मुफीद रहता है। अच्छा तरी वाला खून होता है। शुद्ध घी, ऑर्गनिक सब्जियों और ड्राय-फूट्स के फ्लेवर होते हैं। तो हम सब उन्हीं का खून पीने को लालायित रहते हैं। कई बार तो हमारे यहां अफसरों का खून पीने को लेकर डंक तक चल गए, वो आपके यहां क्या कहते हैं, तलवारें चलना, वही समझ लो...

रिपोर्टर : पर अफसरों का खून भी इतनी आसानी से मिल जाता है?
मच्छर : वही तो कह रहा हूं कि एक अनार सौ बीमार जैसी स्थिति है। जैसे आम जनता का कैबिन में बंद अफसर से मिलना इतना आसान नहीं रहता , वैसे ही रात को मच्छरदानियों में बंद अफसरों का खून मिलना आसान नहीं रहता। .... अच्छा अब मैं चलता है। मुझे अगला भाषण देने पड़ोस की बस्ती में जाना है....

रिपोर्टर : बस आखिरी सवाल, इतनी चाक-चौबंद व्यवस्था के बीच आखिर आप एक मुख्यमंत्री के कक्ष में कैसे पहुंच गए?
मच्छर : जैसे हर सिस्टम में छेद होते हैं, वैसे ही हर मुख्यमंत्री के कक्ष में कुछ ऐसे छिद्र होते हैं जहां से हम पहुंच जाते हैं। बस पहुंचने वाला चाहिए... अच्छा नमस्कार।

(Disclaimer : यह केवल राजनीतिक कटाक्ष है, किसी की व्यक्तिगत मानहानि का प्रयास नहीं।)

इसी पर 30 सेकंड का हास्यास्पद वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक करें...

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शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021

Humor & satire : पेट्रोल की बढ़ती कीमतों से मोदी भी परेशान, देशभर में नेहरूजी के पुतले फूंकने की तैयारी



ह्यूमर डेस्क। लगता है पंडित नेहरू की फिर से शामत आने वाली है। इस बार मुद्दा है पेट्रोल के बढ़ते दाम। इस बात का संकेत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस बयान से मिलता है जो उन्होंने गुरुवार को तमिलनाडु के लिए तेल और गैस परियोजनाएं शुरू करते समय दिया। उन्होंने कहा कि अगर पूर्ववर्ती सरकारें (यानी नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक, माइनस अटल सरकार) ऊर्जा के लिए आयात पर इतनी निर्भर नहीं होतीं तो देश में तेल की कीमतें इतनी नहीं बढ़ती।

भाजपा के करीबी सूत्रों के अनुसार पेट्रोल की लगातार ऊंची होती कीमतों पर जिस तरह से जनता नाराजगी जता रही है, उसने पार्टी से लेकर सरकार तक सभी को चिंतित कर दिया है। सूत्रों केअनुसार मोदी के इस बयान के बाद पार्टी ने बड़ी तादाद में पंडित नेहरू के पुतले खरीदने की तैयारी शुरू कर दी है। खुद मोदीजी ने संकेत दिए हैं (देखें वीडियो) कि जल्दी ही पेट्रोल की बढ़ती कीमतों के खिलाफ भाजपा के कार्यकर्ता सड़कों पर प्रदर्शन करेंगे। इनमें नेहरूजी के पुतलों का भी इस्तेमाल किया जाएगा।

(Disclaimer : यह एक व्यंग्य वीडियो है जिसमें कार्टून्स का इस्तेमाल किया गया है।)

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