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रविवार, 19 सितंबर 2021

Satire : ग्राउंडवॉटर रिचार्ज करेंगी मप्र की ये सड़कें


 

By Jayjeet

मेरे शहर में दो सड़कें हैं। वैसे तो कई सड़कें हैं, लेकिन आज हम इन दो सड़कों की बात ही करेंगे। एक ख़ास सड़क है। वह उतनी ही ख़ास है जितना कि ख़ास कोई नेता या अफ़सर या जज या इनकी पत्नियां होती हैं। इसे कहने को वीआईपी रोड कह सकते हैं। वैसे ये ख़ास रोड है तो हुजूर, सरकार, जी मालिक, जी मालकिन टाइप के संबोधन अधिक फबते हैं। दूसरी आम सड़क है। ऐसी आम सड़कों की भरमार है। जिधर देखो उधर आम ही आम सड़कें। यह वैसी ही आम है, जैसे मैं और आप। चूंकि ये आम सड़क है तो आप इन्हें प्यार से अबे, ओए, स्साली जैसा कुछ भी कह सकते हैं। ये बुरा नहीं मानती हैं। आप इन पर थूक सकते हैं, कचरा फेंक सकते हैं। टेंट गाढ़ने के लिए कुदाली चला सकते हैं। मतलब वह सबकुछ कर सकते हैं, जो आप करना चाहें। बड़ी सहिष्णु होती हैं ये आम सड़कें। उफ्फ तक नहीं करतीं।

ये दोनों तरह की सड़कें किसी भी शहर में हो सकती हैं। होती ही हैं। ख़ासकर राजधानियों में। तो फिर आज अचानक इनकी याद कैसे आ गई? बताते हैं हम...

दरअसल, हुआ यूं कि चलते-चलते अचानक ख़ास और आम सड़क की मुलाकात हो गई। ख़ास सड़क ने बाजू ने गुजरती हुई आम सड़क को रोककर हालचाल पूछे। यह कोई मामूली बात है भला! वैसे हालचाल पूछे तो कुछ तो ख़ास बात होगी। कोई ख़ास यूं ही आम टाइप की चीजों से राब्ता नहीं बनाता...

'और कैसी हो आम सड़क?' ख़ास सड़क ने थोड़ी विनम्रता और थोड़े एटीट्यूड के साथ पूछा।

'ठीक ही हूं हुजूर। आज कैसे याद किया?' आम सड़क ने उतनी ही मिमियाती हुई आवाज में पूछा जितना कि एक आम से अपेक्षित होता है।

'इन दिनों तो बड़े जलवे हैं। हर जगह तुम्हारी ही चर्चा है। सुंदर-सुशील महिलाएं कैटवॉक कर रही हैं। अखबारों में तस्वीरें छपी थीं। देखी थी मैंने।' ख़ास सड़क ने बड़े ही ख़ास अंदाज में कहा।

यह एक सहज गुण है कि कभी किसी दिन गरीब को दो जून की रोटी से एक रोटी भी ज्यादा मिल जाती है तो अमीर के पेट में दर्द-सा उठ जाता है। ख़ास सड़क भी इससे परे नहीं है। दिनभर ख़ासों के साथ रहते-रहते यह ख़ासियत भी आ गई है उसमें।

'वो तो बस यूं ही...।' आम सड़क शर्म से तनिक गुलाबी लाल हो गई। फिर जोड़ा, 'मुझ पर से जो भी गुजरेगा, वह ऐसा ही लगेगा कि कैटवॉक कर रहा है। वे महिलाएं तो सिंपली मुझ पर चलकर गई थीं, लेकिन उनकी वह वॉक ही कैटवॉक बन गई। अख़बारों में तस्वीरें छप गईं। अब देखिए ना उस ऑटो को। देखो तो, कैसे बचता-बचाता चला आ रहा है और ऐसा लग रहा है कि कैटवॉक कर रहा है। सब बरसाती गड्ढों की महिमा है।'

'हूम....।'

ख़ासों के साथ रहते-रहते ख़ास सड़क भी हूम, हम्म करना सीख गई है। जब कुछ जवाब नहीं सूझता तो हूम, हम्म से अच्छा कोई जवाब नहीं होता। ऐसे जवाब अक्सर ख़ास लोगों के मुंह से झरते रहते हैं। बहुत सुंदर लगते हैं। देखिएगा कभी ध्यान से...

'वैसे शिवराज भैया जब चार साल पहले अमेरिका गए थे और कहा था कि अमेरिका की सड़कों से अच्छी तो हमारे यहां की सड़कें हैं तो वे आपकी ही तो बात कर रहे थे।' आम सड़क ने भी अपनी तारीफ़ के जवाब में ख़ास सड़क की तारीफ़ कर बात आगे बढ़ाई।

'हां, वो तो है।' एक हल्की-सी मुस्कान ख़ास के चिकने-चुपड़े चेहरे पर तैर गई। पर बरसाती गड्ढों को देखकर मुस्कान फिर रश्क में बदल गई। इसी ईर्ष्या में गड्ढों को लेकर सुनी-सुनाई बात उसकी जुबान पर आ गई - 'सुना है तुम्हारे इन गड्ढों को लेकर सरकार एक पायलट प्रोजेक्ट पर काम कर रही है!'

'अब ख़ास लोगों के साथ तो आप ही रहती है। तो आपने सही ही सुना होगा। हम क्या कहें। पर गड्ढों पर पायलट प्रोजेक्ट, यह क्या नया तमाशा है?' आम सड़क हो या आम आदमी, उसके लिए सभी प्रोजेक्ट तमाशे से ज्यादा नहीं होते।

'एक्चुअली, कल दो अफ़सर अपनी कार में बैठकर जा रहे थे और तुम्हारे इन्हीं गड्ढों के बारे में बात कर रहे थे। कह रहे थे कि गड्ढों से ग्राउंड वॉटर रिचार्ज करने के प्रोजेक्ट को सरकार ने स्वीकार कर लिया है। बारिश में इन गड्ढों का इस्तेमाल भूजल स्तर में बढ़ोतरी के लिए किया जाएगा।'

'अच्छा? और क्या कह रहे थे?' आम सड़क की दिलचस्पी अचानक उसी प्रोजेक्ट में जाग गई है जिसे वह कुछ देर पहले तमाशा कह रही थी।

'कह रहे थे कि अब सरकार ठेकेदारों को उसी तरह की सड़कें बनाने को पाबंद करेगी जो पहली बारिश में ही पर्याप्त गड्ढेयुक्त हो जाए।'

'हां, यह तो ठीक रहेगा। अभी दो-तीन बारिश का पानी यूं ही बह जाता है। तब जाकर थोड़े बहुत गड्ढे होते हैं। सेटिस्फैक्टरी गड्ढे होने में तो आधा मानसून ही बीत जाता है। पर इस प्रोजेक्ट से सरकार को क्या फायदा होगा?'

हां, मुद्दे की बात तो थी ही। आखिर सरकार को इससे क्या फायदा होगा? क्यों अफ़सर, बड़े अफ़सर, मिनिस्टर, हेड ऑफ मिनिस्टर्स जैसे लोग इतनी मेहनत करें। उनके पास तो जनहित के और भी कई काम होते हैं।

'अफ़सर कह रहे थे कि जब प्रोजेक्ट लागू हो जाएगा तो झीलों-तालाबों में पानी इकट्ठा करने की ज़रूरत ख़त्म हो जाएगी। पूरा पानी जब सीधे ज़मीन के भीतर ही चला जाएगा तो झील-तालाब की ज़मीनों का इस्तेमाल बिल्डरों के कल्याण कार्य हेतु किया जा सकेगा।' ख़ास सड़क ने बात ख़त्म की। दरअसल, यही बताने के लिए ही तो ख़ास सड़क ने आम सड़क से बात शुरू की थी। गॉसिप्स किसी के भी पेट में टिकते नहीं, फिर वह इंसान हो या सड़क अथवा ख़ास हो या आम।

'वॉव! आज पहली बार मुझे आम सड़क होने पर गर्व हो रहा है।' आम सड़क ने केवल सोचा, लेकिन कहा नहीं। क्या पता, ख़ास सड़क बुरा मान जाए।

ख़ास सड़क पहली बार अपनी किस्मत को कोस रही है। वह गड्ढेयुक्त होती तो यह प्रोजेक्ट खुद ही हथिया लेती। हालांकि कहा उसने भी कुछ नहीं। मन मसोसकर रह गई।

दोनों ने अपनी-अपनी राह ली।

शनिवार, 18 सितंबर 2021

पुलिस ने कानून के लंबे हाथ तो ठाकुर को लौटा दिए ...!


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by Jayjeet

बीते दिनों मप्र के एक शहर में 800 से भी अधिक पुलिसकर्मियों ने मार्चपास्ट किया। मकसद अपराधियों में ख़ौफ़ पैदा करना था। इससे अपराधियों में ख़ौफ़ पैदा हुआ होगा, ऐसा माना जा सकता है क्योंकि जिन क्षेत्रों के टीआई, पुलिसकर्मी इत्यादि उस रैलीनुमा मार्चपास्ट में शामिल हुए, उन क्षेत्रों में उस दिन एक भी अपराध न होने की ख़बर है। ख़बर के अलग-अलग अर्थ लगाने को पाठक स्वतंत्र हैं।

ख़ैर, वह वाकई बड़ा दिन था, कम से कम उस नए-नवेले रिपोर्टर के लिए। तो उसने रैली की व्यवस्था में लगे एक बड़े-से अफ़सर से बड़ी ही मासूमियत से पूछ लिया- "इतने सारे पुलिसकर्मी एक साथ क्यों? ख़ौफ़ पैदा करने के लिए तो आपका एक ठुल्ला ही काफ़ी होता है। हमारी बस्ती में आता है तो बहू-बेटियां घरों के अंदर हो जाती हैं। गली किनारे ठेले-खोमचे लगाने वाले सैल्यूट ठोंकने लगते हैं। पनवाड़ी पान लिए सेवा में पहुंच जाते हैं।' कच्चे से रिपोर्टर ने अपना टुच्चा-सा अनुभव उस अफ़सर के साथ शेयर किया।

अफ़सर अनुभवी था। इसलिए नए-नवेले रिपोर्टर की इतनी बेवकूफी भरी बात का भी उसने मजाक नहीं उड़ाया। ठुल्ला शब्द का भी बुरा नहीं माना। बस मुस्कुरा कर कहा - 'देखिए, आप जैसों की बस्तियों में ख़ौफ़ पैदा करने के लिए हमारा एक जवान तो क्या, उसका डंडा भी पहुंच जाए तो शरीफ़ लोग दंडवत हो जाते हैं। लेकिन बड़े अपराधियों में ख़ौफ़ के लिए बड़ा मार्चपास्ट जरूरी होता है। इससे उन्हें यह संदेश मिलता है कि राज तो कानून का ही चलेगा, भले ही कोई भी चलाएं। इससे अगले कुछ दिनों तक बड़े अपराधी, माफ़िया टाइप के सभी लोग कानून का विधिवत पूरा सम्मान करने लगते हैं। ख़ौफ़ बिन सम्मान नहीं, आपने सुना ही होगा। और जैसे ही सम्मान कम होता है, हम फिर मार्चपास्ट निकालकर थोड़ा बहुत ख़ौफ़ भर देते हैं।'

नए-नवेले रिपोर्टर ने दूसरा मूर्खतापूर्ण सवाल फेंका - 'पूरे शहर भर के पुलिस वालों को आपने एक जगह एकत्र कर लिया है। अगर किसी दूसरी जगह पर कोई क्राइम वगैरह हो गया तो आप क्या करेंगे? क्या यह मिस मैनेजमेंट नहीं है?'
अफ़सर, जो ऑलरेडी बहुत ही अनुभवी था और कई तरह की डील करते-करते इस तरह के मूर्खतापूर्ण सवालों को डील करना अच्छे से सीख चुका था, ने इस बार भी इस सवाल का मजाक नहीं उड़ाया। पर इस बार मुस्कुराया भी नहीं। गुस्से को पीते हुए उसने बड़ी ही गंभीरता से कहा - 'क्राइम कब होता है? जब वह दर्ज़ होता है। दर्ज़ कब होता है? जब पुलिस दर्ज़ करती है। जब पुलिस ही नहीं होगी तो क्राइम दर्ज़ कौन करेगा? और जब क्राइम दर्ज़ ही नहीं होगा तो क्राइम कहां से हो जाएगा? अपराधों और अपराधियों के मैनेजमेंट का यह सिंपल-सा फंडा है।'

बात तो बहुत सिंपल थी। पर रिपार्टर के समझ से परे थी। तो उसने अगला सवाल दागा जो उतना ही मूर्खतापूर्ण था, जितने पहले के दो सवाल थे। सुनिए - 'कानून-व्यवस्था के हाथ तो बड़े लंबे होते हैं। तो रैली निकालने की क्या ज़रूरत? बैठे-बैठे ही कानून अपने लंबे हाथों से अपराधियों को नहीं पकड़ सकता?'

अफ़सर कितना भी अनुभवी क्यों न हो, उसके धैर्य की भी सीमा होती है। अफ़सर चाहता तो इस सवाल पर अपने बाल नोंच सकता था, पर उसने ठहाके लगाने का ऑप्शन चुना। अब ठहाका, वह भी एक बड़े पुलिस अफ़सर का तो ऐसा ही होता है। इसमें उस अफ़सर की कोई गलती नहीं। पर क्या करें? रिपोर्टर ठहरा नया-नवेला, कोई शातिर-अनुभवी अपराधी तो नहीं कि ऐसे जालिम ठहाकों में वह भी ठहाके से ठहाका मिलाकर साथ दे। तो उस भयावह ठहाके से रिपोर्टर का दिल दहलकर वाइब्रेशन मोड में पहुंच गया। दो-चार मिनट में माहौल वाइब्रेशन मोड से नॉर्मल मोड में वापस आया तो रिपोर्टर का दिल भी सामान्य हुआ। उसने बड़ी मासूमियत के साथ अफ़सर की ओर देखा, इस उम्मीद के साथ कि उसे अपने उस सवाल जो बेशक मूर्खतापूर्ण था, का जवाब मिलेगा। लेकिन अफ़सर तो जवाब दे चुका था और अगले मूर्खतापूर्ण सवाल के इंतज़ार की मुद्रा में था।

पर रिपोर्टर अब भी अपने उसी मूर्खतापूर्ण सवाल पर अटका है। 'पर सर, कानून के हाथ ऑलरेडी इतने लंबे हैं तो पुलिस जवानों को पैर लंबे करने की क्या जरूरत थी?'

'देख भाई...' अफ़सर अब 'देखिए' से 'देख' पर और 'आप' से 'तुम' पर आ रहा है। संकेत साफ़ है कि मूर्खतापूर्ण सवाल कुछ ज्यादा ही हो रहे हैं। फिर भी जो पूछा है, उसका जवाब वह यथासंभव शालीनता से देने की कोशिश कर रहा है- 'देश की मूल समस्या ही यही है। तुम लोगों को कानून के लंबे-लंबे हाथ तो नज़र आते हैं, लेकिन यह भी देखो कि वे लंबे हाथ आपस में ही कितने उलझे हुए हैं। इसलिए बार-बार लंबे हाथों की दुहाई मत दो यार। ये हाथ अब हमारे किसी काम के नहीं हैं। हमने ठाकुर को लौटा दिए हैं...।' एक शॉर्ट टर्म ठहाका। अफ़सर अनुभवी है जो जानता है कि अपनी किसी तात्कालिक मूर्खतापूर्ण बात को किस तरह ठहाके में उड़ाया जा सकता है।

रिपोर्टर अब भी प्रश्नवाचक मुद्रा में है। उसकी मुद्रा को देखते हुए पुलिस अफसर ने बात पूरी की, 'इसलिए हम पैर फैलाने पर फोकस कर रहे हैं। मार्चपास्ट को उसी प्रोजेक्ट का हिस्सा मान लो, और क्या!'

'लेकिन पुलिस के कानून वाले लंबे हाथ तो रहे नहीं, जैसा आप कह रहे हैं। तो केवल पैर फैलाने से अपराध कैसे कम हो जाएंगे? नए-नवेले रिपोर्टर के इंटरव्यू का अंतिम समय निकट ही है।

'हमने कब कहा कि इससे अपराध कम हो जाएंगे? हम तो बस अपराधियों में ख़ौफ़ पैदा करने की बात कर रहे हैं। वही तो हमारा मकसद है।'

मार्च-पास्ट ख़त्म होने जा रही है। फिर ड्यूटी पर लगना है। तो अफ़सर के पास टाइम-पास का टाइम भी ख़त्म हुआ। नया-नवेला रिपोर्टर अब भी हेडलाइन की तलाश में है।

# police march past

शुक्रवार, 20 अगस्त 2021

Satire : चौराहे पर काबुलीवाला और तमाशबीनों की तालियां

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चौराहे पर सवालों की झोली के साथ अकेला खड़ा काबुलीवाला।


 By ए. जयजीत

काबुलीवाला ... हां, वही काबुलीवाला। याद ही होगा सबको। गुरुदेव रवींद्रनाथ की कहानी का पात्र। पांच साल की बच्ची मिनी का अधेड़ दोस्त। गलियों में घूम-घूमकर ड्रायफ्रूट्स बेचता, मिनी में अपनी बेटी को याद करता काबुलीवाला।

आज यह काबुलीवाला फिर आया है। चौराहे पर खड़ा है, अकेला। उसकी यादों में अब कोई बेटी नहीं है, क्योंकि अपनी बेटी को तो वह तालिबानियों के रहमो-करम पर छोड़ आया है। उसकी झोली में अब वे ड्रायफ्रूट्स भी नहीं हैं। कुछ हैं तो चंद सवाल। कुछ पुराने, कुछ नए। वह शायद जानता है कि उसे या उसके सवालों को सुनने वाला भी कोई नहीं है। फिर भी उसने अपनी झोली में कम से कम कुछ सवाल तो बचा रखे हैं।

जब आदमी को कोई सुनने वाला नहीं होता है तो वह खुद से बातें करने लगता है। तब वह पागल भी करार दिया जाता है। और जब कोई पागल जैसी हरकतें करता है तो तमाशा बन ही जाता है। तमाशबीन जुट ही जाते हैं। काबुलीवाला आज पागल की तरह चौराहे पर खड़ा है। झोली से सवाल निकाल रहा है। उसके सवालों के जवाब किसी के पास नहीं हैं। या हैं भी तो जवाब कोई देगा नहीं। तो अपने सवालों के जवाब भी वह खुद ही दे रहा है।

पागलपन बढ़ते ही मजमा भी बढ़ता चला जाता है। काबुलीवाले का मजमा भी बढ़ता जा रहा है। तमाशा देखने के लिए पूरी दुनिया जुट गई है। यह लेखक भी चुपचाप उसी तरह तमाशबीन भीड़ का हिस्सा है, जैसे कई और भी हैं।

काबुलीवाले ने अपनी झोली से पहला सवाल निकाला और खुद ही बड़बड़ाते हुए पूछने लगा :  'हे संयुक्त राष्ट्र, तू क्यों चुप बैठा है? तुझ पर तो हर साल 3 अरब डॉलर खर्च होते हैं। यह इतना पैसा है कि हमारे जैसे कई मुल्कों के बाशिंदों को एक वक्त की रोटी मिल सकती है। मगर यहां रोटी भी नसीब नहीं है। न बहन-बेटियों को इज्जत। फिर भी तू चुप बैठा है? तुझे हमारी कोई चिंता नहीं?'

 पागलपन में आदमी अक्सर अदबी भूल जाता है। नहीं तो काबुलीवाले की क्या औकात कि संयुक्त राष्ट्र से तू-तड़ाके से बात करे! किसी और की भी क्या हैसियत संयुक्त राष्ट्र के सामने!

पर बेचारा संयुक्त राष्ट्र भी क्या करे। उसे तो मालूम भी नहीं होगा कि कोई काबुलीवाला उससे सवाल कर रहा है।  पता नहीं, उसे यह भी मालूम है या नहीं कि दुनिया में अफ़ग़ानिस्तान नाम की कोई जगह भी है। और मालूम करके करेगा भी क्या! अफ़ग़ानिस्तान जैसे तो न जाने कितने देश होंगे। सबकी इतनी फिक्र करेगा तो बड़े देशों की जी-हुजूरी करने का समय कब मिलेगा। जी-हुजूरी को छोटा काम ना समझें। बड़े झंझट होते हैं इसमें। न जाने कितनी बार सिर झुकाना होता है। उनके प्रपोजलों पर हस्ताक्षर करने होते हैं, वह भी आंख बंद करके। उफ्फ!  कितना मुश्किल होता होगा ये सब।  तो उसे अफ़ग़ानिस्तान जैसे छोटे-छोटे मसलों पर फंसाना ठीक नहीं। इसलिए संयुक्त राष्ट्र से सवाल पूछने से बड़ा तालिबानी जुर्म और क्या होगा! वैसे अगर संयुक्त राष्ट्र खुद उस चौराहे पर उपस्थित होता, तब भी इस सवाल का जवाब देना उचित नहीं समझता। हो सकता है किसी अन्य भेष में वह उस चौराहे पर तमाशबीन बना बैठा भी हो।

खुद काबुलीवाला भी जानता है कि संयुक्त राष्ट्र से इसका जवाब नहीं मिलना है। तो उसने खुद ही संयुक्त राष्ट्र की ओर से धीमी मगर सधी हुई आवाज में जवाब देना शुरू किया। वैसे ही जैसे ऐसी संभ्रांत संस्थाओं के कुलीन अफसर देते हैं।

'चिंता मत करो हे काबुलीवाला। हम बहुत ही शिद्दत से तुम्हारे साथ हैं। पिछले कई दिनों से हम तुम्हारे लिए चिंता जता रहे हैं। तीन दिन पहले ही हमारे महासचिव ने पूरी दुनिया को तुम्हारे मामले में साथ आने को कहा है। और क्या चाहिए तुम्हें? वैसे क्या तुम्हारे लिए यह गर्व  की बात नहीं है कि हमारे सभी अफसर अफ़ग़ानिस्तान के ड्रायफ्रूट्स खाकर ही अपने दिन की शुरुआत करते हैं। कसम से, क्या कमाल के ड्रायफ्रूट्स पैदा करते हों तुम लोग। लेकिन यहीं पर हमारे लिए एक चिंता की बात और है...'

काबुलीवाला ने खुद ही प्रतिप्रश्न पूछा -  'और क्या चिंता रह गई?'

'अरे क्या तुमने वे क्लीपिंग्स नहीं देखी जब तालिबान के लीडर्स भी ड्रायफ्रूट्स खा रहे थे। कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारे यहां के सारे ड्रायफ्रूट्स पर तालिबानियों का कब्जा हो जाए। कितनी बेरहमी से वे ड्रायफ्रूटस खा रहे थे। पूरी दुनिया ने देखे हैं वे दृश्य। वाकई दिल को दहला देते हैं। बहुत ही बर्बर हैं तुम्हारे यहां के तालिबानी। वहां के ड्रायफ्रूट्स को लेकर हम वाकई बहुत चिंतित हैं। हम फिर कह रहे हैं, अपना ध्यान रखना और हमारे ड्रायफ्रूट्स का भी। हम जल्दी ही एक मीटिंग भी करने वाले हैं। उस मीटिंग में भी हम जोरदार शब्दों में चिंता जताएंगे। तुम बिल्कुल भी चिंता मत करना।'

काबुलीवाला ठहरा पागल । संयुक्त राष्ट्र को तुरंत छोड़कर उसने झोले से दूसरा सवाल निकाल लिया। यह सवाल अमेरिका से था। सवाल था तो घिसा-पीटा ही, फिर भी सुन लीजिए - 'तू तो खुद को पूरी दुनिया का चौधरी मानता है। तो अब अचानक अफ़ग़ानिस्तान को मझधार में छोड़कर क्यों जा रहा है? तेरे सारे हथियार चूक गए हैं क्या?'

अमेरिका की तरफ से काबुलीवाला ने ही जवाब दिया - 'क्यों भूल गया हमारे सारे अहसान? अहसान फ़रामोश! मैंने सालों तुम्हारे बेरोजगार मुजाहिदीनों को पाला-पोसा। उनके हथियारों पर करोड़ों-अरबों का खर्च किया। पर इसके बदले में मुझे क्या मिला? एक ओसामा बिन लादेन। फिर उससे छुटकारा पाने के लिए अरबों-खरबों खर्च करने पड़े। फिर अफ़ग़ानिस्तान की भ्रष्ट सरकारों को पालना-पोसना पड़ा। इतना तो किया? अब अफ़ग़ानिस्तान को बर्बाद करने का पूरा ठेका हमने ही थोड़े ले रखा है।'

अमेरिका का जवाब शायद काबुलीवाला ने सुना नहीं। हां, तमाशबीनों की भीड़ ने सुन लिया है। इसीलिए तालियों की आवाज़ आ रही है।

काबुलीवाला के झोले में तो कई सवाल हैं। अगला सवाल पाकिस्तान से था। उसने सवाल को बड़ी ही हिकारत से देखा और जमीन पर फेंककर उसे पैर से मसल दिया। फिर और भी कई सवाल निकले - रूस से, चीन से, पश्चिमी मुल्कों से। पब्लिक वेलफेयर का दावा करने वाली विश्व संस्थाओं से। वह सभी सवालों को जमीन पर फेंकता जा रहा है। अब तो पूरा ही पागल जैसा बर्ताव करने लगा है। इसलिए तमाशबीनों को और भी मजा आने लगा है। तालियों की आवाज बढ़ गई है। वे सब भी शायद तमाशबीन का हिस्सा ही हैं, जिनसे पूछने के लिए काबुलीवाले के झोले में सवाल हैं।

अब उसके झोले में बस एक अंतिम सवाल बाकी है। निकालते ही उसे चूम लिया। उसे याद आ गई कोलकाता की वह गली जहां वह पहली बार उस बच्ची मिनी से मिला था। उसे ड्रायफ्रूट्स देता था। लेकिन अब न वह मिनी रही होगी, न वह गली। जिससे वह सवाल है, वह तमाशबीनों की भीड़ में शामिल नहीं है, लेकिन उसके साथ भी नहीं है। वह कहीं दूर उसकी ओर पीठ किए हुए हैं। वहां भी तो अब मानसिकता पर तालिबान चिपक गए हैं। तो जवाब देने का नैतिक साहस शायद उसके पास भी कहां होगा!

काबुलीवाला की आंखों के किनारे से आंसू की एक बूंद टपक पड़ी। तमाशबीन का हिस्सा बने इस लेखक की आंखें भी नम हैं, पर उसे तो तटस्थ रहना है। तटस्थता ही सबसे मुफ़ीद होती है।

काबुलीवाला ने वह सवाल ससम्मान अपने झोले में सरका दिया है। शायद यह सोचकर कि जब आमने-सामने मुलाकात होगी तो पूछेगा- क्यों भुला दिया अपने काबुलीवाले को! क्यों भुला दिया उस गांधार को जिसे जीतने के लिए भीष्म ने एक पल की भी देरी नहीं की थी? अपने पितामह को याद करके भी क्यों तुम्हारी भुजाएं अब फड़कती नहीं?

पूछेगा, जरूर पूछेगा...। जवाब तो देना होगा!

(ए. जयजीत खबरी व्यंग्यकार हैं। संवाद शैली में लिखे व्यंग्यों के लिए चर्चित हैं।)

रविवार, 15 अगस्त 2021

Satire & humor : एक डंडे के फासले से मिलता है सिस्टम

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By Jayjeet

और उस दिन तंत्र की जन से मुलाकात हो गई। पाठकों को लग सकता है कि भाई तंत्र और जन दोनों की मुलाकात का क्या चक्कर है? दोनों तो साथ ही रहते हैं - जनतंत्र। 

जी नहीं, ऐसे लिखे हुए पर बिल्कुल ना जाइए। इसमें तो भारी धोखा है। ऐसा लिखा हुआ तो खूब मिलेगा। कानूनों की किताबों में खूब अच्छी-अच्छी बातें मिलेंगी, पर सब अच्छा-अच्छा होता है क्या! दरअसल, जन और तंत्र दोनों जनतंत्र नहीं, जन-तंत्र की तरह रहते आए हैं। जन और तंत्र के बीच एक बहुत बड़ा डैश है। सरकारी स्कूलों का मास्टर उसे समझाने के लिए डंडा कहता है। यही डंडा तंत्र के पास है, जन के पास नहीं। इसलिए दोनों साथ-साथ रहते हुए भी साथ नहीं हैं। एक डंडे का फासला है दोनों के बीच। जन जब मजबूरी में तंत्र से मिलने के लिए उसके पास जाता है, कभी थाने में, कभी तहसील कार्यालय में, कभी कोर्ट-कचहरी में, तो इसी एक डंडे के फासले पर मिलता है।

पर अभी तो तंत्र ही जन से मिलने आया है। ऐसा कैसे? तंत्र को क्या पड़ी कि अपनी कुर्सी छोड़कर जन से मिलने चला आए? होती है भाई, साल में कम से कम दो बार तंत्र की जन से मुलाकात होती है। वे दिन ही ऐसे होते हैं। उन दिनों तंत्र बहुत भावुक हो जाता है। राष्ट्रभक्ति के गीत उसे रुलाने लगते हैं। उसे बापू, नेताजी बोस, भगतसिंह याद आने लगते हैं और इसी भावुकतावश वह जन से मिलने चले आता है।

 तंत्र आज फिर जन से मिला है। इतना पुनीत मौका है तो व्यर्थ की बातें छोड़कर उनकी बातें सुन लेते हैं। 

'नमस्कार जन महोदय, कैसे हों?' विनम्रता का दिखावा करते हुए भी एटीट्यूड तो वही है जो तंत्र में होता है। जरूरी भी है। नहीं तो दो टके के जन को सिर चढ़ने में समय नहीं लगता है। 

'अरे सर। आज आप कैसे? हमारा अहोभाग्य। आप खुद मिलने चले आए।' जन जितना संभव हो सके, झुकने की कोशिश में है। वैसे पिछले 75 साल में झुकते-झुकते वह झुकने के मैग्जीमम लेवल पर तो पहुंच ही चुका है। फिर भी तंत्र के इगो को सेटिस्फाई करने के लिए कोशिश करते दिखना जरूरी है।    

'अबे, पहली बार मिल रहे हैं क्या? याद ना आ रहा? तंत्र ने हल्की सी झिड़की लगाई जो न चाहते हुए भी तगड़ी हो गई। ऐसी कभी-कभार की सौजन्य मुलाकातों से आदतें थोड़ी बदलती हैं। इसलिए 'अबे' यकायक मुंह से निकल गया। विनम्रता साइड में चली गई। 

'सर माफी चाहूंगा, याद ना आ रहा। पर आप अचानक मिलने क्यों आए?' देखिए जन का हरामीपना। अपनी छोटी-छोटी समस्याओं में याद ही नहीं रहता कि कुछ माह पहले ही तो तंत्र उससे मिलने आया था। 26 जनवरी के आस-पास का ही समय होगा। साल में दो बार मिलते ही हैं तंत्र महोदय, फिर भी भूल जाता है जन। 

पर आज तंत्र ने बुरा नहीं माना। बुरा मानने का अभी मौका नहीं है। बोला, 'तूफान से लाए हैं कश्ती निकालकर टाइप कुछ सुना तो अचानक भावुक हो गया और लगा कि तुमसे मिलने का वक्त फिर आ गया है। ऐसे गाने पता नहीं कौन लिख गया। कसम से, रुला देते हैं।' हाथ जेब में रखे रुमाल की ओर जाते-जाते रुक गया। आंखों को भी पता है कि कहां रोना है। जन के सामने भावुकताभरी बातें कहने से ही काम चल जाता है, तो झूठे आंसू बहाने का क्या मतलब। 

 'जी सर। प्रदीप जी लिख गए।' जन ज्ञान बघारने का मौका नहीं छोड़ता, वाट्सऐप हो या सीधे तंत्र से बातचीत। 'वैसे सर, मुझे तो अभी पिछले हफ्ते बाढ़ की वजह से जो हालात हुए, उन्हें देख-देखकर रोना आ रहा है। बेचारे कितने लोग बेघर हो गए, कितनी फसलें नष्ट हो गईं।' जन ने बात जारी रखी। 

'फिर वही तुच्छ बातें। भाई, जरा अपना स्तर बढ़ाओ। वो कौन-सा गीत था ना! उसे सुनकर तो पंडितजी भी रो दिए थे। अपने वर्तमान पीएम साहब भी अभी किसी बड़ी बात पर रो दिए थे। देखो, बड़े लोग कैसी बड़ी-बड़ी बातों पर रोते हैं और तुम स्साला छोटी-छोटी चीजों का ही रोना रोते रहते हों कि सड़क खराब है, पानी गंदा आ रहा है, कचरा गाड़ी नहीं आ रही, फसल खराब हो गई, काम-धंधा नहीं है। इसीलिए हम तंत्र लोगन को तुम जन लोगन से मिलने की इच्छा नहीं होती।' तंत्र भावुकता के साथ व्यावहारिकता का पुट डाल रहा है। 

'पर सर, स्तर बढ़ाने के लिए अतिरिक्त चार पैरों की जरूरत पड़ती है। वे कहां से लाएं?' यह बात जन ने कटाक्ष में कही या असल में, जन ही जाने। उसका इशारा कुर्सी की ओर है। ऐसा कहते हुए उसकी रीढ़ दो इंच ऊपर उठ गई है। हिम्मत भले ही अनजाने में की गई हो, रीढ़ की हड्‌डी को थोड़ा ऊंचा कर ही देती है।

इधर, चार पैरों का उल्लेख होते ही तंत्र के चेहरे पर मलाई जैसी चमक आ गई। तंत्र को बखूबी पता है इन चार पैरों की इस ताकत के बारे में। उसे ना पता होगा तो किसे होगा। तंत्र और चार पैर अब एक-दूसरे के पूरक हो चुके हैं। पूरा तंत्र इन चार पैरों पर चलता है। चार पैरों की महिमा ही है कि तंत्र के दरवाजे के बाहर चार पैर वाले स्टूल पर बैठे हुए चपरासी में भी तंत्र की वही शक्ति आ जाती है, जो दरवाजे के अंदर बड़ी-सी कुर्सी पर बैठे किसी मंत्री या अफसर के पास होती है। भले ही मौके-बेमौकों पर भावुकतावश तंत्र अपने दो पैरों पर जन से मिलने चला आता हो, लेकिन जन यह न मान ले कि तंत्र अपने चार पैर कहीं छोड़कर उससे मिलने आता है। चार पैरों का दंभ उसकी मानसिकता के साथ चिपककर उसके साथ ही आता है। 

75 साल का यही हिसाब-किताब है। यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है! देवलोक में बैठे हमारे स्वतंत्रता सेनानी इस पर अक्सर आंसू बहाते हैं। आज खुशी का मौका है। तो उन्हें खुशी के आंसू ही मान लेते हैं..!! 

(ए. जयजीत खबरी व्यंग्यकार हैं। संवाद शैली में लिखे व्यंग्यों के लिए चर्चित हैं।)

बुधवार, 4 अगस्त 2021

Satire : और अचानक सत्य से हो गई मुलाकात....

(आज अगर अचानक हमारी सत्य नामक जीव से मुलाकात हो जाए तो वह हमें दूर ग्रह का एलियन टाइप ही दिखेगा... सोचिए उस रिपोर्टर की जिसकी अचानक ऐसे ही एलियन से मुलाकात हो गई...)


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सत्य आज कुछ-कुछ ऐसा ही एलियन टाइप नजर आएगा। 

By Jayjeet

सच इन दिनों ट्रेंड में है। हर कोई सच की तलाश में है। कोई पेगासस जासूसी कांड का सच जानना चाहता है तो किसी को किसान आंदोलन के पीछे के सच की चिंता है। पर सच जानकर करेंगे क्या? यह किसी को भी पता नहीं। 


लेकिन सच है कहां? क्या वाकई कहीं सच है भी? उस रिपोर्टर का तो यही दावा था कि हां, उसने सच को ढूंढ निकाला।


हुआ यूं कि उस दिन रिपोर्टर किसी ब्रेकिंग न्यूज की तलाश में नगर निगम के बाजू में स्थित बापू की प्रतिमा के पास खड़ा था। उसे वहीं एक कोने में पड़े कचरे के ढेर से एक साया झांकता हुआ नजर आया। रिपोर्टर ने ब्रेकिंग न्यूज के फेर में उसी साये को पकड़कर ढेर से बाहर निकाल लिया। पर यह क्या! एलियन जैसी आकृति! रिपोर्टर ऐसी आकृति पहली बार देख रहा था। तो चौंकना लाजिमी था। शुक्र है आसपास कोई और ना था। (नोट : दी गई तस्वीर उसी रिपोर्टर द्वारा दिए गए ब्योरे के आधार पर बनाई गई है।)


"आप कौन? इससे पहले तो आपको कभी देखा नहीं!' रिपोर्टर ने उस अनूठी एलियन टाइप की आकृति से बड़े ही अचरज के साथ पूछा। 


"मैं बताना तो नहीं चाहता, पर झूठ भी नहीं बोल सकता।' कचरे को झाड़ते हुए एलियन टाइप के साये ने जवाब दिया। अब वह गांधी मूर्ति के पास बहुत ही सतर्क होकर बैठ गया। 


"अच्छा...तो सच ही बोल दीजिए।' रिपोर्टर ने कुटिल मुस्कान के साथ ऐसे कहा मानो कोई बहुत बड़ा कटाक्ष कर दिया हो।


"जी मैं सत्य ही हूं।' बेचारा सत्य, रिपोर्टर के कटाक्ष को क्या जाने और क्या समझे। 


"अच्छा..... वही सत्य जिसकी लोग हमेशा तलाश में रहते हैं?'

 

रिपोर्टर को भरोसा नहीं हो रहा है। इसलिए उसने दो बार अपनी आंखें मसली, आकृति को छूकर सत्य की पुष्टि करनी चाही। फिर जेब से 100 रुपए का नोट निकाला। उलट-पलटकर देखा। गांधीजी की तस्वीर के बाजू में लिखे सत्यमेव जयते में "सत्य' आलरेडी उपस्थित था। तो यह कोई फेक सत्य तो नहीं! रिपोर्टर दुविधा में है। फिर उसने नोट को जेब के अंदर सरकाते हुए मामले का और भी सच जानने का निश्चय किया। 


"क्या सोच रहे हो महोदय?' सत्य ने बड़ी ही अधीरता के साथ इधर-उधर झांकते हुए कहा। उसकी अलर्टनेस बढ़ गई है। थोड़ी घबराहट भी।


"आप वाकई सत्य हो? पर उस कोने में पड़े कचरे के ढेर में क्या कर रहे थे?' रिपोर्टर ने तफ्तीश शुरू की।


"भाई, मेरी वहीं जगह है। आप लोगों ने ही तय की हाेगी। मैं तो कब से कोने वाले उसी कचरे के ढेर मंे पड़ा हूं। अच्छा होता, मुझे आप वहीं अंदर ही रहने देते। मैं जब तक छिपा हूं, तभी तक सुरक्षित हूं।' सत्य लगातार इधर-उधर देख रहा है। असुरक्षा और घबराहट के भाव बरकरार हैं। 


"आप इतने डरे-डरे, सहमे-सहमे से क्यों हों?'


"मुझे देखते ही कहीं लोग मेरा एनकाउंटर न कर देें। वैसे अब तो लिंचिंग का भी फैशन चल पड़ा है। इसीलिए... कृपया मुझे तुरंत जाने दीजिए। मैं वहीं ठीक हूं।'


"पर आपको डरना क्यों चाहिए? वैसे भी कहा ही गया है, सांच को आंच नहीं। अगर आप वाकई सत्य हो तो फिर काहें का डर?' रिपोर्टर ने सत्य की सत्यता की पुष्टि करने के लिए बचपन में पढ़ा हुआ मुहावरा फेंका।

  

"जब नेता टाइप के लोग मेरी रोटी बनाकर मुझे सेंकते हैं तो आंच मुझे भी लगती है।'  


"हो सकता है, वे आपके साथ प्रयोग करते हों, जैसे कभी बापू ने किए थे। मैंने कहीं पढ़ा था- गांधीजी के सत्य के प्रयोग। ऐसा ही कुछ...' रिपोर्टर ने एक ठहाका लगाया। पता नहीं क्यों लगाया। शायद अपनी ही बचकानी बात पर मोहर लगाने के लिए।


"भाई साहब, आप भी अच्छा मजाक कर लेते हों। अच्छा मुझे जाने दीजिए...' सत्य भी रिपोर्टर के मजाक को समझ गया। अब भी जाने की जिद पर अड़ा है।


"मैं आपके साथ हूं ना। आप घबराइए मत। आपका कुछ नहीं होने वाला।' राजनीतिक रिपोर्टिंग करते-करते इस तरह के आश्वासन रिपोर्टर्स की जबान पर भी स्थाई भाव की तरह चिपक ही जाते हैं।


"पुलिस, सीबीआई या सीआईडी वाले, इनसे आप बचा लोंगे? सबसे ज्यादा डर तो इनसे ही लगता है।' भयंकर घबराया हुआ सा है सत्य।


"लेकिन सत्य जी, पुलिस, सीबीआई, सीआईडी, ये तो हमेशा से ही आप के मुरीद रहे हैं। सत्य को ढूंढने की इन पर एक महती जिम्मेदारी भी है। अगर आप इनसे बचकर रहेंगे तो कैसे काम चलेगा? जनता तक सच पहुंचेगा कैसे?'


"नहीं भाई, दो-चार बार मैं इनसे मिला भी तो इन्होंने मेरा ये हाल किया कि उसे याद करके आज भी सिहर उठता हूं। मुझे इतना तोड़ा-मरोड़ा कि मैं, मैं ना रहा।'


"ऐसा वे क्या करते हैं? हम भी तो जानें जरा...' रिपोर्टर ने अनजान बनने का नाटक करते हुए पूछा। 

 

"इनके पास पहले से ही झूठ का सांचा रहता है। बस, उस सांचे में मुझे तोड़-मरोड़कर पटक देते हैं।' 


"लेकिन इसके लिए तो आप ही जिम्मेदार हैं।' रिपोर्टर ने शायद बड़ी बात कह दी।


"कैसे भला? अब चौंकने की बारी सत्य की थी। रिपोर्टर ने वाकई बड़ी बात ही कही थी। 


"आपकी तलाश में न जाने कितनी संसदीय समितियां बनती हैं, न जाने कितने बड़े-बड़े कमीशन बनते हैं। उनमें बड़े-बड़े अफसर नियुक्त होते हैं, सेवानिवृत्त जजों को तकलीफ दी जाती है। उनके ऑफिस, गाड़ियों पर खर्च अलग होता है। वह भी दो टके के सच, सॉरी, आई मीन सिर्फ आपकी तलाश में। एक सच को जानने के लिए कितनी मशक्कत करनी पड़ती है बेचारों को। और फिर जब वह नहीं मिलता है तो पुलिस, सीबीआई, सीआईडी की मदद लेनी ही पड़ती है। क्या करें वे भी।' रिपोर्टर ने नैतिक ज्ञान पेला। 


"मैं समझा नहीं।' सत्य वाकई मासूम ही है। 


रिपोर्टर बगैर रुके रौ में बोल रहा है, "या फिर उन्हें आपकी तलाश इसी वाले सत्यमेव जयते के "सत्य' पर जाकर खत्म करनी पड़ती है।' रिपोर्टर ने उसी 100 रुपए के नोट को जेब से निकालते हुए सत्यमेव जयते वाले सत्य की ओर उंगली दिखाते हुए एलियन टाइप सत्य से कहा।  


इस बीच रिपोर्टर के बॉस का फोन भी आ गया। रिपोर्टर सत्य से साक्षात्कार की ब्रेकिंग न्यूज को लेकर फोन पर ही अपने बॉस को कन्विंस करने में लगा है। उधर बॉस शायद हंस रहा है।  


इधर, सत्य किंकर्त्तव्यविमूढ़ खड़ा है और फिलहाल तो वह उसी कोने की ओर देख रहा है, जहां पड़े कचरे में से रिपोर्टर ने उसे ढूंढ निकाला था। ढूंढ क्या निकाला था, खींचकर जबरदस्ती बाहर निकाल लिया था। वह रिपोर्टर से नजरें बचाकर जल्दी से उसी ढेर में ओझल हो जाना चाहता है, लोगों को पता चले उससे पहले ही। फिर रिपोर्टर लाख दावा करें, कौन भरोसा करेगा। 

(ए. जयजीत खबरी व्यंग्यकार हैं। संवाद शैली में लिखे व्यंग्यों के लिए चर्चित हैं।)


गुरुवार, 29 जुलाई 2021

Satire : संसद ने अपने प्रांगण में लगी बापू की प्रतिमा से क्या कहा?

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-  ए. जयजीत 

अरसा हो गया। इतने वर्षों से बापू को एक ही पोजिशन में बैठे हुए देखते-देखते। झुके हुए से कंधे। बंद आंखें। भावविहीन चेहरा। कहने की जरूरत नहीं, उम्मीद विहीन भी। चेहरा भावविहीन तो उसी दिन से हो गया था, जिस दिन देश को दो टुकड़ों में बांटने का निर्णय लिया गया था। निर्णय गैरों ने लिया था। उस पर कोई रंज नहीं था। पर मोहर तो अपने ही लोगों ने लगाई थी। इतनी जल्दी थी आजाद होने की, बापू के विचारों से आजाद होने की?

संसद अपने ही प्रांगण में लगी गांधी प्रतिमा को देखकर कुछ यूं ही सोच रही है। संसद को वैसे भी अब कुछ काम तो है नहीं। पक्ष-विपक्ष के सभी माननीय हंगामे में व्यस्त हैं तो संसद क्या करे? कुछ तो करे! तो इन दिनों वह वैचारिक चिंतन में लगी है। वैसे भी जब आदमी निठल्ला हो जाता है तो चिंतन में लग जाता है। संसद को तो निठल्ला बना दिया गया।  

तो संसद का चिंतन जारी है। सोच रही है कि सालों पहले जब बापू को यहां बिठाया गया था, तब भी क्या ये ऐसे ही थे? क्या ये प्रतिमा तब भी इतनी ही गुमसुम-सी उदास थी? कंधे ऐसे ही झुके हुए थे? चेहरे पर इतनी ही विरानगी थी? 

"याद क्यों नहीं आ रहा?' संसद खुद पर भिन्ना रही है। अब क्या करें, वह भी बूढ़ी हो चली है। फिर ऊपर से अल्जाइमर का रोग अलग हो चला। भूलने का रोग। कई पुरानी बातें याद ही नहीं रहतीं। 1947 से लेकर अब तक न जाने कितने वादे किए, उनमें से कितने पूरे हुए, कितने अधूर रहे, कुछ याद नहीं। 

हमेशा की तरह संसद आज फिर बेचैन है। जब भी संसद सत्र चलता है, तब वे ऐसे ही बेचैन हो जाया करती है। दुखी भी। तो दो दुखी आत्माएं। एक इस तरफ, दूसरी उस तरफ। एक ही नियति को प्राप्त। दुखी आत्माएं अगर आपस में बात कर लें तो मन हल्का हो जाता है, यही सोचकर संसद ने बापू को धीरे से पुकारा - "बापू, ओ बापू।' 

पर बापू कहां सुनने वाले। संसद से उठने वाले अंतहीन शोर-शराबे, हंगामे, गालियों, प्रतिगालियों को वे सुन न सकें, माइक फेंकने से लेकर कागज फाड़ने जैसी करतूतें नजर न आ सकें, इसलिए उन्होंने सालों पहले से ही अपने कान और आंखें बंद कर रखी हैं। बापू ने जो सबक अपने तीन बंदरों को सिखाया था, उनमें से दो का पालन वे खुद बड़े ही नियम से करते हैं- बुरा ना सुनो, बुरा ना देखो। कहना तो 1947 के बाद तभी से बंद कर दिया था, जब उनकी बातों का बुरा माना जाने लगा था। 

संसद को शायद मालूम है ये बात। तो उसने धीरे से बापू की प्रतिमा को झिंझोड़ा। 

बापू को भी मालूम है कि उन्हें स्पर्श करने का साहस कौन कर सकता है। संसद ही। काजल की कोठरी में रहकर कालिख से कोई नहीं बच सका है, लेकिन माननीयों के साथ रहने के बावजूद संसद स्वयं में पवित्र है। यह छोटी उपलब्धि नहीं है। तो बापू ने आंख बंद किए ही पूछा- "बताओ, आज कैसे याद किया?' सालों बाद वे बोले, मगर इतना धीमे कि जिसे केवल संसद ही सुन सके। 

"बापू बहुत दिनों से बेचैन थी। सोचा आपसे बात करके मन को कुछ हल्का करुं?' 

बापू मन में मुस्कुराए। बस, इसलिए कि बात ही कुछ ऐसी कर दी थी संसद ने। "एक बेचैन आत्मा से बात करके तुम्हें क्या चैन मिलेगा?' बापू ने फिर धीरे से पूछा। 

"आपने तो मुंह, आंख, कान बंद कर लिए। लेकिन मैं क्या करूं? अपने मुंह, आंख, कान बंद कर लूं, तब भी संसद में उठने वाले तूफानी हंगामे से कांप उठती हूं। क्या करुं मैं?'

"अगर इसका जवाब मेरे पास होता तो मैं खुद यहां यूं ना बैठा रहता, मूर्ति बनकर।' बापू ने क्षोभ से कहा। 

"पर बापू, इनमें से कई आपके पुराने अनुयायी हैं। कई नए भक्त भी बने हैं। आए दिन आपका नाम लेकर कसमें खाते हैं। मैं जानती हूं, सब झूठी कसमें हैं। फिर भी उन्हें एक बार तो अपनी कसम याद दिलवाइए। क्या पता, उसी से उनकी अंतरात्माएं जाग उठे।' संसद ने बड़ी ही मासूमियत के साथ यह बात कही। 

"इतनी भोली भी मत बनो। माननीयों को सबसे ज्यादा करीब से तो तुम्हीं ने देखा है। फिर भी ऐसी तर्कहीन बात। असत्य के साथ नित नए-नए प्रयोग करने वाले ये लोग मेरी बात सुनेंगे? इन्होंने तो अपने ही तीन बंदर क्रिएट कर लिए हैं - अच्छा मत सुनो, अच्छा मत देखो, अच्छा मत कहो।'

"बापू अब तो मुझे आत्मग्लानि होने लगी है। खुद पर ही शर्म आने लगी है।'

"ये तो सदा से रीत चली आ रही है?'

"कैसी रीत बापू? '  

"जब घर के बच्चे बेशर्मी पर उतर आते हैं तो शर्म से गढ़ने का काम उस घर की दीवारों के जिम्मे ही आ जाता है। यही जिम्मा तुम निभा रही हो। पर तुम खुद को दोष मत दो।' 

"पर आप भी खुद को ही दोष देते हों? मैं सालों से देख रही हूं कि 15 अगस्त आते ही आपका चेहरा और भी पार्थिव जैसा हो जाता है। ऐसा लगता है मानों पुराने दिन याद करके आपके मन में वितृष्णा-सी भर आई हो।

"अब मैं कुछ कहूंगा तो तुम कहोगी कि फिर वही घिसी-पिटी बात कह दी।'

"कह दो बापू। अब हमारे पास कहने के सिवाय बचा ही क्या है। कह दो, मन हल्का हो जाएगा।'  

"बस, यही कि अगस्त पास आते ही जी घबराने लगता है। आजादी की जो लड़ाई लड़ी थी, वह व्यर्थ लगने लगती है...' कहते कहते बापू का गला थोड़ा भर्राने लगा। कुछ देर मौन। फिर खुद को संभालते हुए बोले, "तुम कहां बैठ गई फालतू बातें लेकर, जाओ तुम यहां से।'  

वे कुछ और फालतू बात कर सकें, इससे पहले ही संसद को कुछ आहट सुनाई दी। संसद ने तुरंत बापू को अलर्ट किया -  "बापू सावधान! कुछ माननीय हाथों मंे तख्ती लिए, नारे लगाते हुए आपकी शरण में आ रहे हैं। लगता है कुछ घंटे आपके साथ ही बैठेंगे।' 

और बापू फिर पहले वाली मुद्रा में आ गए।

संसद के सामने तो फिलहाल कोई रास्ता नहीं है, अपनी किस्मत को कोसने के सिवाय... 

(ए. जयजीत खबरी व्यंग्यकार हैं। संवाद शैली में लिखे व्यंग्यों के लिए चर्चित हैं।)

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शनिवार, 24 जुलाई 2021

Funny Interview : राज कुंद्रा मामले से फुर्सत मिलते ही रिपोर्टर ने कर ली बादल के टुकड़े से खास बातचीत

#Floods #heavy_rains  #satire #humor शहरों में बाढ़


By Jayjeet

जैसे ही पानी से भरा बादल का टुकड़ा छत के ऊपर से गुजरा, रिपोर्टर ने हाथ के इशारे से उसे रोक लिया।
बादल : कौन हो भाई? क्यों रोक लिया हमें?
रिपोर्टर : मैं रिपोर्टर। आपका जरा एक रैपिड इंटरव्यू करना है।
बादल : अच्छा, एक गरीब बादल से इंटरव्यू!! तो आपको राज कुंद्रा के राज जानने से फुर्सत मिल गई?
रिपोर्टर : इस मामले को सीबीआई को सौंपा जा सकता है। तो हमारी जरूरत नहीं पड़ेगी।
बादल : वैसे मुझे सीबीआई पर भरोसा नहीं है। आप लोग सही तो जा रहे हैं।
रिपोर्टर : बादल महोदय, मैं आपको स्पष्ट कर दूं कि मेरा ऐसे मामलों में कोई खास इंटरेस्ट नहीं है। मैं तो डेवलपमेंटल रिपोर्टर हूं।
बादल : डेवलपमेंटल रिपोर्टर बोलने भर से कोई विकास टाइप की पत्रकारिता करने वाला पत्रकार नहीं बन जाता, जैसे बार-बार विकास विकास बोलने भर से विकास ना हो जाता। खैर मुद्दे पर आइए और पूछिए क्या पूछना है? पर जरा जल्दी, सीजन चल रहा है।
रिपोर्टर : पहला सवाल, या कह सकते हैं कि पहला आरोप तो यही है कि आप बरसने में इतनी असमानता क्यों रखते हैं? कहीं घटाघोप तो कहीं एक बूंद भी नहीं।
बादल : यह सवाल कभी आपने अपने नेताओं से पूछा, उन जिम्मेदारों से पूछा जिनके ऊपर समान विकास की जिम्मेदारी रही है?
रिपोर्टर : समझा नहीं।
बादल : अब इतने भी नासमझिये ना बनो। भई, सालों से आपके नेता समाजवाद की बात करते आए हैं, लेकिन हुआ क्या? समानता आई?
रिपोर्टर : अरे आप ये कहां इस मस्त मौसम में फालतू के सवाल लेकर बैठ गए।
बादल : शुरुआत किसने की थी?
रिपोर्टर : हां गलती मानी, पर मेरा तो केवल इतना-सा सवाल था कि ऐसा भी क्या बरसना कि शहरों में बाढ़ आ जाए…
बादल : पत्रकार महोदय, बरसते तो हम सदियों से आए हैं, लेकिन पहले नदियों में बाढ़ आती थी। अब नदियां तो वैसी रही नहीं तो शहरों में आ रही है। बाढ़ कहीं तो आएगी ना!
रिपोर्टर : पर आप यह भी तो मानिए ना कि आपके बरसने का तरीका ही गलत है। सिस्टम नाम की कोई चीज नहीं रही है आपके यहां। आधे घंटे में पांच-पांच इंच बारिश। ये क्या बात हुई भला?
बादल : देखिए, हमारे सिस्टम को दोष मत दीजिए। यह सब आप लोगों की वजह से हो रहा है। ग्लोबल वार्मिंग इतनी बढ़ा दी तो हमारा सिस्टम क्या करेगा?
रिपोर्टर : फिर वही घिसी-पिटी बात। बार-बार हम केवल ग्लोबल वार्मिंग को दोष नहीं दे सकते। अब हमें आगे की ओर देखना चाहिए।
बादल : तो फिर तो मुझे इसी तरह से बरसना होगा। और कोई चारा नहीं है। बस, समझ लो ये बात...
रिपोर्टर : फिर भी आप भी तनिक समझने की कोशिश कीजिए। आपकी थोड़ी सी बारिश में सरकारों की बड़ी बेइज्जती हो जाती है। हम रिपोर्टर्स को भी मजबूरी में लिखना पड़ता है कि मुंबई हुई पानी पानी, वगैरह वगैरह... तो कुछ तो ऐसा उपाय बताइए कि हमें बार-बार इस बात पर शर्मिंदा न होना पड़े कि शहर फिर बाढ़ में डूबे। आप तो इतना घूमते हैं। आपको कोई तो उपाय मालूम होगा।
बादल : तो सिंपल सा उपाय सुन लीजिए और मुझे चलने की अनुमति दीजिए। उपाय यह है कि संसद का मानसून सत्र चल ही रहा है। अगर सरकार एक कानून बनाकर मानसून में हर शहर को नदी घोषित कर दें तो न रहेंगे शहर, न आएगी शहरों में बाढ़। और फिर सरकार की इज्जत भी बच जाएगी और आपको भी लिखना ना पड़ेगा - फलाना शहर हुआ पानी पानी...
रिपोर्टर : उपाय तो बड़ा प्रोग्रेसिव है, हमारे नेताओं को भी रास आएगा, परंतु...
बादल : अब सवाल-जवाब बहुत हुए। मुझे चलने की अनुमति दीजिए। किसान मेरा इंतजार कर रहा है…आप शहरियों को हम न बरसे तो दिक्कत और बरसे तो दिक्कत …

(ए. जयजीत खबरी व्यंग्यकार हैं। अपने इंटरव्यू स्टाइल में लिखे व्यंग्यों के लिए चर्चित हैं।)


#Floods #heavy_rains  #satire #humor


बुधवार, 21 जुलाई 2021

Satire : दो जासूस, करे महसूस कि जमाना बड़ा खराब है...

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By Jayjeet

दो जासूस, दोनों के दोनों प्रगतिशील किस्म के। देश-दुनिया की समस्याओं पर घंटों चर्चा करके चर्चा के कन्क्लूजन को अपनी तशरीफ वाली जगह पर छोड़कर जाने वाले। दोनों एक कॉफ़ी हाउस में मिले। वैसे तो दोनों अक्सर इसी कॉफ़ी हाउस में मिलते रहते हैं, लेकिन आज का मिलना ज्यादा क्रांतिकारी है। अब ये जासूस कौन हैं, क्या हैं, इसका खुलासा ना ही करें तो बेहतर है। देखो ना, पेगासस नाम के किसी जासूस का खुलासा होने से कितनी दिक्कतें आ गईं। विपक्ष को हंगामा करने को मजबूर होना पड़ा। कांग्रेस कहां पंजाब में अपने दो सरदारों के बीच सीजफायर करवाने के बाद थोड़ा आराम फरमा रही थी कि उसे फिर जागना पड़ा। और बेचारी सरकार। कब तक छोटे-छोटे हंगामों को राष्ट्र को बदनाम करने की साजिशें घोषित करती रहेगी। उसकी भी तो कोई डिग्नेटी है कि नहीं। कई बड़े-बड़े पत्रकार, नेता, बिल्डर, वकील, तमाम तरह के माफिया इस बात से अलग चिंतित हैं कि उनका नाम सूची में क्यों नहीं है! तो एक खुलासे से कितनी उथल-पुथल मच गई। इसलिए हम भी इन दोनों जासूसों के नाम नहीं बता रहे। हां, एक को करमचंद जासूस टाइप का मान लीजिए और दूसरे को जग्गा जासूस टाइप का। वैसे भी जासूस तो विशेषण है, संज्ञा का क्या काम। काले रंग का कोट, बड़ी-सी हेट, काला चश्मा, हाथ में मैग्नीफाइंग ग्लास वगैरह-वगैरह कि आदमी दूर से ही पहचान जाए कि देखो जासूस आ रहा है। दूर हट जाओ। पता नहीं, कब जासूसी कर ले।

तो जैसा कि बताया, ये दो जासूस एक कॉफ़ी हाउस में मिले। इसी कॉफ़ी हाउस में दोनों का उधार खाता पता नहीं कब से चला आ रहा है। कई मैनेजर बदल गए, पर खाता अजर-अमर है। कॉफ़ी हाउस में मुंह लगने वाले हर कप को मालूम है कि इन दिनों ये भयंकर फोकटे हैं। इन दिनों क्या, कई दिनों से ही ये फोकटे हैं। कई बार कोट से बदबू भी आती है। जब किसी के पास ज्यादा पैसे ना हों तो ड्रायक्लीन पर खर्च अय्याशी ही माना जाना चाहिए। तो ये जासूस अक्सर इस तरह की अय्याशी से बचते हैं। वैसे इन दोनों जासूसों ने अपने बारे में यह किंवदंती फैला रखी है कि जब ये वाकई जासूसी करते थे, तो उनके पास जूली या किटी टाइप की सुंदर-सी सेक्रेटरी भी हुआ करती थीं, एक नहीं, कई कई। देखी तो किसी ने नहीं, पर अब जासूसों से मुंह कौन लगे। कपों की तो मजबूरी है। बाकी बचते हैं।

खैर, मुद्दे पर आते हैं। तो आइए, इन दो प्रगतिशील जासूसों की जासूसी भरी बातें भी सुन लेते हैं। आज तो चर्चा का एक ही विषय है - पेगासस।

"और बताओ, क्या जमाना आ गया?' पहले ने शुरुआत वैसे ही की, जैसी कि अक्सर की जाती है।

"सही कह रहे हो। पर ये पेगासस है कौन?' दूसरा तुरंत ही मूल मुद्दे पर आ गया, क्योंकि आज तो फालतू बातों के लिए इन दोनों के पास बिल्कुल भी वक्त नहीं है।

"कोई जासूस है स्साला। फ्री में हर ऐरे-गैरे की जासूसी करता फिरता रहता है।' पहले ने थोड़ा ज्ञानी होने के दंभ के साथ कहा।

"बताओ, ऐसे ही जासूसों के कारण हमारी कोई इज्जत नहीं रही।' दूसरे ने यह बात इतनी संजीदगी से कही मानों उनकी कभी इज्जत रही होगी।  

"और एक-दो की नहीं, पूरी दुनिया की जासूसी करने का ठेका उठा लिया है इस पेगासस ने।' पहले ने जताया कि मामला वाकई गंभीर है।

"हां, रोज ही लिस्ट पे लिस्ट आ रही है, मानों चुनाव में खड़े होने वाले उम्मीदवारों की सूचियां निकल रही हों।' दूसरे ने गंभीरता की हवा निकाल दी।

दोनों जोर से हंसते हैं। फिर अचानक अपने-अपने होठों पर उंगली रखकर शांत रहने का इशारा करते हैं। लोगों को लगना नहीं चाहिए कि दो जासूस मूर्खतापूर्ण टाइप की बातें कर रहे हैं, जो हंसी की वजह बन रही है। भले ही बातें करें, पर लगे नहीं। इसलिए दोनों फिर धीमी आवाज में चर्चा शुरू देते हैं...

"यह भी क्या जासूसी हुई? अब आप नेताओं की जासूसी करवा रहे हों? नेताओं की जासूसी करता है क्या कोई?' पहला फिर गंभीर हो गया।

"हां, मतलब नेताओं के नीचे से आप क्या निकाल लोगे? कोई बड़ा राज निकाल लोगे? और जासूसी करके बताओंगे क्या? इतने करोड़ रुपए स्विस बैंक में, इतने करोड़ घर में, इतने करोड़ की बेनामी संपत्ति, इतने लोगों को ठिकाने लगाने के लिए ये पलानिंग, वो पलानिंग। जो चीज सबको मालूम है, वो आप बताओगे। ये क्या जासूसी हुई भला।' दूसरे ने पहले की गंभीरता में गंभीरता के साथ पूरा साथ दिया।

"बताओ, क्या जमाना आ गया।' पहला फिर जमाने को दोष देने लगा।

"पर ये जासूसी करवा कौन रहा है?' दूसरा अब पॉलिटिकल एंगल ढूंढने की जासूसी में लग गया है।

"कोई भी करवाए, हमें क्या मतलब?' पहले के भीतर का प्रगतिशील जासूस अब आम मध्यमवर्गीय औकात में बदलने की तैयारी करने लगा है। कप की कॉफ़ी खत्म जो होने लगी है।

दूसरा भी तुरंत सहमत हो गया। उसकी भी कॉफ़ी खत्म हो रही है। वह इस बात पर सहमत है कि हमें ऐसे फालतू के मामलों में ज्यादा चिंता करने की जरूरत नहीं। चिंता या तो सरकार करे जिसे हर उस मामले में देश की चिंता रहती ही है जिस मामले में उस पर सवाल उठाए जाते हैं। या फिर विपक्ष करे, जो अब इस भयंकर चिंता में मरा जा रहा है कि मामले को जिंदा रखने के लिए कुछ दिन और एक्टिव रहना होगा। संसद सत्र अलग शुरू हो गया है। रोज हंगामा खड़ा करना होगा। कैसे होगा यह सब!

खैर, दोनों की कॉफ़ी खत्म हो गई है। तो चर्चा भी खत्म। तशरीफ को झाड़कर दोनों उठ खड़े हुए। कॉफ़ी हाउस अब राहत की सांस ले रहा है।

(ए. जयजीत खबरी व्यंग्यकार हैं। अपने इंटरव्यू स्टाइल में लिखे व्यंग्यों के लिए चर्चित हैं।)

रविवार, 18 जुलाई 2021

Humor : पंजाब में अमरिंदर और सिद्धू की लड़ाई से क्यों खुश हुई कांग्रेस?

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By Jayjeet

 

10 जनपथ पर स्थित बड़े से बंगले के बड़े से गेट के बाहर फुटपाथ पर आज अचानक कांग्रेस अम्मा से मुलाकात हो गई। किनारे बैठी हुई। लेकिन घोर आश्चर्य, पोपले मुंह पर बड़ी ही स्मित मुस्कान! रिपोर्टर को रुकना ही था। अम्मा से यह दूसरी मुलाकात थी।

रिपोर्टर : पहचाना अम्मा?

कांग्रेस अम्मा : अरे हां, रिपोर्टर ना?

रिपोर्टर : बड़ी तेज याददाश्त है आपकी। मान गए आपको!

कांग्रेस अम्मा : बूढ़ी हो गई तो क्या हुआ, अब भी कुछ सांसें चल रही हैं (पोपले मुंह से जोरदार ठहाका)।

रिपोर्टर : आज बड़ी खुश नजर आ रही हों?

कांग्रेस अम्मा : बात ही ऐसी है। पंजाब से बड़ी अच्छी खबर आ रही है।

रिपोर्टर (चौंकते हुए) : अच्छी खबर? वहां तो आपके ही दो बेटे आपस में लड़ रहे हैं।

कांग्रेस अम्मा : यही तो अच्छी खबर है।

रिपोर्टर (लगता है बुढ़िया सठिया टाइप गई है) : कांग्रेस के दो नेता आपस में लड़ रहे हैं। इसमें क्या अच्छाई है?

कांग्रेस अम्मा : एक राज्य में कांग्रेस के पास दो-दो नेता हैं और दोनों की दोनों एक-दूसरे पर भारी। बेटा इससे अच्छी खबर और क्या होगी?

रिपोर्टर : पर वे तो आपस में लड़ रहे हैं अम्मा? (रिपोर्टर ने यह बात तीसरी बार रिपीट की)

कांग्रेस अम्मा : लड़ तो रहे हैं? यह कम है क्या? कांग्रेसियों को लड़ते हुए देखे तो जमाना हो गया। पर तुम मीडियावालों को कांग्रेस की खुशी देखी नहीं जाती। (बुढ़ापे की वजह से अम्मा शायद भूल गई कि थोड़े बहुत तो उसके राजस्थान के बेटे भी लड़े थे।)

रिपोर्टर : ऐसी बात नहीं है अम्मा। बंगाल में जब बीजेपी की हार पर आपने मोतीचूर के लड्डू बंटवाए थे, तो हम सबने बराबर खाए थे। हमारे ही कई लोगों ने तो खुद बंटवाए थे। पर अम्मा पंजाब में कांग्रेसियों के इस तरह लड़ने से क्या संदेश जाएगा? अच्छी बात है ये क्या?

कांग्रेस अम्मा : बेटा वही तो नहीं समझ रहे हो तुम। खुद को बड़ा रिपोर्टर कहते हो। भैया, इससे तो कांग्रेसियों में जान फूंक जाएगी। उन्हें इस बात का एहसास होगा कि वे भी लड़ सकते हैं। केवल घर बैठकर चर्बी चढ़ाना ही एकमात्र ऑप्शन नहीं है।

रिपोर्टर : लेकिन लड़ना तो सरकार के खिलाफ चाहिए ना?

कांग्रेस अम्मा (थोड़ी नाराजगी के साथ) : नवजोत क्या कर रहा है? सरकार के खिलाफ ही तो लड़ रहा है ना?

रिपोर्टर : पर वहां तो आपकी ही सरकार है? वहां वे क्यों लड़ रहे हैं?

कांग्रेस अम्मा : बेटा सरकार आज है, कल न रहे, पर अगर लड़ना सीख लिया तो यह दूसरी सरकारों के खिलाफ भी काम आएगा कि नहीं? बता, तू तो रिपोर्टर है ना!

रिपोर्टर ने बुढ़िया से ज्यादा मगजमारी करना मुनासिब नहीं समझा। आखिरी सवाल पर आ गया।

- अम्मा, चलिए आप खुश तो हम खुश। पर आप तो ये बताओ, उप्र में चुनाव आ रहे हैं। बाकी पार्टियों ने तैयारियां भी शुरू कर दी हैं। आपकी क्या तैयारी है?

कांग्रेस अम्मा : उप्र? ये क्या है? (कुछ याद आने के बाद) अच्छा, योगी के उत्तर प्रदेश की बात कर रहा है? तैयारी कर रहे हैं हम, बिल्कुल कर रहे हैं।

रिपोर्टर : वही तो पूछ रहे हैं। क्या तैयारी कर रहे हैं?

कांग्रेस अम्मा (10 जनपथ निवास की ओर इशारा करते हुए) : वो अंदर जाकर पूछो ना, वे ही बताएंगे?

रिपोर्टर : अरे अम्मा, हमारी वहां तक कहां पहुंच है। आप तो पहुंच सकती हैं। आप ही बताइए ना।

कांग्रेस अम्मा : बेटा, पहुंच तो मेरी भी कहां है! इसीलिए तो फुटपाथ पर बैठकर पंजाब को लेकर खुशी मना रही हूं। चल अब यहां से जा, अंदर कोई समझौता हो जाए और सब पहले ही तरह घर बैठ जाएं, उससे पहले इस बुढ़िया को खुशी मना लेने दें। ऐसे मौके बार-बार नहीं आते।

(ए. जयजीत खबरी व्यंग्यकार हैं। अपने इंटरव्यू स्टाइल में लिखे व्यंग्यों के लिए चर्चित हैं।)
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बुधवार, 7 जुलाई 2021

Satire & Humor : जब राजा के दर्पण ने की दिल की बात, मतलब बड़ी वाली बदतमीजी!!

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By Jayjeet

सुबह नित्य कर्म, योगासन और ध्यान-स्नान से फ्री होते ही वे अपने बालों को संवारने के लिए हमेशा की तरह दर्पण के सामने थे। लेकिन बाल संवारते-संवारते आज उन्हें दर्पण में कुछ हलचल महसूस हुई। शायद दर्पण कुछ कहना चाहता है। हालांकि दर्पण कहना तो काफी दिनों से चाहता था, लेकिन महसूस उन्होंने आज किया। पर उनके सामने कुछ कहने की क्या कोई मजाल कर सकता है? इसलिए उनके ईगो को हलकी-सी ठेस लगी। वे एक कदम पीछे हो गए और फिर दर्पण से मुंह फेर लिया। लेकिन तभी उन्हें आवाज सुनाई दी - राजन ओ राजन...। यह दर्पण से ही आ रही थी।
आवाजों को इग्नोर करना उन्होंने सीख लिया था। राजा चाहे कोई भी हो, किसी भी काल-युग का हो, धीरे-धीरे इग्नोरेंस उसका स्थाई भाव बन जाता है। वे चाहते तो इस आवाज को भी इग्नोर करके अपनी राह पर आगे बढ़ सकते थे। यह उनकी प्रतिष्ठा में चार चांद ही लगाता। लेकिन फिर अभिमानी मन ही आड़े आ गया। तो दर्पण से दूर होते कदम ठिठक गए और चेहरा फिर से दर्पण की ओर घूम गया, मानो चुनौती देते हुए कह रहे हैं कि ए तुच्छ दर्पण, बता, क्या है तेरी रज़ा!
दर्पण धीरे से कुछ बुदबुदाया.... लेकिन आवाज साफ नहीं आ पाई। कॉन्फिडेंस का अभाव था।
'क्या तू कुछ कहना चाहता है दर्पण?'
'जी जी, मैं कुछ बातें करना चाहता हूं...।' दर्पण के मुंह से हकलाते हुए कुछ शब्द फूटे।
'अच्छा, अपने मन की बात करना चाहता है?' राजा अपनी चिर-परिचित शैली में मुस्कुराए।
'मन की बात तो राजन आप बहुत कर चुके, मैं तो दिल की बात करना चाहता हूं...'
'अच्छा! तू मेरा दर्पण होकर दिल की बात करना चाहता है? तुझे पता नहीं, राजाओं के महलों में लगे दर्पण कभी अपने दिल की नहीं करते?'
'हां, राजन। अच्छे से पता है। राजाओं के महलों के दर्पण भी बस राजाओं के प्रतिबिम्ब होते हैं। वे तो केवल राजाओं के मन की बात ही करेंगे। फिर भी आज दिल की कुछ कहना चाहता हूं, मगर ...'
'मगर क्या? '
'बता तो दूं, मगर डरता भी हूं।'
'अरे, तू मेरा दर्पण है, तुझमें मेरा ही प्रतिबिम्ब है। तुझे इस बात का इल्म नहीं कि हमने कभी डरना सीखा नहीं, फिर तू कैसे डर सकता है?' राजाओं का अभिमान पल-पल में जागता रहता है।
'डरता इसलिए हूं क्योंकि दिल, वह भी दर्पण का, कभी झूठ नहीं बोलता। और सच सुनाने की हिम्मत नहीं हो रही।'
'अच्छा, लेकिन ऐसा कौन-सा सच है जो हमसे छुपा हुआ है? मेरे दरबारी मुझे हमेशा सच से बाख़बर रखते हैं।'
'लेकिन दरबारी वही सच सुनाते हैं जो राजा सुनना चाहता है।'
'लेकिन तुम सच ही बोलोगे, इसका क्या भरोसा?'
'क्योंकि कहा ना, दर्पण झूठ नहीं बोलते।'
'इतना अभिमान?'
'सब आपसे ही सीखा, आपके ही महल में रहते-रहते।' शायद ज्यादा बोल गया दर्पण। इस बात का तुरंत एहसास होते ही उसने मिमियाती आवाज में एक ठहाका लगाया। ठहाका लगाने से वातावरण का तनाव दूर हो जाता है। इतने सालों में दर्पण ने यह भी सीखा और देखा है।
'हमसे और क्या-क्या सीखा?' राजा ने भी चुटकी ली।
'खुद को पॉलिश करके रखना। देखो, कितना चकाचक हूं, आपके ही वस्त्रों की तरह।' दर्पण अब थोड़ी सीमा उलांघने की गुस्ताखी करने लगा है।
'मतलब सूटेड-बूटेड होना गलत नहीं है ना!' राजा को अब उसकी बातों में मजा आने लगा है। बातचीत इनफॉर्मल होने लगी है।
'बिल्कुल नहीं। यह तो विकास का एक बड़ा पैमाना है।' राजा का दर्पण है तो बात कुछ-कुछ राजा के मनमाफिक करना भी जरूरी है।
'वाह दर्पण, तू ही है जो मेरे मन की बात अच्छे से समझता है। तू तो विकास का शोकेस बन सकता है, विकास का प्रतिबिम्ब।'
'अभी तो केवल आप मेरे सामने हैं। तो मैं फिलहाल आपका ही प्रतिबिम्ब हूं।' अब दर्पण ने चुटकी ली। अब दर्पण थोड़ा-थोड़ा खुलने लगा है।
'बहुत डिप्लोमैटिक भी हो गया है रे तू।'
'यह भी आपसे ही सीखा है राजन।'
"तूने अच्छा किया जो मुझसे बात कर ली। मैं तो भूल ही गया था कि तेरा भी हम राज्य के हित में बेहतर इस्तेमाल कर सकते हैं।' वही राजा कुशल होता है जो हर मौके पर अपने काम की बात निकाल ले।
'वह कैसे भला?' दर्पण चाैंका। राजा की मंशा पर मन की मन शक करने की गुस्ताखी की।
'इन दिनों प्रजा के बीच विश्वास का बड़ा संकट है। राज्य के विकास संबंधित तमाम आंकड़े हम तेरे जरिए ही दिखाएंगे तो लोग सच मान लेंगे। क्योंकि भोली प्रजा भी तो यही मानती है कि दर्पण कभी झूठ नहीं बोलता।'
'मगर गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई जैसे आंकड़ों का सच मैं कैसे छिपाऊंगा? मैं धोखा तो नहीं दे सकता।' दर्पण ने अचानक अपनी औकात की सीमा के बाहर कदम रख दिया है।
लेकिन दर्पण की इस बात से राजा को गुस्सा नहीं आया, बल्कि उसकी मासूमियत पर मुस्कुरा भर दिए। राजा चाहते तो हंस भी सकते थे। बात ही इतनी हास्यास्पद थी। फिर भी मुस्कुराए भर।
'राजन, हर आंकड़े का सच प्रजा को मालूम होना ही चाहिए।' दर्पण अब नैतिकता पर उतरने का दुस्साहस करने लगा है।
'तू बहुत छोटा है दर्पण। हर आंकड़ा तुझ में नहीं समा सकता। तो हम वही आंकड़े दिखाएंगे, जो राज्य के विकास का प्रतिबिम्ब दर्शाए।' राजा ने बागी होते जा रहे दर्पण को बहलाने की कोशिश की।
'लेकिन मैं सहमत नहीं हूं।' दर्पण की बदतमीजी बढ़ती गई।
'तू एक राजा के महल का दर्पण है। यह बात कैसे भूल गया?' राजा का धैर्य जवाब दे गया। इसलिए मुट्‌ठी भींचकर राजा चीख पड़े।
दर्पण भी एक पल के लिए कांप उठा, फिर संभलकर बोला, 'गुस्ताखी माफ राजन, दर्पण तो दर्पण होता है, फिर वह गरीब की झोपड़ी में लगा हो या किसी राजा के महल में?'
दर्पण की जबान कड़वी होती जा रही थी। शायद दर्पण थोड़ा-थोड़ा स्वाभिमानी हो रहा था। फिर बात आगे बढ़ी... बढ़ती गई... बढ़ती ही चली गई... फिर इतनी बढ़ी कि दर्पण ने औकात की तमाम सीमाएं पार कर ली।
मगर राजा तो राजा है। गुस्ताख दर्पण के साथ वही होना था जिसके वह लायक था। वह अब जमीन पर था। टुकड़े-टुकड़े। उस गुस्ताख दर्पण को सजा मिल चुकी थी। राजा की सहृदयता पर गुस्ताखी करने का नतीजा क्या होता है, दर्पण के उन टुकड़ों से यही कहने के लिए राजा नीचे की ओर झांके, थोड़ा झुके भी। लेकिन अब वहां एक दर्पण नहीं था। टुकड़े-टुकड़े कई दर्पण थे और सभी गुस्ताखी कर रहे थे। अपने दिल की बात सुना रहे थे। बात एक दर्पण ने शुरू की थी। अब कई दर्पण तक पहुंच गई थी। राजा ने घबराकर अपने हाथों से कान ढंक लिए। आंखें बंद कर ली। मुंह फेर लिया।

(ए. जयजीत खबरी व्यंग्यकार हैं। अपने इंटरव्यू स्टाइल में लिखे व्यंग्यों के लिए चर्चित हैं।)