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शुक्रवार, 29 अक्तूबर 2021

Satire : ख़बरदार, डरना सख़्त मना है!



ए. जयजीत

अगर देश के गृह मंत्री बोल रहे हैं कि अब किसी को डरने की जरूरत नहीं है तो फिर वाकई डरने की जरूरत नहीं ही होगी, सिद्धांत: ऐसा माना जा सकता है। पर ऐसे भी कैसे मान लें? इसकी ग्राउंड लेवल पर पुष्टि भी तो जरूरी है। तो यही पुष्ट करने के लिए रिपोर्टर सीधे पहुंच गया एक आम आदमी के पास। इतिहास गवाह है कि सबसे ज्यादा डर तो आम आदमी को ही लगता है। इसलिए डर के लेवल के बारे में असली पुष्टि आम आदमी से ही हो सकती थी। 

'आप रिपोर्टर ही हो, इस बात की क्या गारंटी?' इधर-उधर देखकर आम आदमी ने पूछा। वह इंटरव्यू से बचने का कोई न कोई रास्ता तलाश रहा है। बेमतलब का लफड़ा नहीं चाहता।

'अजी इतना भी मत डरिए। मैं कोई पेगासस का जासूस नहीं हूं। बस, दो-चार सवाल पूछने हैं। अनुमति हो तो पूछ लूं।'

'अब अनुमति देने वाले हम कौन! हमसे कौन अनुमति लेता है! पूछ लीजिए। पर नाम मत छापना।' अंतत: नाम न छापने की शर्त पर आम आदमी डरते-डरते चर्चा के लिए राजी हुआ। 

'हमारे केंद्रीय गृह मंत्रीजी ने कहा है कि अब लोगों को डरने की जरूरत नहीं है। कश्मीर में उन्होंने अपना बुलेटप्रूफ ग्लास तक निकाल फेंका था। तो जब देश के गृह मंत्री ऐसा कह रहे हैं तो कुछ तो डर कम हुआ होगा?' रिपोर्टर तुरंत अपने मूल सवाल पर आया।

'भाई साहब, कहां मुझ जैसे दो टके के आम आदमी के डर से गृह मंत्रीजी की निडरता की तुलना कर रहे हो! हम आम लोग तो पैदाइशी ही डरे हुए होते हैं।'

'वो तो देख ही रहा हूं। आप कुछ कांप से रहे हैं। कहीं से कुछ ताजे डरे हुए लगते हो।'

'क्या बताएं। कल रात को मोहल्ले में कुछ वर्दीवाले आए थे। किसी चोरी की गाड़ी के बारे में आम लोगों से तफ्तीश कर रहे थे, इतनी भयंकर वाली कि क्या बताएं। बस, उसी डर के थोड़े-बहुत अवशेष अब भी बाकी हैं। इसीलिए पैर कांप रहे हैं।'

'पर आप तो कानून की इज्जत करने वाले आम आदमी हो। आपको क्या डर?'

'भाई साहब, कानून की इज्जत करने वाले को ही वर्दी से डरना पड़ता है। जो कानून को अंगूठे पर लेकर घूमते हैं, बस वे ही नहीं डरते।'

'हां, वर्दी से तो हर आम आदमी का डरना लाजिमी है, नहीं तो वर्दी के पास काम ही क्या रह जाएगा। खैर, बाकी मामलों में तो आप निडर होंगे ही।'

'अरे कहां, उस दिन बिजली का बिल भरने में दो दिन लेट हो गया तो विभाग से दो कर्मचारी आ गए। डराने लगे कि चाय-पानी की व्यवस्था नहीं की तो चार-दिन अंधेरे में रहना होगा। तो डरकर चाय-पानी की व्यवस्था करनी पड़ी। अब क्या करें, डरना पड़ता है।'

'खैर, रिश्वत देने पर आपका बस नहीं। पर इस बात से तो खुश होते होंगे कि इस मामले में आप खुद तो बिंदास हो, अच्छे-भले ईमानदार हो। यह भी कम साहस का काम नहीं है।' 

'ऐसा भी नहीं है। ऊपर वाले अफसरों के डर से थोड़ी बहुत रिश्वत लेनी पड़ती है। शुरू में मैंने मना किया तो बड़े साहब ने चमका दिया, तू स्साले, रिश्वत ना लेकर पूरे सिस्टम की वाट लगाना चाहता है? नौकरी करनी है कि नहीं? उसके बाद से डरकर रिश्वत लेने लगा।'

'अच्छा, पूजा करते हो या फिर...'। रिपोर्टर को अपनी चर्चा को सिस्टम पर से हटाकर धर्म पर लाना ज्यादा सुविधाजनक लगा। यह सवाल इसलिए भी परम आवश्यक था ताकि सामने वाले की धर्म-जाित का पता लग सके तो कुछ सवाल भी उसी के इर्द-गिर्द पूछे जा सकें।

'साहब, जरूरत पड़ने पर पूजा-पाठ ही करता हूं। कभी-कभी मंदिर भी चले जाता हूं।'

'चलो, कम से कम धर्म के मामले में आपको इस देश में कोई डर नहीं है। यह भी कम बात नहीं है।'

'अरे क्या खाक डर नहीं है!' आम आदमी कितना पक्का भीरू है, लगातार यही साबित करने पर उतारू है।

'क्यों?'

'चार दिन पहले की बात है। आप जानते ही हो कि मैं नियम-कायदों से डरने वाला आदमी हूं। सामने वाली सड़क के बीचों-बीच कुछ गायें खड़ी थीं। ट्रैफिक को रोक रही थीं। वैसे उसमें उन बेचारी गायों का कोई दोष नहीं था। तो मैंने सोचा कि चलो उनसे हटने की रिक्वेस्ट कर लेता हूं। मैं तो उन्हें बड़े ही प्यार से वहां से हटने का अनुरोध कर रहा था। लेकिन पता नहीं कहां से चार-छह गुंडे आ गए। वैसे प्योर गुंडे नहीं थे, मतलब गुंडे टाइप के थे। बस हाथों में लिए डंडों से गुंडे लग रहे थे। उन्हें लगा मैं गाय माताओं के साथ दुर्व्यहार कर रहा हूं। दो-चार लगा दिए।'

'पर आप तो पूजा-पाठी हों। आपको क्यों डरना चाहिए? बोल देते।'

'वो क्या था, उस दिन मेरी हल्की सी दाढ़ी थी। तो उन्हें गलतफहमी हो गई। कहने लगे, स्साले पहचान दिखा। अब मैं तो जनेऊ भी नहीं पहनता। एक कहने लगा, नंगा कर देते हैं स्साले को। अभी दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा। पर तभी पड़ोस से गुजरने वाले किसी परिचित ने आवाज लगा दी- शर्मा जी क्या हो रहा है? बस, उसी से बच पाया।' 

'तो आप उस दिन लिंचिंग से बच गए। उसके बाद से ही अब दाढ़ी साफ कर ली। लगता है, जनेऊ भी पहन ली है। चलिए, ये डर भी अच्छा है। इससे अब कुछ डर कम हो सकेगा।'

'उम्मीद तो नहीं है।' एक डरा हुआ आम आदमी डरने की हर संभावना की तलाश मरने तक जारी रखता है।

'अच्छा, चार दिन पहले भोपाल में एक वेब सीरिज को लेकर भी हंगामा हुआ था। आपका तो छोटा मामला था, पर वह बड़ा मामला था तो खबर बन गई। खबर तो पढ़ी ही होगी ना?'

'बिल्कुल नहीं, मैं उस खबर में झांका तक नहीं। क्या पता अखबार से निकलकर ही दो-चार गुंडे, आई मीन गुंडे टाइप के लोग बाहर आ जाए और मैं जब तक अपनी पहचान बताऊं, दो-चार डंडे चला ही दे।' एक डरे हुए आम आदमी की सफलता इसी में है कि वह खबरों से भी डरने लगे।

'पर भाई, वे तो धर्म के रक्षक हैं। हमारे-तुम्हारे धर्म की रक्षा करने के लिए ही तो उन्हें डंडे उठाते पड़ते हैं। उनसे डरिए नहीं, उनका सम्मान करना सीखिए। अब देखिए, आगे से मप्र में जिस भी वेब सीरिज या फिल्म की शूटिंग होगी, फिल्म मैकर अपनी स्क्रिप्ट पहले सरकार को भेजेंगे और सरकार जो भी करेक्शन करने का आदेश देगी, उसका वे पूरा सम्मान करेंगे। आप भी सम्मान करना सीखिए शर्माजी। बेमतलब डर का नाम देकर देश को बदनाम ना कीजिए।' रिपोर्टर अक्सर इंटरव्यू लेते-लेते ज्ञान भी देने लग जाते हैं।

'जी सर, कोशिश करूंगा। पर अभी तो टाइम हो गया। अब प्लीज खतम करते हैं। लेट हो गया तो पत्नी की दो-चार बातें सुननी पड़ेंगी।'

'मतलब घर भी डरमुक्त नहीं! कितना डरेंगे आप?'

'बताया ना, आम आदमी पैदा ही डरने के लिए होता है।'

'बस एक आखिरी सवाल। कभी तो आप दूसरों को डराते होंगे? सालों में कभी-कभार?'

देर तक सोचने के बाद, 'हां, जब नेता वोट मांगने आते हैं। हालांकि जाति-धर्म के अनुसार वोट करने का एक प्रेशर हम पर रहता है। फिर भी तब लगता है कि कम से कम एक ताकत हमारे पास है। हां, हां याद आ गया।'

'इस ताकत को उस समय के लिए बचाकर रखिए। जब तक उनमें इस ताकत का डर रहेगा, तब तक डर का बैलेंस बना रहेगा।'

रिपोर्टर ने इस अंतिम ज्ञान के साथ अपना इंटरव्यू खत्म किया। लेकिन यह बेमतलब का ज्ञान शायद डरे हुए आम आदमी को रास नहीं आया। इसलिए वह कुछ देर तक विचलित भाव के साथ खड़ा रहा। फिर पत्नी याद आ गई तो सरपट दौड़ पड़ा घर की ओर।

(ए. जयजीत संवाद की अपनी विशिष्ट शैली में लिखे गए तात्कालिक ख़बरी व्यंग्यों के लिए चर्चित हैं। मूलत: पत्रकार जयजीत फिलहाल भोपाल स्थित एक प्रतिष्ठित मीडिया हाउस में कार्यरत हैं। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया तीनों का उन्हें लंबा अनुभव रहा है।)


शुक्रवार, 15 अक्तूबर 2021

Humour : रात के अंधेरे में दो रावणों की मुलाकात!

 

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ए. जयजीत

जैसे-जैसे विजयादशमी नज़दीक आती है, बड़े रावण की छोटे वाले से कोफ़्त बढ़ती जाती है। विजयादशमी के दिन तो वह फूटी आंख नहीं सुहाता। सोचता, यह जितनी जल्दी यहां से टले, उतना अच्छा। लाज़िमी भी है। मंच पर भाषण वो दे, समिति वालों को चंदा वो दे और सारा अटेंशन लूट ले जाए मैदान में खड़ा छटाक भर का रावण। कद बड़ा हुआ तो क्या हुआ, रावणत्व में तो छोटा ही है।

छोटे रावण ने कभी अपहरण कांड करके अपनी मतिहीनता का परिचय दिया था। अब विजयादशमी की एक रात पहले ही छोटे वाले को निपटाने की प्लानिंग कर बड़ा रावण अपनी मतिहीनता का परिचय दे रहा है।

बड़े रावण ने इस काम को सहयोगियों को सौंपने का जोख़िम नहीं लिया। आजकल सहयोगियों का क्या भरोसा। कल विरोधियों के साथ मिलकर उसे सारे जहां में बदनाम कर दें। बदनामी से ये अपने वाला बड़ा रावण नहीं डरता। एक से बढ़कर एक बदनामियां उसके खींसे में हैं। लेकिन यह छोटी-सी बदनामी उसकी राजनीति पर दाग बन सकती है। वैसे तो दागों से भी बड़े रावण का कोई दुराव नहीं। करप्शन से लेकर रैप टाइप के बड़े-बड़े दाग। लेकिन यह मामला रिलेजियशली सेंसेटिव है। इसलिए किसी तरह का रिस्क लेना ठीक नहीं, यह सोचकर बड़ा रावण विजयादशमी की एक रात पहले दशहरा मैदान में पसरी चुप्पी के बीच स्वयं ही मोर्चे पर जुट गया। चुपचाप पेट्रोल की कैन हाथ में लिए सधे हुए कदमों से बीच मैदान में खड़े छोटे रावण के पास पहुंच गया। कुंभकर्ण तो हमेशा ही तरह सो रहा था। उधर, इतने सालों से हर साल मरते-मरते मेघनाथ भी किंकत्तर्व्यविमूढ़ हो चुका है। इसलिए वह भी 'कल मरना है तो आज टेंशन क्यों लेना' टाइप की बातें सोचकर मजे से खर्राटे ले रहा था।

हमारे अपने इस बड़े रावण को वैसे भी कुंभकर्ण और मेघनाथ से कोई खास लेना-देना नहीं था। उसे तो केवल छोटे रावण से ही इन्फीरियोरिटी कॉम्लेक्स रहा है। तो उसके निशाने पर छोटा रावण ही था जो छोटा होने के बावजूद करीब 71 फीट ऊंचा था। छोटे रावण ने केवल आंखें मूंद रखी थीं। उसकी आंखों में नींद कहां! बड़े रावण के कदमों की आहट सुनते ही आंखें खोल लीं। नीचे छोटे कद के बड़े रावण को देखते ही बोल उठा- 'आओ गुरु, तुम्हारा ही इंतज़ार कर रहा था।'

बड़ा रावण चौक गया। उसे छोटे रावण के बोलने से अचरज़ नहीं हुआ, पर अपनी प्लानिंग का भांडाफोड़ होने का डर सताने लगा। बड़े रावण ने घबराकर पेट्रोल की कैन को अपने सफेद कुर्ते के पीछे छिपाने की विफल कोशिश की। 

'मुझे मारने की प्लानिंग, वह भी पेट्रोल से! इसे ही कहते हैं विनाश काले विपरीत बुद्धि। मैं खुद एक बार इसका शिकार हो चुका हूं और उसी का ख़ामियाज़ा आज तक भुगत रहा हूं। सोचो, मुझे समय से पहले मारने के मामले की अगर कल फोरेंसिक जांच हो जाती तो तुम यूं ही फंस जाते। आखिर इन दिनों पेट्रोल कौन अफोर्ड कर सकता है? तुम जैसे गिने-चुने लोग ही, जिनके पास ऑलरेडी कई-कई पेट्रोल पंप हैं।'

बड़े रावण ने चुपचाप पेट्रोल की कैन अपनी जिप्सी में रख दी। मन ही मन सोचा- स्साला ऐसे ही ज्ञानी नहीं कहलाता है। और यह सोचकर छोटे रावण के प्रति उसका विषाद और बढ़ गया। बड़ा रावण बखूबी जानता है कि वैसे तो उसने एक से एक नीच काम किए हैं, पर यह धार्मिक आस्था का मामला है। खुलासा होते ही उसकी राजनीति ख़त्म समझो। कैन रखकर वापस आने पर उसने अपनी सफाई देने की कोशिश की तो जबान लड़खड़ाने लगी। कोई कितना भी बेशर्म हो, गलत काम पकड़ में आने पर शुरू में तो हकलाने का नैतिक साहस आ ही जाता है।

छोटा रावण बड़े रावण की चिंता समझ गया - 'मैं जानता हूं कि इतना नीच काम तो तुमको ही शोभा देता है, फिर भी धर्म के मामले में तुमने यह गलती कैसे कर दी?'

इतना सुनते ही बड़ा रावण छोटे रावण के कदमों में गिर पड़ा - 'बताइए, मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूं? बस, आज की इस घटना के बारे में किसी से कुछ मत कहना। पब्लिक मेरे सौ गुनाह माफ़ कर सकती है, लेकिन धर्म के मामले में छोटी-सी गलती भी बर्दाश्त नहीं करेगी। भाई साहब बचा लो। नहीं तो मेरी राजनीति डूब जाएगी।' बड़ा होकर भी छोटे को कब भाई साहब कहना है, बड़े रावण इस मामले में ज्यादा ज्ञानी हैं।

'क्या कर सकते हो तुम?' छोटे रावण को थोड़ी दिल्लगी करने का मन हुआ। पूरी रात बची थी। करता भी क्या तो सोचा कुछ टाइम पास ही कर लेते हैं।

'मैं आपके लिए सबकुछ कर सकता हूं। आपको अपने किसी रिश्तेदार के लिए कोई एजेंसी-वेजेंसी चाहिए या किसी को दारू का ठेका दिलवाना हो तो बताइए।' बड़े रावण ने पहला ऑफ़र पटका।

'मेरे दो प्रिय रिश्तेदार तो यहीं हैं। हमेशा की तरह ये भी कल मेरे साथ ही जाएंगे।'

'फिर भी कोई भतीजा-भांजा। साला, बहनोई। अपन किसी को भी ओब्लाइज कर सकते हैं। बस आप इशारा कीजिए।'

छोटा रावण चुप रहा। अंदर ही अंदर मंद-मंद अट्टहास करता रहा।

'या आप कहें तो आपकी यह रात सजा दूं? शराब-शबाब एक से बढ़कर एक। बताओ तो सही।' बड़े रावण ने कुटिल मुस्कान के साथ कहा। काफ़ी अनुभवी रहे हैं इस मामले में बड़े रावणजी।

अब छोटा रावण बड़े रावण की इस मूर्खतापूर्ण बात पर क्या कहें, मन ही मन अट्‌टहास करने के सिवाय। इधर छोटे रावण की चुप्पी अब बड़े रावण को भयभीत कर रही है। स्साला पता नहीं क्या चाह रहा है? लगता है ऑफ़र बढ़ाने होंगे।

'कोई केस हटवाना हो? रैप से लेकर मर्डर तक, कोई भी केस। किसी के भी ख़िलाफ़। अपनी सब सेटिंग है। या किसी शत्रु के ख़िलाफ़ सीबीआई की कोई रेड डलवानी हो?' उसने एक और ऑफ़र पटका।

छोटा रावण अब भी चुप है। बड़े रावण की बेचैनी बढ़ती जा रही है। और निकट आकर उसने फुसफुसाते हुए कहा - 'इन दिनों अपन ड्रग्स के धंधे में भी आ गए हैं। भतीजा संभालता है सबकुछ। बहुत चोखा धंधा है। आप कहो तो 15 टका आपका।'

इधर छोटा रावण भी बेचैन हो रहा है। बड़ा रावण नीच है, यह तो उसे पहले से ही मालूम था, पर इतना नीच निकलेगा, इसका ज्ञान उस जैसे ज्ञानी को भी आज ही हुआ। उसने कुंभकर्ण और मेघनाथ पर नज़रें दौड़ाई। यहां मैदान में इतनी बड़ी-बड़ी बातें हो रही हैं, पर दोनों को कोई फिक्र नहीं। खर्राटे लेकर मजे से सो रहे हैं स्साले। काश मेघू ये सब सुन पाता। गुस्से का तो शुरू से तेज रहा है। तो बड़े रावण का दहन यहीं इसी समय हो जाता। पर क्या करें, सोने से फुर्सत मिले तब तो!  

इधर बड़े रावण की बेचैनी का तो पूछो ही मत। 'भाई साहब, आप चाहते क्या हो? खुद ही बता दो।' छोटे रावण को चुप देखकर एक और ऑफ़र पटका- 'चलिए, आपको पर्सनल फेवर नहीं चाहिए, कोई बात नहीं। इन दिनों आपके लंकावालों की चीन के साथ बड़ी पींगे बढ़ रही हैं। कोई गुप्त कागजात, नक्शे-वक्शे उपलब्ध करवाना हो तो वह बता दीजिए। आपके लिए यह भी करने की कोशिश कर सकता हूं।'

बड़ा रावण और क्या करता। बेचारा कितनी कोशिश करता। ऑफ़र पर ऑफ़र। ऐसे ही सुबह हो गई।

पौ फटते ही जब नाइट ड्यूटी वाले गार्ड्स आंखें मलते हुए मैदान पर आए तो अनहोनी की ख़बर तुरंत समिति वालों को दी गई। समिति वाले भी आए तो छोटा रावण मैदान पर आड़ा पड़ा हुआ था। बड़ी अनहोनी घट चुकी थी।

पहले तो गार्ड्स को फटकारा - स्सालो, सोते रहते हों! रात को क्या हुआ, तुम्हें नहीं पता तो किसको होगा? फिर उन्होंने प्रश्नवाचक निगाहों से मेघनाथ की ओर देखा। पर स्वयं मेघनाथ के चेहरे पर ही प्रश्नवाचक नज़र आया- पिताश्री हमसे पहले ही कैसे निकल लिए? उधर कुंभकर्ण तो अब भी सो रहा था।

बहुत कोशिश की, लेकिन समिति वाले छोटे रावण को खड़ा नहीं कर पाए। समिति के अध्यक्ष जो संयोग से डॉक्टर भी थे, ने कहा, रात को शायद कोई तगड़ा आघात लगा हो। इसलिए अटैक आ गया होगा।

सचिव ने कहा - कोई बात नहीं सर। हम नेताजी से रिक्वेस्ट कर लेंगे। वे आड़े रावण का ही अंतिम संस्कार कर देंगे। इस मामले में बड़े नेक हैं।

अब यह हकीकत शायद ही किसी को पता चले कि छोटे रावण ने सुबह होते-होते अपनी दिव्य शक्तियों के बल पर सुसाइड कर लिया था।

(ए. जयजीत संवाद की अपनी विशिष्ट शैली में लिखे गए तात्कालिक ख़बरी व्यंग्यों के लिए चर्चित हैं। मूलत: पत्रकार जयजीत फिलहाल भोपाल स्थित एक प्रतिष्ठित मीडिया हाउस में कार्यरत हैं। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया तीनों का उन्हें लंबा अनुभव रहा है।)


शनिवार, 9 अक्तूबर 2021

Satire : आजम खान की उसी भैंस का एक्सक्लूसिव इंटरव्यू जो मंत्री पुत्र की तरह "मिसिंग' हो गई थी!

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By Jayjeet

केंद्रीय मंत्री अजय मिश्र के पुत्र के मिसिंग होने की खबर क्या आई, उसमें वैल्यू एडिशन करने के चक्कर में रिपोर्टर पहुंच गया सीधे उसी वर्ल्ड फेमस भैंस के पास जिसे उप्र की पुलिस ने सालों पहले बड़ी मशक्कत के बाद ढूंढ निकाला था। आजम साहब की तरह आज भैंस भी बूढ़ी हो चुकी है, वैसी निस्तेज भी। पर रिपोर्टर को देखते ही पूछा-

भैंस : क्यों आए हो भैया?

रिपोर्टर : मैं रिपोर्टर।

भैंस : रिपोर्टर हो, यह तो शक्ल-सूरत से ही पता चल जाता है। पर आए क्यों हो? दूहने के लिए कुछ ना बचा मेरे पास।

रिपोर्टर : मैं जानता हूं, आपमें और देश में कोई अंतर नहीं रहा है।

भैंस : गलत बात। देश पर नेताओं-अफसरों का भरोसा बाकी है। अब भी उसमें बहुत कुछ बाकी है दूहने के लिए। इसीलिए अपनी दूसरी पीढ़ी के भी हाथ मजबूत करने में लगे हैं ताकि दोहते-दोहते जान चली जाए, पर हाथ ना थके। खैर, मुद्दे पर आओ।

रिपोर्टर : आपने तो दूसरी पीढ़ी की बात कहकर मेरे लिए बात आसान कर दी। मैं माननीय मंत्रीजी के उस सुपुत्र के संदर्भ में ही आपसे चर्चा करने आया हूं जिसे उप्र पुलिस अब तक ढूंढ नहीं पाई है। किसी जमाने में आपने भी पुलिस की नाक में दम कर दिया था। अपने अनुभव बताइए ना जरा।

भैंस : (शर्माते हुए) अब क्या बताऊं। वो तो मैं भैंस कुमार के चक्कर में जरा घर से बाहर निकल गई थी। वह पूरा मामला पर्सनल था, पर मंत्रीजी की भैंस होने के कारण पब्लिक हो गया था। फिर शर्मिंदगी से बचने के लिए मेरी चोरी और मिसिंग की रिपोर्ट दर्ज करवानी पड़ी।

रिपोर्टर : तो फिर पुलिस ने आपको ढूंढा कैसे?

भैंस : हूम..पुलिस क्या खाक ढूंढती। वो तो मुझे पता चला कि पुलिस हमारी ही किसी दूसरी बहन के साथ मारपीट कर उससे यह कबूलवाने की कोशिश कर रही थी कि वह वही भागी हुई भैंस यानी मैं हूं। यह अन्याय मैं कैसे देख सकती थी! तो पुलिस के पास खुद ही आ गई।

रिपोर्टर : पर आरोप यह है कि जब आप मिसिंग हुई थी तो आपको ढूंढने के लिए उप्र का पूरा पुलिस महकमा लग गया था। और अब मंत्री पुत्र मिसिंग है तो पुलिस हाथ पर हाथ धरकर बैठी है। कुछ ना कर रही।

भैंस : आप पत्रकारों की यही दिक्कत है। दूसरों ने आरोप लगा दिया और आपने मान लिया। भाई, यहां भी तो पूरा महकमा लगा है मंत्री पुत्र के लिए। वो जिस बंगले में ठहरा है, उसके आसपास भारी संख्या में पुलिस बल तैनात कर रखा है। उससे बाहर आने का सविनय अनुरोध किया गया है। जल्दी ही बाहर आ जाएगा। अब अगर पुलिस जोर-जबरदस्ती करती तो तुम्हीं लोग उसका इश्यू बना देते।

रिपोर्टर : पर वो तो आरोपी है। उसकी इतनी सुरक्षा?

भैंस : पुलिस के लिए वह केवल मंत्री पुत्र है। आरोप है तो कोर्ट को तय करने दो। बेचारी पुलिस को क्यों इस झमेले में डाल रहे हो। वह अपना कर्त्तव्य निभा रही है, उसे निभाने दो।

रिपोर्टर : आपको पुलिस के साथ बड़ी हमदर्दी है?

भैंस : जिस दिन आप वीआईपी बन जाआगे तो उस दिन से आपको भी पुलिस के साथ पूरी हमदर्दी हो जाएगी। पुलिस को समझना हर किसी के लिए आसान नहीं है। वीआईपी या वीआईपी पुत्र या वीआईपी भैंस बनकर ही पुलिस को समझा जा सकता है। आप जैसे आम आदमी टाइप के लोग क्या समझोगे। अब फिनिश कीजिए, मेरे ख्याल से आपका वैल्यू एडिशन हो गया होगा। टीवी चैनलों से फोन आने लगे हैं।

(ए. जयजीत संवाद की अपनी विशिष्ट शैली में लिखे गए तात्कालिक ख़बरी व्यंग्यों के लिए चर्चित हैं। मूलत: पत्रकार जयजीत फिलहाल भोपाल स्थित एक प्रतिष्ठित मीडिया हाउस में कार्यरत हैं। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया तीनों का उन्हें लंबा अनुभव रहा है।)


गुरुवार, 7 अक्तूबर 2021

Satire : मसख़रे ना होते तो भारतीय राजनीति का क्या होता?

 


By जयजीत

हम मसख़रों पर हंस सकते हैं, लेकिन उनकी अवहेलना नहीं कर सकते। क्योंकि इसका मतलब होगा देश की पूरी राजनीति और लोकतंत्र को ख़तरे में डाल देना। याद रखें, उन्हें लोकतंत्र को गाहे-बगाहे ख़तरे में डालने का अधिकार है, हमें नहीं। तो हम क्या करें? एक मसख़रे से बात ही कर लेते हैं।

- आप मसख़रे होकर भी राजनीति में हैं?

- (जोरदार ठहाका) बर्बाद गुलिस्तां करने को बस एक ही मसख़रा काफ़ी था, यहां तो मसख़रों की दुकान सजी है...। भाई, राजनीति में जिधर देखो, उधर मसख़रे ही मसख़रे हैं और तुम पूछ रहे हो मैं मसख़रा होकर भी राजनीति में क्यों हूं? इससे वाहियात सवाल नहीं हो सकता था क्या? मैं मसख़रा हूं, इसीलिए तो राजनीति में हूं।

- मतलब आप यह कहना चाहते हैं कि मसख़रा होना भी राजनीति की एक योग्यता है?

- (फिर जोरदार ठहाका) मसख़रा होना भी? अरे भाई, मसख़रा होना ही राजनीति की अनिवार्य योग्यता है। आज से नहीं हमेशा से यह अनिवार्य योग्यता रही है। मैं बहुत सारे नाम गिनवा सकता हूं, पर इसलिए नहीं गिनवा रहा हूं क्योंकि जिनके नाम नहीं लूंगा, उनके समर्थक-भक्त बुरा मान जाएंगे कि हमारे नेता का नाम क्यों नहीं लिया। क्या वे मसख़री में किसी से कम थे!

- आप एक अलग तरह के मसख़रे हैं और आपके जो विरोधी हैं, वे अलग तरह के मसख़रे हैं। तो मसख़रे-मसख़रे में भी अंतर होता है?

- (इस बार ठहाका नहीं) वैसे तो मसख़रों को बांटना नहीं चाहिए। मसख़रे धर्म-जात-पांत के भेदभाव से परे होते हैं। उनका मसख़रा होना ही पर्याप्त होता है। पर चूंकि बांटना हम नेताओं की फितरत होती है तो हमने मसख़रों को भी दो वर्गों में बांट रखा है। एक मसख़रे वे होते हैं जो पैदाइशी ही मसख़रे होते हैं। मसख़रापना उनके लिए गॉड गिफ्टेड की तरह होता है। ऐसे मसख़रे राजनीति में बड़े सहज होते हैं, बल्कि कहना चाहिए राजनीति उनके साथ कहीं ज्यादा सहज और सुरक्षित महसूस करती है। दूसरे प्रकार के मसख़रे वे होते हैं, जिनका जन्म तो सामान्य मनुष्य की तरह होता है। लेकिन उन्हें मसख़रा बनने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है। जैसे-जैसे इनका मसख़रापना बढ़ता और निखरता जाता है, राजनीति में ये ऊंचे पायदानों पर पहुंचते जाते हैं। हमारी राजनीति में अधिकांश मसख़रे इसी श्रेणी के हैं।

- यह फर्जीवाड़े का दौर है। हर तरफ़ फेक ही फेक नज़र आता है। तो क्या इन दिनों राजनीति में फेक मसख़रों का ख़तरा बढ़ नहीं गया है?

- सच्चाई छुप नहीं सकती बनावट के उसूलों से। कि खुशबू आ नहीं सकती कभी कागज़ के फूलों से। यह शेर सुना ही होगा। यही स्थिति फेक मसख़रों के साथ होती है। राजनीति में ऐसे फेक मसख़रे ज्यादा दिन नहीं टिकते। जरा-सा गंभीर होते ही उनका फर्जीवाड़ा सामने आ जाता है। राजनीति के सच्चे मसख़रे केवल ईमानदारी की बात करते हैं, सिद्धांतों की बात करते हैं, अपने राज्य की प्रतिष्ठा की बात करते हैं, भ्रष्टाचार को मिटाने की बात करते हैं। अपनी इन बातों पर थोड़ा-सा भी अमल करते ही उनका पर्दाफाश हो जाता है। समझ लीजिए ऐसे फेक मसख़रे देश-समाज के लिए बड़े घातक हैं और हम सभी को इनसे बचकर रहने की ज़रूरत है। वैसे ईमानदारी की बात यह भी है कि भले ही हर जगह फेक चीजें बढ़ रही हैं, लेकिन राजनीति में फेक मसख़रे कम हो रहे हैं। अब तो कॉम्पीटिशन इस बात को लेकर है कि मेरा मसख़रापना तेरे मसख़रेपने से कितना खरा। इस बात पर ठोंको ताली।

- राजनीति में मसख़रेपने के क्या फायदे हैं?

- फायदे ही फायदे हैं। इसीलिए तो राजनीति में हर कोई मसख़रा होने के लिए मरा जाता है। इसका सबसे बड़ा फायदा तो यही है कि कोई भी आपको गंभीरता से नहीं लेता। गंभीरता से नहीं लेने के अनेक फायदे हैं। आप बिना बात के भी जोर-जोर से हंस सकते हैं। आपके इस हंसने पर भी कोई आप पर हंसेगा नहीं। आप कैसी भी शेरो-शायरी सुना सकते हैं। उसे सुनकर कोई अपने बाल नहीं नोंचेगा। आप चाहे बात-बात में तालियां बजा या बजवा सकते हैं। इसमें भी बेनिफिट ऑफ डाउट आपको ही जाएगा क्योंकि आप तो मसख़रे हैं।

- लेकिन जब आपको कोई गंभीरता से नहीं लेगा तो हाईकमान भी आपको गंभीरता से क्यों लेगा?

- (इस बार जोर का ठहाका) क्या कभी उल्लू को रात में सोते देखा है, क्या कभी मछलियों को साबुन से नहाते देखा है? अरे हाईकमान किसी भी पार्टी का हो, क्या उसे गंभीर होते देखा है? लगता है आपके पास सवाल खत्म हो गए हैं। अगर कोई हाईकमान में बैठा है तो वह मसख़रेपन की तमाम स्टेजों को पार करके ही तो वहां पहुंचा होगा ना। सिम्पल बात, लेकिन सिम्पल बातें ही आजकल बड़ी काम्प्लीकैटेड हो गई हैं।

- आखिरी सवाल। अगर आप मसख़रे ना होते तो क्या होते?

- यह तो वैसा ही सवाल है कि अगर कमला की मूंछे होतीं तो वह क्या होती? तो वह कमला नहीं, कमल होती। अगर मैं मसख़रा ना होता तो यूं आपके सामने ना होता। आप जनाब यूं मुझसे सवाल ना पूछ रहे होते। मैं भी आप जैसे आम लोगों की भीड़ का हिस्सा रहा होता। इसलिए मसख़रों को गंभीरता से लेना सीखिए। सवाल तो यह बनता है कि मसख़रे ना होते तो भारतीय राजनीति का क्या होता? चूंकि आपने यह पूछा नहीं तो इसका जवाब भी मैं नहीं दूंगा। आप खुद ही अंदाजा लगा लीजिए। ताली ठोंकिए और मुझे अनुमति दीजिए।

(ए. जयजीत संवाद की अपनी विशिष्ट शैली में लिखे गए तात्कालिक ख़बरी व्यंग्यों के लिए चर्चित हैं। मूलत: पत्रकार जयजीत फिलहाल भोपाल स्थित एक प्रतिष्ठित मीडिया हाउस में कार्यरत हैं। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया तीनों का उन्हें लंबा अनुभव रहा है।)


रविवार, 3 अक्तूबर 2021

Satire & Humor : अकबर रोड का वह भूत; कभी हंसता है, कभी रोता है…

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ए. जयजीत

हिंदुस्तान के एक अज़ीम शासक अकबर के नाम पर बनी सड़क पर स्थित है वह महल। आज खंड खंड। नींव मजबूत है, लेकिन कंगुरे या तो ढह चुके हैं या ढहने के कगार पर हैं। ढहते कंगुरों से लटके शीर्षासन करते चमगादड़ महल के भूतिया गेटअप को बढ़ाने का ही काम करते हैं। इस अफवाह के बाद कि इस खंड-खंड इमारत से अक्सर किसी भूत के रोने की आवाजें आती हैं, आज पूरे मामले की तफ्तीश करने निकला है वह भूतिया रिपोर्टर। हाथ में टिमटिमाती लालटेन के साथ वह उस इमारत के सामने खड़ा है। भानगढ़ के भूतिया किले से कई बार रिपोर्ट कर चुका वह जांबाज रिपोर्टर भूत मामलों का एक्सपर्ट हैं। भूतिया रिपोर्टर्स के हाथों में पेन या माइक टाइप का तामझाम हो या ना हो, लेकिन पुरानी वाली टिमटिमाती लालटेन होती ही होती है। भूतिया महलों की रिपोर्टिंग करने वाले अनुभवी रिपोर्टर जानते होंगे कि ऐसे मौकों पर टिमटिमाटी लालटेन भूतों के लिए "बिल्डिंग कॉन्फिडेंस' का काम करती है।

तो आइए चलते हैं उसी खंड खंड इमारत के पास...

एक हाथ में लालटेन लिए रिपोर्टर ने दूसरे हाथ से जैसे ही इमारत का मुख्य दरवाजा खोला, सफेद बालों में खड़ा भूत सामने ही नजर आ गया। रिपोर्टर चौंका - हें, ये कैसा नॉन ट्रेडिशनल टाइप का भूत है जो तुरंत आ गया। न सांय-सायं की आवाज आई। काली बिल्ली भी झांकती नजर नहीं आई। उसे खटका तो उसी समय हो गया था, जब दरवाजा भी बहुत स्मूदली खुल गया था। और फिर स्साले चमगादड़ भी कंगुरों पर लटके हुए टुकुर-टुकुर देखते ही रहे। मजाल जो उड़कर माहौल बनाने आ जाए। सालों से एक जगह पड़े-पड़े उनके परों में जैसे जंग लग गया हो। खैर, तुरंत अपनी विचारतंद्रा को तोड़ते हुए भूतिया रिपोर्टर ने टांटनुमा डायलॉग मारा, "हम पूरी तरह आए भी नहीं और आप उससे पहले ही पधार गए! कुछ इंतजार तो करते। माहौल-वाहौल तो बनने देते। भूतों के लिए इतनी अधीरता ठीक नहीं।'

"मैं गया ही कहां था जो आऊंगा़? मैं तो यहीं था। शुरू से यहीं था। लोगों ने जरूर मेरे पास आना छोड़ दिया। शुक्र है आप तो आए बात करने।'

"मतलब? आप हैं तो भूत ही ना?' रिपोर्टर को अब भी भरोसा नहीं हो रहा। दरअसल, भानगढ़ के किले में चिरौरी करनी पड़ती, तब कोई आता।

"हां भई, अब मैं भूत ही हूं। 135 साल पुराना भूत। एंड आई एम प्राउड ऑफ माय भूतपना।'

"वाह जी, ऐसा भूत तो पहली बार देख रहा हूं जिसे अपने भूतपने पर प्राउड हो रहा है।'

"जब वर्तमान ठीक न हो और भविष्य नजर न आ रहा हो तो अपने भूतपने पर ही प्राउड करना चाहिए। वैसे आप तनिक आराम से बैठो और अपनी लॉलटेन बुझा दो। तेल वैसे भी बहुत महंगा हो गया है। विरोध करने वाला भी कोई नहीं है।'

"लेकिन... लेकिन भूत जैसे कोई लक्षण तो हैं नहीं। आपके तो उलटे पैर भी नहीं हैं। भानगढ़ के भूतिया किले के तो सभी भूतों के पैर उलटे होते हैं।' रिपोर्टर बार-बार कंफर्म कर रहा है। कहीं ऐसा न हो कि धोखा हो जाए।

"अरे भाई, किसने कहा कि भूत के लिए उलटे पैर होना जरूरी हैं? कांग्रेस होना ही काफी है।'

"अच्छा, तो आप कांग्रेस के भूत हैं? तभी लोगों को अक्सर यहां से रोने की आवाजें सुनाई देती हैं।'

"हां भाई, रोऊं नहीं तो क्या करुं?'

"लेकिन अगर आप कांग्रेस के भूत हैं तो फिर 10 जनपथ पर कौन हैं?'

"वो कांग्रेस का वर्तमान है, पर कांग्रेस का भूत तो मैं ही हूं। पक्का...।'

"और भविष्य?'

"यह भूत से नहीं, वर्तमान से पूछो। भविष्य तो वर्तमान ही तय करता है, भूत नहीं।'

यह कंफर्म होने के बाद कि वह भूत से ही बात कर रहा है, भूतिया रिपोर्टर अब सहज हो चुका है। भूत की एडवाइज पर लालटेन बुझा दी है। दरवाजा बंद कर दिया है ताकि ढहते हुए कंगुरों पर जोंक की तरह चिपके चमगादड़ उसके इंटरव्यू को पहले ही लीक ना कर दें।

"तो आप अक्सर रोते ही हैं?' भूतिया रिपोर्टर ने इंटरव्यू की शुरुआत करते हुए एक घटिया-सा सवाल दागा।

"आपने तो भानगढ़ के किले में काफी भूतों को कवर किया है। फिर भी ऐसा भूतिया टाइप का सवाल पूछ रहे हैं? आप तो जानते ही होंगे कि भूत दो काम बहुत ही एफिशिएंसी के साथ करते हैं। एक, रोने का और दूसरा हंसने का। मैं दोनों काम बखूबी करता हूं। अपने अतीत को देख-देखकर मुस्कुराता हूं, हंसता हूं, ठहाके लगता हूं। वर्तमान को देखकर रोता हूं।'

"अकेले रोते या हंसते हुए आप बोर नहीं हो जाते हैं?'

"अक्सर शहंशाह-ए-अकबर का भूत भी इस सड़क पर आ जाता है, खैनी मसलने के लिए। वह भी तो इन दिनों फालतू है।'

"अच्छा, इस अकबर रोड पर?'

"हां, उसके नाम पर रोड रखी है तो वह यही मानता है कि ये उसी के बाप की, आई मीन उसी की रोड है। तो वह अपनी इस रोड पर अक्सर मिल जाता है। फिर हम दोनों सामूहिक रूप से रोनागान करते हैं।'

"आपका रोना तो समझ में आता है। पर वह क्यों रोता है?'

"फिर वही भूतिया सवाल। अरे भाई, जैसे मेरे वंशजों ने मुझे बर्बाद किया, तो उसके भी बाद के वंशज कहां दूध के धुले थे। इसलिए वह भी बेचारा जार-जार रोता है।'

.... और बातचीत का सिलसिला चलता रहा, चलता रहा, चलता रहा। बाहर कंगुरों पर लटके चमगादड़ों में अब बेचैनी होने लगी थी। पंख फड़फड़ाने लगे थे। इस बीच, काली बिल्ली की भी एंट्री हो गई थी। मुंह बनाते हुए झांककर दो-तीन बार देख भी गई थी। खिड़की में एक साया भी झांकते हुए नजर आया, पर तुरंत लौट भी गया। शायद अकबर का भूत होगा। अब बारी कुछ अंतिम सवालों की थी -

"बताइए, मैं आपके लिए क्या कर सकता हूं?' सवाल इस बार का संकेत था कि भूत अपनी पूरी रामकहानी बहुत ही दुखद अंदाज में सुना चुका था और भूतिया रिपोर्टर के लिए सहानुभूति दर्शाने की यह औपचारिकता निभानी भी जरूरी थी।

"बस, अब बहुत हो गया। मेरी मुक्ति का इंतजाम करवाइए।' भूत ने उसी बेचारगी के भाव के साथ कहा, जैसा उसने पूरे इंटरव्यू के दौरान बनाए रखा होगा।

"उसकी तो मोदीजी कोशिश कर रहे हैं। लेकिन अगर आप पूरी तरह से मुक्त हो जाएंगे तो फिर झंडेवालां पर बैठे लोगों को डराएगा कौन? वे न वर्तमान से डरते हैं, न भविष्य से। उन्हें तो केवल आपसे डर लगता है। और यह डर अच्छा है। उन लोगों के लिए भी, देश के लिए भी और देश की जनता के लिए भी।'

"अच्छा!! तो मैं दूसरों के लिए यूं ही भटकता रहूं, रोता रहूं जार-जार?'

"इंतजार कीजिए ना। हो सकता है, आपके भूत से ही भविष्य पैदा हो। जब वर्तमान नपुंसक हो तो भविष्य को पैदा करने की जिम्मेदारी भूत को ही उठानी पड़ती है। जिम्मेदारियों से मत भागिए। सोचिए, क्या कर सकते हैं। तब तक मैं यह रिपोर्ट फाइल करके आपसे फिर मिलता हूं...'

और लॉलटेन जलाकर दरवाजे से बाहर निकल गया भूतिया रिपोर्टर। ढहते कंगुरों पर उलटे लटके चमगादड़ अब सीधे खड़े हो गए हैं। फिलहाल वे वेट एंड वॉच की मुद्रा में हैं...!

(ए. जयजीत संवाद की अपनी विशिष्ट शैली में लिखे गए तात्कालिक ख़बरी व्यंग्यों के लिए चर्चित हैं। मूलत: पत्रकार जयजीत फिलहाल भोपाल स्थित एक प्रतिष्ठित मीडिया हाउस में कार्यरत हैं। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया तीनों का उन्हें लंबा अनुभव रहा है।)

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रविवार, 19 सितंबर 2021

Satire : ग्राउंडवॉटर रिचार्ज करेंगी मप्र की ये सड़कें


 

By Jayjeet

मेरे शहर में दो सड़कें हैं। वैसे तो कई सड़कें हैं, लेकिन आज हम इन दो सड़कों की बात ही करेंगे। एक ख़ास सड़क है। वह उतनी ही ख़ास है जितना कि ख़ास कोई नेता या अफ़सर या जज या इनकी पत्नियां होती हैं। इसे कहने को वीआईपी रोड कह सकते हैं। वैसे ये ख़ास रोड है तो हुजूर, सरकार, जी मालिक, जी मालकिन टाइप के संबोधन अधिक फबते हैं। दूसरी आम सड़क है। ऐसी आम सड़कों की भरमार है। जिधर देखो उधर आम ही आम सड़कें। यह वैसी ही आम है, जैसे मैं और आप। चूंकि ये आम सड़क है तो आप इन्हें प्यार से अबे, ओए, स्साली जैसा कुछ भी कह सकते हैं। ये बुरा नहीं मानती हैं। आप इन पर थूक सकते हैं, कचरा फेंक सकते हैं। टेंट गाढ़ने के लिए कुदाली चला सकते हैं। मतलब वह सबकुछ कर सकते हैं, जो आप करना चाहें। बड़ी सहिष्णु होती हैं ये आम सड़कें। उफ्फ तक नहीं करतीं।

ये दोनों तरह की सड़कें किसी भी शहर में हो सकती हैं। होती ही हैं। ख़ासकर राजधानियों में। तो फिर आज अचानक इनकी याद कैसे आ गई? बताते हैं हम...

दरअसल, हुआ यूं कि चलते-चलते अचानक ख़ास और आम सड़क की मुलाकात हो गई। ख़ास सड़क ने बाजू ने गुजरती हुई आम सड़क को रोककर हालचाल पूछे। यह कोई मामूली बात है भला! वैसे हालचाल पूछे तो कुछ तो ख़ास बात होगी। कोई ख़ास यूं ही आम टाइप की चीजों से राब्ता नहीं बनाता...

'और कैसी हो आम सड़क?' ख़ास सड़क ने थोड़ी विनम्रता और थोड़े एटीट्यूड के साथ पूछा।

'ठीक ही हूं हुजूर। आज कैसे याद किया?' आम सड़क ने उतनी ही मिमियाती हुई आवाज में पूछा जितना कि एक आम से अपेक्षित होता है।

'इन दिनों तो बड़े जलवे हैं। हर जगह तुम्हारी ही चर्चा है। सुंदर-सुशील महिलाएं कैटवॉक कर रही हैं। अखबारों में तस्वीरें छपी थीं। देखी थी मैंने।' ख़ास सड़क ने बड़े ही ख़ास अंदाज में कहा।

यह एक सहज गुण है कि कभी किसी दिन गरीब को दो जून की रोटी से एक रोटी भी ज्यादा मिल जाती है तो अमीर के पेट में दर्द-सा उठ जाता है। ख़ास सड़क भी इससे परे नहीं है। दिनभर ख़ासों के साथ रहते-रहते यह ख़ासियत भी आ गई है उसमें।

'वो तो बस यूं ही...।' आम सड़क शर्म से तनिक गुलाबी लाल हो गई। फिर जोड़ा, 'मुझ पर से जो भी गुजरेगा, वह ऐसा ही लगेगा कि कैटवॉक कर रहा है। वे महिलाएं तो सिंपली मुझ पर चलकर गई थीं, लेकिन उनकी वह वॉक ही कैटवॉक बन गई। अख़बारों में तस्वीरें छप गईं। अब देखिए ना उस ऑटो को। देखो तो, कैसे बचता-बचाता चला आ रहा है और ऐसा लग रहा है कि कैटवॉक कर रहा है। सब बरसाती गड्ढों की महिमा है।'

'हूम....।'

ख़ासों के साथ रहते-रहते ख़ास सड़क भी हूम, हम्म करना सीख गई है। जब कुछ जवाब नहीं सूझता तो हूम, हम्म से अच्छा कोई जवाब नहीं होता। ऐसे जवाब अक्सर ख़ास लोगों के मुंह से झरते रहते हैं। बहुत सुंदर लगते हैं। देखिएगा कभी ध्यान से...

'वैसे शिवराज भैया जब चार साल पहले अमेरिका गए थे और कहा था कि अमेरिका की सड़कों से अच्छी तो हमारे यहां की सड़कें हैं तो वे आपकी ही तो बात कर रहे थे।' आम सड़क ने भी अपनी तारीफ़ के जवाब में ख़ास सड़क की तारीफ़ कर बात आगे बढ़ाई।

'हां, वो तो है।' एक हल्की-सी मुस्कान ख़ास के चिकने-चुपड़े चेहरे पर तैर गई। पर बरसाती गड्ढों को देखकर मुस्कान फिर रश्क में बदल गई। इसी ईर्ष्या में गड्ढों को लेकर सुनी-सुनाई बात उसकी जुबान पर आ गई - 'सुना है तुम्हारे इन गड्ढों को लेकर सरकार एक पायलट प्रोजेक्ट पर काम कर रही है!'

'अब ख़ास लोगों के साथ तो आप ही रहती है। तो आपने सही ही सुना होगा। हम क्या कहें। पर गड्ढों पर पायलट प्रोजेक्ट, यह क्या नया तमाशा है?' आम सड़क हो या आम आदमी, उसके लिए सभी प्रोजेक्ट तमाशे से ज्यादा नहीं होते।

'एक्चुअली, कल दो अफ़सर अपनी कार में बैठकर जा रहे थे और तुम्हारे इन्हीं गड्ढों के बारे में बात कर रहे थे। कह रहे थे कि गड्ढों से ग्राउंड वॉटर रिचार्ज करने के प्रोजेक्ट को सरकार ने स्वीकार कर लिया है। बारिश में इन गड्ढों का इस्तेमाल भूजल स्तर में बढ़ोतरी के लिए किया जाएगा।'

'अच्छा? और क्या कह रहे थे?' आम सड़क की दिलचस्पी अचानक उसी प्रोजेक्ट में जाग गई है जिसे वह कुछ देर पहले तमाशा कह रही थी।

'कह रहे थे कि अब सरकार ठेकेदारों को उसी तरह की सड़कें बनाने को पाबंद करेगी जो पहली बारिश में ही पर्याप्त गड्ढेयुक्त हो जाए।'

'हां, यह तो ठीक रहेगा। अभी दो-तीन बारिश का पानी यूं ही बह जाता है। तब जाकर थोड़े बहुत गड्ढे होते हैं। सेटिस्फैक्टरी गड्ढे होने में तो आधा मानसून ही बीत जाता है। पर इस प्रोजेक्ट से सरकार को क्या फायदा होगा?'

हां, मुद्दे की बात तो थी ही। आखिर सरकार को इससे क्या फायदा होगा? क्यों अफ़सर, बड़े अफ़सर, मिनिस्टर, हेड ऑफ मिनिस्टर्स जैसे लोग इतनी मेहनत करें। उनके पास तो जनहित के और भी कई काम होते हैं।

'अफ़सर कह रहे थे कि जब प्रोजेक्ट लागू हो जाएगा तो झीलों-तालाबों में पानी इकट्ठा करने की ज़रूरत ख़त्म हो जाएगी। पूरा पानी जब सीधे ज़मीन के भीतर ही चला जाएगा तो झील-तालाब की ज़मीनों का इस्तेमाल बिल्डरों के कल्याण कार्य हेतु किया जा सकेगा।' ख़ास सड़क ने बात ख़त्म की। दरअसल, यही बताने के लिए ही तो ख़ास सड़क ने आम सड़क से बात शुरू की थी। गॉसिप्स किसी के भी पेट में टिकते नहीं, फिर वह इंसान हो या सड़क अथवा ख़ास हो या आम।

'वॉव! आज पहली बार मुझे आम सड़क होने पर गर्व हो रहा है।' आम सड़क ने केवल सोचा, लेकिन कहा नहीं। क्या पता, ख़ास सड़क बुरा मान जाए।

ख़ास सड़क पहली बार अपनी किस्मत को कोस रही है। वह गड्ढेयुक्त होती तो यह प्रोजेक्ट खुद ही हथिया लेती। हालांकि कहा उसने भी कुछ नहीं। मन मसोसकर रह गई।

दोनों ने अपनी-अपनी राह ली।

(ए. जयजीत संवाद की अपनी विशिष्ट शैली में लिखे गए तात्कालिक ख़बरी व्यंग्यों के लिए चर्चित हैं। मूलत: पत्रकार जयजीत फिलहाल भोपाल स्थित एक प्रतिष्ठित मीडिया हाउस में कार्यरत हैं। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया तीनों का उन्हें लंबा अनुभव रहा है।)

शनिवार, 18 सितंबर 2021

पुलिस ने कानून के लंबे हाथ तो ठाकुर को लौटा दिए ...!


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by Jayjeet

बीते दिनों मप्र के एक शहर में 800 से भी अधिक पुलिसकर्मियों ने मार्चपास्ट किया। मकसद अपराधियों में ख़ौफ़ पैदा करना था। इससे अपराधियों में ख़ौफ़ पैदा हुआ होगा, ऐसा माना जा सकता है क्योंकि जिन क्षेत्रों के टीआई, पुलिसकर्मी इत्यादि उस रैलीनुमा मार्चपास्ट में शामिल हुए, उन क्षेत्रों में उस दिन एक भी अपराध न होने की ख़बर है। ख़बर के अलग-अलग अर्थ लगाने को पाठक स्वतंत्र हैं।

ख़ैर, वह वाकई बड़ा दिन था, कम से कम उस नए-नवेले रिपोर्टर के लिए। तो उसने रैली की व्यवस्था में लगे एक बड़े-से अफ़सर से बड़ी ही मासूमियत से पूछ लिया- "इतने सारे पुलिसकर्मी एक साथ क्यों? ख़ौफ़ पैदा करने के लिए तो आपका एक ठुल्ला ही काफ़ी होता है। हमारी बस्ती में आता है तो बहू-बेटियां घरों के अंदर हो जाती हैं। गली किनारे ठेले-खोमचे लगाने वाले सैल्यूट ठोंकने लगते हैं। पनवाड़ी पान लिए सेवा में पहुंच जाते हैं।' कच्चे से रिपोर्टर ने अपना टुच्चा-सा अनुभव उस अफ़सर के साथ शेयर किया।

अफ़सर अनुभवी था। इसलिए नए-नवेले रिपोर्टर की इतनी बेवकूफी भरी बात का भी उसने मजाक नहीं उड़ाया। ठुल्ला शब्द का भी बुरा नहीं माना। बस मुस्कुरा कर कहा - 'देखिए, आप जैसों की बस्तियों में ख़ौफ़ पैदा करने के लिए हमारा एक जवान तो क्या, उसका डंडा भी पहुंच जाए तो शरीफ़ लोग दंडवत हो जाते हैं। लेकिन बड़े अपराधियों में ख़ौफ़ के लिए बड़ा मार्चपास्ट जरूरी होता है। इससे उन्हें यह संदेश मिलता है कि राज तो कानून का ही चलेगा, भले ही कोई भी चलाएं। इससे अगले कुछ दिनों तक बड़े अपराधी, माफ़िया टाइप के सभी लोग कानून का विधिवत पूरा सम्मान करने लगते हैं। ख़ौफ़ बिन सम्मान नहीं, आपने सुना ही होगा। और जैसे ही सम्मान कम होता है, हम फिर मार्चपास्ट निकालकर थोड़ा बहुत ख़ौफ़ भर देते हैं।'

नए-नवेले रिपोर्टर ने दूसरा मूर्खतापूर्ण सवाल फेंका - 'पूरे शहर भर के पुलिस वालों को आपने एक जगह एकत्र कर लिया है। अगर किसी दूसरी जगह पर कोई क्राइम वगैरह हो गया तो आप क्या करेंगे? क्या यह मिस मैनेजमेंट नहीं है?'
अफ़सर, जो ऑलरेडी बहुत ही अनुभवी था और कई तरह की डील करते-करते इस तरह के मूर्खतापूर्ण सवालों को डील करना अच्छे से सीख चुका था, ने इस बार भी इस सवाल का मजाक नहीं उड़ाया। पर इस बार मुस्कुराया भी नहीं। गुस्से को पीते हुए उसने बड़ी ही गंभीरता से कहा - 'क्राइम कब होता है? जब वह दर्ज़ होता है। दर्ज़ कब होता है? जब पुलिस दर्ज़ करती है। जब पुलिस ही नहीं होगी तो क्राइम दर्ज़ कौन करेगा? और जब क्राइम दर्ज़ ही नहीं होगा तो क्राइम कहां से हो जाएगा? अपराधों और अपराधियों के मैनेजमेंट का यह सिंपल-सा फंडा है।'

बात तो बहुत सिंपल थी। पर रिपार्टर के समझ से परे थी। तो उसने अगला सवाल दागा जो उतना ही मूर्खतापूर्ण था, जितने पहले के दो सवाल थे। सुनिए - 'कानून-व्यवस्था के हाथ तो बड़े लंबे होते हैं। तो रैली निकालने की क्या ज़रूरत? बैठे-बैठे ही कानून अपने लंबे हाथों से अपराधियों को नहीं पकड़ सकता?'

अफ़सर कितना भी अनुभवी क्यों न हो, उसके धैर्य की भी सीमा होती है। अफ़सर चाहता तो इस सवाल पर अपने बाल नोंच सकता था, पर उसने ठहाके लगाने का ऑप्शन चुना। अब ठहाका, वह भी एक बड़े पुलिस अफ़सर का तो ऐसा ही होता है। इसमें उस अफ़सर की कोई गलती नहीं। पर क्या करें? रिपोर्टर ठहरा नया-नवेला, कोई शातिर-अनुभवी अपराधी तो नहीं कि ऐसे जालिम ठहाकों में वह भी ठहाके से ठहाका मिलाकर साथ दे। तो उस भयावह ठहाके से रिपोर्टर का दिल दहलकर वाइब्रेशन मोड में पहुंच गया। दो-चार मिनट में माहौल वाइब्रेशन मोड से नॉर्मल मोड में वापस आया तो रिपोर्टर का दिल भी सामान्य हुआ। उसने बड़ी मासूमियत के साथ अफ़सर की ओर देखा, इस उम्मीद के साथ कि उसे अपने उस सवाल जो बेशक मूर्खतापूर्ण था, का जवाब मिलेगा। लेकिन अफ़सर तो जवाब दे चुका था और अगले मूर्खतापूर्ण सवाल के इंतज़ार की मुद्रा में था।

पर रिपोर्टर अब भी अपने उसी मूर्खतापूर्ण सवाल पर अटका है। 'पर सर, कानून के हाथ ऑलरेडी इतने लंबे हैं तो पुलिस जवानों को पैर लंबे करने की क्या जरूरत थी?'

'देख भाई...' अफ़सर अब 'देखिए' से 'देख' पर और 'आप' से 'तुम' पर आ रहा है। संकेत साफ़ है कि मूर्खतापूर्ण सवाल कुछ ज्यादा ही हो रहे हैं। फिर भी जो पूछा है, उसका जवाब वह यथासंभव शालीनता से देने की कोशिश कर रहा है- 'देश की मूल समस्या ही यही है। तुम लोगों को कानून के लंबे-लंबे हाथ तो नज़र आते हैं, लेकिन यह भी देखो कि वे लंबे हाथ आपस में ही कितने उलझे हुए हैं। इसलिए बार-बार लंबे हाथों की दुहाई मत दो यार। ये हाथ अब हमारे किसी काम के नहीं हैं। हमने ठाकुर को लौटा दिए हैं...।' एक शॉर्ट टर्म ठहाका। अफ़सर अनुभवी है जो जानता है कि अपनी किसी तात्कालिक मूर्खतापूर्ण बात को किस तरह ठहाके में उड़ाया जा सकता है।

रिपोर्टर अब भी प्रश्नवाचक मुद्रा में है। उसकी मुद्रा को देखते हुए पुलिस अफसर ने बात पूरी की, 'इसलिए हम पैर फैलाने पर फोकस कर रहे हैं। मार्चपास्ट को उसी प्रोजेक्ट का हिस्सा मान लो, और क्या!'

'लेकिन पुलिस के कानून वाले लंबे हाथ तो रहे नहीं, जैसा आप कह रहे हैं। तो केवल पैर फैलाने से अपराध कैसे कम हो जाएंगे? नए-नवेले रिपोर्टर के इंटरव्यू का अंतिम समय निकट ही है।

'हमने कब कहा कि इससे अपराध कम हो जाएंगे? हम तो बस अपराधियों में ख़ौफ़ पैदा करने की बात कर रहे हैं। वही तो हमारा मकसद है।'

मार्च-पास्ट ख़त्म होने जा रही है। फिर ड्यूटी पर लगना है। तो अफ़सर के पास टाइम-पास का टाइम भी ख़त्म हुआ। नया-नवेला रिपोर्टर अब भी हेडलाइन की तलाश में है।

(ए. जयजीत संवाद की अपनी विशिष्ट शैली में लिखे गए तात्कालिक ख़बरी व्यंग्यों के लिए चर्चित हैं। मूलत: पत्रकार जयजीत फिलहाल भोपाल स्थित एक प्रतिष्ठित मीडिया हाउस में कार्यरत हैं। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया तीनों का उन्हें लंबा अनुभव रहा है।)

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शुक्रवार, 20 अगस्त 2021

Satire : चौराहे पर काबुलीवाला और तमाशबीनों की तालियां

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चौराहे पर सवालों की झोली के साथ अकेला खड़ा काबुलीवाला।


 By ए. जयजीत

काबुलीवाला ... हां, वही काबुलीवाला। याद ही होगा सबको। गुरुदेव रवींद्रनाथ की कहानी का पात्र। पांच साल की बच्ची मिनी का अधेड़ दोस्त। गलियों में घूम-घूमकर ड्रायफ्रूट्स बेचता, मिनी में अपनी बेटी को याद करता काबुलीवाला।

आज यह काबुलीवाला फिर आया है। चौराहे पर खड़ा है, अकेला। उसकी यादों में अब कोई बेटी नहीं है, क्योंकि अपनी बेटी को तो वह तालिबानियों के रहमो-करम पर छोड़ आया है। उसकी झोली में अब वे ड्रायफ्रूट्स भी नहीं हैं। कुछ हैं तो चंद सवाल। कुछ पुराने, कुछ नए। वह शायद जानता है कि उसे या उसके सवालों को सुनने वाला भी कोई नहीं है। फिर भी उसने अपनी झोली में कम से कम कुछ सवाल तो बचा रखे हैं।

जब आदमी को कोई सुनने वाला नहीं होता है तो वह खुद से बातें करने लगता है। तब वह पागल भी करार दिया जाता है। और जब कोई पागल जैसी हरकतें करता है तो तमाशा बन ही जाता है। तमाशबीन जुट ही जाते हैं। काबुलीवाला आज पागल की तरह चौराहे पर खड़ा है। झोली से सवाल निकाल रहा है। उसके सवालों के जवाब किसी के पास नहीं हैं। या हैं भी तो जवाब कोई देगा नहीं। तो अपने सवालों के जवाब भी वह खुद ही दे रहा है।

पागलपन बढ़ते ही मजमा भी बढ़ता चला जाता है। काबुलीवाले का मजमा भी बढ़ता जा रहा है। तमाशा देखने के लिए पूरी दुनिया जुट गई है। यह लेखक भी चुपचाप उसी तरह तमाशबीन भीड़ का हिस्सा है, जैसे कई और भी हैं।

काबुलीवाले ने अपनी झोली से पहला सवाल निकाला और खुद ही बड़बड़ाते हुए पूछने लगा :  'हे संयुक्त राष्ट्र, तू क्यों चुप बैठा है? तुझ पर तो हर साल 3 अरब डॉलर खर्च होते हैं। यह इतना पैसा है कि हमारे जैसे कई मुल्कों के बाशिंदों को एक वक्त की रोटी मिल सकती है। मगर यहां रोटी भी नसीब नहीं है। न बहन-बेटियों को इज्जत। फिर भी तू चुप बैठा है? तुझे हमारी कोई चिंता नहीं?'

 पागलपन में आदमी अक्सर अदबी भूल जाता है। नहीं तो काबुलीवाले की क्या औकात कि संयुक्त राष्ट्र से तू-तड़ाके से बात करे! किसी और की भी क्या हैसियत संयुक्त राष्ट्र के सामने!

पर बेचारा संयुक्त राष्ट्र भी क्या करे। उसे तो मालूम भी नहीं होगा कि कोई काबुलीवाला उससे सवाल कर रहा है।  पता नहीं, उसे यह भी मालूम है या नहीं कि दुनिया में अफ़ग़ानिस्तान नाम की कोई जगह भी है। और मालूम करके करेगा भी क्या! अफ़ग़ानिस्तान जैसे तो न जाने कितने देश होंगे। सबकी इतनी फिक्र करेगा तो बड़े देशों की जी-हुजूरी करने का समय कब मिलेगा। जी-हुजूरी को छोटा काम ना समझें। बड़े झंझट होते हैं इसमें। न जाने कितनी बार सिर झुकाना होता है। उनके प्रपोजलों पर हस्ताक्षर करने होते हैं, वह भी आंख बंद करके। उफ्फ!  कितना मुश्किल होता होगा ये सब।  तो उसे अफ़ग़ानिस्तान जैसे छोटे-छोटे मसलों पर फंसाना ठीक नहीं। इसलिए संयुक्त राष्ट्र से सवाल पूछने से बड़ा तालिबानी जुर्म और क्या होगा! वैसे अगर संयुक्त राष्ट्र खुद उस चौराहे पर उपस्थित होता, तब भी इस सवाल का जवाब देना उचित नहीं समझता। हो सकता है किसी अन्य भेष में वह उस चौराहे पर तमाशबीन बना बैठा भी हो।

खुद काबुलीवाला भी जानता है कि संयुक्त राष्ट्र से इसका जवाब नहीं मिलना है। तो उसने खुद ही संयुक्त राष्ट्र की ओर से धीमी मगर सधी हुई आवाज में जवाब देना शुरू किया। वैसे ही जैसे ऐसी संभ्रांत संस्थाओं के कुलीन अफसर देते हैं।

'चिंता मत करो हे काबुलीवाला। हम बहुत ही शिद्दत से तुम्हारे साथ हैं। पिछले कई दिनों से हम तुम्हारे लिए चिंता जता रहे हैं। तीन दिन पहले ही हमारे महासचिव ने पूरी दुनिया को तुम्हारे मामले में साथ आने को कहा है। और क्या चाहिए तुम्हें? वैसे क्या तुम्हारे लिए यह गर्व  की बात नहीं है कि हमारे सभी अफसर अफ़ग़ानिस्तान के ड्रायफ्रूट्स खाकर ही अपने दिन की शुरुआत करते हैं। कसम से, क्या कमाल के ड्रायफ्रूट्स पैदा करते हों तुम लोग। लेकिन यहीं पर हमारे लिए एक चिंता की बात और है...'

काबुलीवाला ने खुद ही प्रतिप्रश्न पूछा -  'और क्या चिंता रह गई?'

'अरे क्या तुमने वे क्लीपिंग्स नहीं देखी जब तालिबान के लीडर्स भी ड्रायफ्रूट्स खा रहे थे। कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारे यहां के सारे ड्रायफ्रूट्स पर तालिबानियों का कब्जा हो जाए। कितनी बेरहमी से वे ड्रायफ्रूटस खा रहे थे। पूरी दुनिया ने देखे हैं वे दृश्य। वाकई दिल को दहला देते हैं। बहुत ही बर्बर हैं तुम्हारे यहां के तालिबानी। वहां के ड्रायफ्रूट्स को लेकर हम वाकई बहुत चिंतित हैं। हम फिर कह रहे हैं, अपना ध्यान रखना और हमारे ड्रायफ्रूट्स का भी। हम जल्दी ही एक मीटिंग भी करने वाले हैं। उस मीटिंग में भी हम जोरदार शब्दों में चिंता जताएंगे। तुम बिल्कुल भी चिंता मत करना।'

काबुलीवाला ठहरा पागल । संयुक्त राष्ट्र को तुरंत छोड़कर उसने झोले से दूसरा सवाल निकाल लिया। यह सवाल अमेरिका से था। सवाल था तो घिसा-पीटा ही, फिर भी सुन लीजिए - 'तू तो खुद को पूरी दुनिया का चौधरी मानता है। तो अब अचानक अफ़ग़ानिस्तान को मझधार में छोड़कर क्यों जा रहा है? तेरे सारे हथियार चूक गए हैं क्या?'

अमेरिका की तरफ से काबुलीवाला ने ही जवाब दिया - 'क्यों भूल गया हमारे सारे अहसान? अहसान फ़रामोश! मैंने सालों तुम्हारे बेरोजगार मुजाहिदीनों को पाला-पोसा। उनके हथियारों पर करोड़ों-अरबों का खर्च किया। पर इसके बदले में मुझे क्या मिला? एक ओसामा बिन लादेन। फिर उससे छुटकारा पाने के लिए अरबों-खरबों खर्च करने पड़े। फिर अफ़ग़ानिस्तान की भ्रष्ट सरकारों को पालना-पोसना पड़ा। इतना तो किया? अब अफ़ग़ानिस्तान को बर्बाद करने का पूरा ठेका हमने ही थोड़े ले रखा है।'

अमेरिका का जवाब शायद काबुलीवाला ने सुना नहीं। हां, तमाशबीनों की भीड़ ने सुन लिया है। इसीलिए तालियों की आवाज़ आ रही है।

काबुलीवाला के झोले में तो कई सवाल हैं। अगला सवाल पाकिस्तान से था। उसने सवाल को बड़ी ही हिकारत से देखा और जमीन पर फेंककर उसे पैर से मसल दिया। फिर और भी कई सवाल निकले - रूस से, चीन से, पश्चिमी मुल्कों से। पब्लिक वेलफेयर का दावा करने वाली विश्व संस्थाओं से। वह सभी सवालों को जमीन पर फेंकता जा रहा है। अब तो पूरा ही पागल जैसा बर्ताव करने लगा है। इसलिए तमाशबीनों को और भी मजा आने लगा है। तालियों की आवाज बढ़ गई है। वे सब भी शायद तमाशबीन का हिस्सा ही हैं, जिनसे पूछने के लिए काबुलीवाले के झोले में सवाल हैं।

अब उसके झोले में बस एक अंतिम सवाल बाकी है। निकालते ही उसे चूम लिया। उसे याद आ गई कोलकाता की वह गली जहां वह पहली बार उस बच्ची मिनी से मिला था। उसे ड्रायफ्रूट्स देता था। लेकिन अब न वह मिनी रही होगी, न वह गली। जिससे वह सवाल है, वह तमाशबीनों की भीड़ में शामिल नहीं है, लेकिन उसके साथ भी नहीं है। वह कहीं दूर उसकी ओर पीठ किए हुए हैं। वहां भी तो अब मानसिकता पर तालिबान चिपक गए हैं। तो जवाब देने का नैतिक साहस शायद उसके पास भी कहां होगा!

काबुलीवाला की आंखों के किनारे से आंसू की एक बूंद टपक पड़ी। तमाशबीन का हिस्सा बने इस लेखक की आंखें भी नम हैं, पर उसे तो तटस्थ रहना है। तटस्थता ही सबसे मुफ़ीद होती है।

काबुलीवाला ने वह सवाल ससम्मान अपने झोले में सरका दिया है। शायद यह सोचकर कि जब आमने-सामने मुलाकात होगी तो पूछेगा- क्यों भुला दिया अपने काबुलीवाले को! क्यों भुला दिया उस गांधार को जिसे जीतने के लिए भीष्म ने एक पल की भी देरी नहीं की थी? अपने पितामह को याद करके भी क्यों तुम्हारी भुजाएं अब फड़कती नहीं?

पूछेगा, जरूर पूछेगा...। जवाब तो देना होगा!

(ए. जयजीत खबरी व्यंग्यकार हैं। संवाद शैली में लिखे व्यंग्यों के लिए चर्चित हैं।)

रविवार, 15 अगस्त 2021

Satire & humor : एक डंडे के फासले से मिलता है सिस्टम

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By Jayjeet

और उस दिन तंत्र की जन से मुलाकात हो गई। पाठकों को लग सकता है कि भाई तंत्र और जन दोनों की मुलाकात का क्या चक्कर है? दोनों तो साथ ही रहते हैं - जनतंत्र। 

जी नहीं, ऐसे लिखे हुए पर बिल्कुल ना जाइए। इसमें तो भारी धोखा है। ऐसा लिखा हुआ तो खूब मिलेगा। कानूनों की किताबों में खूब अच्छी-अच्छी बातें मिलेंगी, पर सब अच्छा-अच्छा होता है क्या! दरअसल, जन और तंत्र दोनों जनतंत्र नहीं, जन-तंत्र की तरह रहते आए हैं। जन और तंत्र के बीच एक बहुत बड़ा डैश है। सरकारी स्कूलों का मास्टर उसे समझाने के लिए डंडा कहता है। यही डंडा तंत्र के पास है, जन के पास नहीं। इसलिए दोनों साथ-साथ रहते हुए भी साथ नहीं हैं। एक डंडे का फासला है दोनों के बीच। जन जब मजबूरी में तंत्र से मिलने के लिए उसके पास जाता है, कभी थाने में, कभी तहसील कार्यालय में, कभी कोर्ट-कचहरी में, तो इसी एक डंडे के फासले पर मिलता है।

पर अभी तो तंत्र ही जन से मिलने आया है। ऐसा कैसे? तंत्र को क्या पड़ी कि अपनी कुर्सी छोड़कर जन से मिलने चला आए? होती है भाई, साल में कम से कम दो बार तंत्र की जन से मुलाकात होती है। वे दिन ही ऐसे होते हैं। उन दिनों तंत्र बहुत भावुक हो जाता है। राष्ट्रभक्ति के गीत उसे रुलाने लगते हैं। उसे बापू, नेताजी बोस, भगतसिंह याद आने लगते हैं और इसी भावुकतावश वह जन से मिलने चले आता है।

 तंत्र आज फिर जन से मिला है। इतना पुनीत मौका है तो व्यर्थ की बातें छोड़कर उनकी बातें सुन लेते हैं। 

'नमस्कार जन महोदय, कैसे हों?' विनम्रता का दिखावा करते हुए भी एटीट्यूड तो वही है जो तंत्र में होता है। जरूरी भी है। नहीं तो दो टके के जन को सिर चढ़ने में समय नहीं लगता है। 

'अरे सर। आज आप कैसे? हमारा अहोभाग्य। आप खुद मिलने चले आए।' जन जितना संभव हो सके, झुकने की कोशिश में है। वैसे पिछले 75 साल में झुकते-झुकते वह झुकने के मैग्जीमम लेवल पर तो पहुंच ही चुका है। फिर भी तंत्र के इगो को सेटिस्फाई करने के लिए कोशिश करते दिखना जरूरी है।    

'अबे, पहली बार मिल रहे हैं क्या? याद ना आ रहा? तंत्र ने हल्की सी झिड़की लगाई जो न चाहते हुए भी तगड़ी हो गई। ऐसी कभी-कभार की सौजन्य मुलाकातों से आदतें थोड़ी बदलती हैं। इसलिए 'अबे' यकायक मुंह से निकल गया। विनम्रता साइड में चली गई। 

'सर माफी चाहूंगा, याद ना आ रहा। पर आप अचानक मिलने क्यों आए?' देखिए जन का हरामीपना। अपनी छोटी-छोटी समस्याओं में याद ही नहीं रहता कि कुछ माह पहले ही तो तंत्र उससे मिलने आया था। 26 जनवरी के आस-पास का ही समय होगा। साल में दो बार मिलते ही हैं तंत्र महोदय, फिर भी भूल जाता है जन। 

पर आज तंत्र ने बुरा नहीं माना। बुरा मानने का अभी मौका नहीं है। बोला, 'तूफान से लाए हैं कश्ती निकालकर टाइप कुछ सुना तो अचानक भावुक हो गया और लगा कि तुमसे मिलने का वक्त फिर आ गया है। ऐसे गाने पता नहीं कौन लिख गया। कसम से, रुला देते हैं।' हाथ जेब में रखे रुमाल की ओर जाते-जाते रुक गया। आंखों को भी पता है कि कहां रोना है। जन के सामने भावुकताभरी बातें कहने से ही काम चल जाता है, तो झूठे आंसू बहाने का क्या मतलब। 

 'जी सर। प्रदीप जी लिख गए।' जन ज्ञान बघारने का मौका नहीं छोड़ता, वाट्सऐप हो या सीधे तंत्र से बातचीत। 'वैसे सर, मुझे तो अभी पिछले हफ्ते बाढ़ की वजह से जो हालात हुए, उन्हें देख-देखकर रोना आ रहा है। बेचारे कितने लोग बेघर हो गए, कितनी फसलें नष्ट हो गईं।' जन ने बात जारी रखी। 

'फिर वही तुच्छ बातें। भाई, जरा अपना स्तर बढ़ाओ। वो कौन-सा गीत था ना! उसे सुनकर तो पंडितजी भी रो दिए थे। अपने वर्तमान पीएम साहब भी अभी किसी बड़ी बात पर रो दिए थे। देखो, बड़े लोग कैसी बड़ी-बड़ी बातों पर रोते हैं और तुम स्साला छोटी-छोटी चीजों का ही रोना रोते रहते हों कि सड़क खराब है, पानी गंदा आ रहा है, कचरा गाड़ी नहीं आ रही, फसल खराब हो गई, काम-धंधा नहीं है। इसीलिए हम तंत्र लोगन को तुम जन लोगन से मिलने की इच्छा नहीं होती।' तंत्र भावुकता के साथ व्यावहारिकता का पुट डाल रहा है। 

'पर सर, स्तर बढ़ाने के लिए अतिरिक्त चार पैरों की जरूरत पड़ती है। वे कहां से लाएं?' यह बात जन ने कटाक्ष में कही या असल में, जन ही जाने। उसका इशारा कुर्सी की ओर है। ऐसा कहते हुए उसकी रीढ़ दो इंच ऊपर उठ गई है। हिम्मत भले ही अनजाने में की गई हो, रीढ़ की हड्‌डी को थोड़ा ऊंचा कर ही देती है।

इधर, चार पैरों का उल्लेख होते ही तंत्र के चेहरे पर मलाई जैसी चमक आ गई। तंत्र को बखूबी पता है इन चार पैरों की इस ताकत के बारे में। उसे ना पता होगा तो किसे होगा। तंत्र और चार पैर अब एक-दूसरे के पूरक हो चुके हैं। पूरा तंत्र इन चार पैरों पर चलता है। चार पैरों की महिमा ही है कि तंत्र के दरवाजे के बाहर चार पैर वाले स्टूल पर बैठे हुए चपरासी में भी तंत्र की वही शक्ति आ जाती है, जो दरवाजे के अंदर बड़ी-सी कुर्सी पर बैठे किसी मंत्री या अफसर के पास होती है। भले ही मौके-बेमौकों पर भावुकतावश तंत्र अपने दो पैरों पर जन से मिलने चला आता हो, लेकिन जन यह न मान ले कि तंत्र अपने चार पैर कहीं छोड़कर उससे मिलने आता है। चार पैरों का दंभ उसकी मानसिकता के साथ चिपककर उसके साथ ही आता है। 

75 साल का यही हिसाब-किताब है। यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है! देवलोक में बैठे हमारे स्वतंत्रता सेनानी इस पर अक्सर आंसू बहाते हैं। आज खुशी का मौका है। तो उन्हें खुशी के आंसू ही मान लेते हैं..!! 

(ए. जयजीत संवाद की अपनी विशिष्ट शैली में लिखे गए तात्कालिक ख़बरी व्यंग्यों के लिए चर्चित हैं। मूलत: पत्रकार जयजीत फिलहाल भोपाल स्थित एक प्रतिष्ठित मीडिया हाउस में कार्यरत हैं। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया तीनों का उन्हें लंबा अनुभव रहा है।)

बुधवार, 4 अगस्त 2021

Satire : और अचानक सत्य से हो गई मुलाकात....

(आज अगर अचानक हमारी सत्य नामक जीव से मुलाकात हो जाए तो वह हमें दूर ग्रह का एलियन टाइप ही दिखेगा... सोचिए उस रिपोर्टर की जिसकी अचानक ऐसे ही एलियन से मुलाकात हो गई...)


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सत्य आज कुछ-कुछ ऐसा ही एलियन टाइप नजर आएगा। 

By Jayjeet

सच इन दिनों ट्रेंड में है। हर कोई सच की तलाश में है। कोई पेगासस जासूसी कांड का सच जानना चाहता है तो किसी को किसान आंदोलन के पीछे के सच की चिंता है। पर सच जानकर करेंगे क्या? यह किसी को भी पता नहीं। 


लेकिन सच है कहां? क्या वाकई कहीं सच है भी? उस रिपोर्टर का तो यही दावा था कि हां, उसने सच को ढूंढ निकाला।


हुआ यूं कि उस दिन रिपोर्टर किसी ब्रेकिंग न्यूज की तलाश में नगर निगम के बाजू में स्थित बापू की प्रतिमा के पास खड़ा था। उसे वहीं एक कोने में पड़े कचरे के ढेर से एक साया झांकता हुआ नजर आया। रिपोर्टर ने ब्रेकिंग न्यूज के फेर में उसी साये को पकड़कर ढेर से बाहर निकाल लिया। पर यह क्या! एलियन जैसी आकृति! रिपोर्टर ऐसी आकृति पहली बार देख रहा था। तो चौंकना लाजिमी था। शुक्र है आसपास कोई और ना था। (नोट : दी गई तस्वीर उसी रिपोर्टर द्वारा दिए गए ब्योरे के आधार पर बनाई गई है।)


"आप कौन? इससे पहले तो आपको कभी देखा नहीं!' रिपोर्टर ने उस अनूठी एलियन टाइप की आकृति से बड़े ही अचरज के साथ पूछा। 


"मैं बताना तो नहीं चाहता, पर झूठ भी नहीं बोल सकता।' कचरे को झाड़ते हुए एलियन टाइप के साये ने जवाब दिया। अब वह गांधी मूर्ति के पास बहुत ही सतर्क होकर बैठ गया। 


"अच्छा...तो सच ही बोल दीजिए।' रिपोर्टर ने कुटिल मुस्कान के साथ ऐसे कहा मानो कोई बहुत बड़ा कटाक्ष कर दिया हो।


"जी मैं सत्य ही हूं।' बेचारा सत्य, रिपोर्टर के कटाक्ष को क्या जाने और क्या समझे। 


"अच्छा..... वही सत्य जिसकी लोग हमेशा तलाश में रहते हैं?'

 

रिपोर्टर को भरोसा नहीं हो रहा है। इसलिए उसने दो बार अपनी आंखें मसली, आकृति को छूकर सत्य की पुष्टि करनी चाही। फिर जेब से 100 रुपए का नोट निकाला। उलट-पलटकर देखा। गांधीजी की तस्वीर के बाजू में लिखे सत्यमेव जयते में "सत्य' आलरेडी उपस्थित था। तो यह कोई फेक सत्य तो नहीं! रिपोर्टर दुविधा में है। फिर उसने नोट को जेब के अंदर सरकाते हुए मामले का और भी सच जानने का निश्चय किया। 


"क्या सोच रहे हो महोदय?' सत्य ने बड़ी ही अधीरता के साथ इधर-उधर झांकते हुए कहा। उसकी अलर्टनेस बढ़ गई है। थोड़ी घबराहट भी।


"आप वाकई सत्य हो? पर उस कोने में पड़े कचरे के ढेर में क्या कर रहे थे?' रिपोर्टर ने तफ्तीश शुरू की।


"भाई, मेरी वहीं जगह है। आप लोगों ने ही तय की हाेगी। मैं तो कब से कोने वाले उसी कचरे के ढेर मंे पड़ा हूं। अच्छा होता, मुझे आप वहीं अंदर ही रहने देते। मैं जब तक छिपा हूं, तभी तक सुरक्षित हूं।' सत्य लगातार इधर-उधर देख रहा है। असुरक्षा और घबराहट के भाव बरकरार हैं। 


"आप इतने डरे-डरे, सहमे-सहमे से क्यों हों?'


"मुझे देखते ही कहीं लोग मेरा एनकाउंटर न कर देें। वैसे अब तो लिंचिंग का भी फैशन चल पड़ा है। इसीलिए... कृपया मुझे तुरंत जाने दीजिए। मैं वहीं ठीक हूं।'


"पर आपको डरना क्यों चाहिए? वैसे भी कहा ही गया है, सांच को आंच नहीं। अगर आप वाकई सत्य हो तो फिर काहें का डर?' रिपोर्टर ने सत्य की सत्यता की पुष्टि करने के लिए बचपन में पढ़ा हुआ मुहावरा फेंका।

  

"जब नेता टाइप के लोग मेरी रोटी बनाकर मुझे सेंकते हैं तो आंच मुझे भी लगती है।'  


"हो सकता है, वे आपके साथ प्रयोग करते हों, जैसे कभी बापू ने किए थे। मैंने कहीं पढ़ा था- गांधीजी के सत्य के प्रयोग। ऐसा ही कुछ...' रिपोर्टर ने एक ठहाका लगाया। पता नहीं क्यों लगाया। शायद अपनी ही बचकानी बात पर मोहर लगाने के लिए।


"भाई साहब, आप भी अच्छा मजाक कर लेते हों। अच्छा मुझे जाने दीजिए...' सत्य भी रिपोर्टर के मजाक को समझ गया। अब भी जाने की जिद पर अड़ा है।


"मैं आपके साथ हूं ना। आप घबराइए मत। आपका कुछ नहीं होने वाला।' राजनीतिक रिपोर्टिंग करते-करते इस तरह के आश्वासन रिपोर्टर्स की जबान पर भी स्थाई भाव की तरह चिपक ही जाते हैं।


"पुलिस, सीबीआई या सीआईडी वाले, इनसे आप बचा लोंगे? सबसे ज्यादा डर तो इनसे ही लगता है।' भयंकर घबराया हुआ सा है सत्य।


"लेकिन सत्य जी, पुलिस, सीबीआई, सीआईडी, ये तो हमेशा से ही आप के मुरीद रहे हैं। सत्य को ढूंढने की इन पर एक महती जिम्मेदारी भी है। अगर आप इनसे बचकर रहेंगे तो कैसे काम चलेगा? जनता तक सच पहुंचेगा कैसे?'


"नहीं भाई, दो-चार बार मैं इनसे मिला भी तो इन्होंने मेरा ये हाल किया कि उसे याद करके आज भी सिहर उठता हूं। मुझे इतना तोड़ा-मरोड़ा कि मैं, मैं ना रहा।'


"ऐसा वे क्या करते हैं? हम भी तो जानें जरा...' रिपोर्टर ने अनजान बनने का नाटक करते हुए पूछा। 

 

"इनके पास पहले से ही झूठ का सांचा रहता है। बस, उस सांचे में मुझे तोड़-मरोड़कर पटक देते हैं।' 


"लेकिन इसके लिए तो आप ही जिम्मेदार हैं।' रिपोर्टर ने शायद बड़ी बात कह दी।


"कैसे भला? अब चौंकने की बारी सत्य की थी। रिपोर्टर ने वाकई बड़ी बात ही कही थी। 


"आपकी तलाश में न जाने कितनी संसदीय समितियां बनती हैं, न जाने कितने बड़े-बड़े कमीशन बनते हैं। उनमें बड़े-बड़े अफसर नियुक्त होते हैं, सेवानिवृत्त जजों को तकलीफ दी जाती है। उनके ऑफिस, गाड़ियों पर खर्च अलग होता है। वह भी दो टके के सच, सॉरी, आई मीन सिर्फ आपकी तलाश में। एक सच को जानने के लिए कितनी मशक्कत करनी पड़ती है बेचारों को। और फिर जब वह नहीं मिलता है तो पुलिस, सीबीआई, सीआईडी की मदद लेनी ही पड़ती है। क्या करें वे भी।' रिपोर्टर ने नैतिक ज्ञान पेला। 


"मैं समझा नहीं।' सत्य वाकई मासूम ही है। 


रिपोर्टर बगैर रुके रौ में बोल रहा है, "या फिर उन्हें आपकी तलाश इसी वाले सत्यमेव जयते के "सत्य' पर जाकर खत्म करनी पड़ती है।' रिपोर्टर ने उसी 100 रुपए के नोट को जेब से निकालते हुए सत्यमेव जयते वाले सत्य की ओर उंगली दिखाते हुए एलियन टाइप सत्य से कहा।  


इस बीच रिपोर्टर के बॉस का फोन भी आ गया। रिपोर्टर सत्य से साक्षात्कार की ब्रेकिंग न्यूज को लेकर फोन पर ही अपने बॉस को कन्विंस करने में लगा है। उधर बॉस शायद हंस रहा है।  


इधर, सत्य किंकर्त्तव्यविमूढ़ खड़ा है और फिलहाल तो वह उसी कोने की ओर देख रहा है, जहां पड़े कचरे में से रिपोर्टर ने उसे ढूंढ निकाला था। ढूंढ क्या निकाला था, खींचकर जबरदस्ती बाहर निकाल लिया था। वह रिपोर्टर से नजरें बचाकर जल्दी से उसी ढेर में ओझल हो जाना चाहता है, लोगों को पता चले उससे पहले ही। फिर रिपोर्टर लाख दावा करें, कौन भरोसा करेगा। 

(ए. जयजीत खबरी व्यंग्यकार हैं। संवाद शैली में लिखे व्यंग्यों के लिए चर्चित हैं।)


गुरुवार, 29 जुलाई 2021

Satire : संसद ने अपने प्रांगण में लगी बापू की प्रतिमा से क्या कहा?

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-  ए. जयजीत 

अरसा हो गया। इतने वर्षों से बापू को एक ही पोजिशन में बैठे हुए देखते-देखते। झुके हुए से कंधे। बंद आंखें। भावविहीन चेहरा। कहने की जरूरत नहीं, उम्मीद विहीन भी। चेहरा भावविहीन तो उसी दिन से हो गया था, जिस दिन देश को दो टुकड़ों में बांटने का निर्णय लिया गया था। निर्णय गैरों ने लिया था। उस पर कोई रंज नहीं था। पर मोहर तो अपने ही लोगों ने लगाई थी। इतनी जल्दी थी आजाद होने की, बापू के विचारों से आजाद होने की?

संसद अपने ही प्रांगण में लगी गांधी प्रतिमा को देखकर कुछ यूं ही सोच रही है। संसद को वैसे भी अब कुछ काम तो है नहीं। पक्ष-विपक्ष के सभी माननीय हंगामे में व्यस्त हैं तो संसद क्या करे? कुछ तो करे! तो इन दिनों वह वैचारिक चिंतन में लगी है। वैसे भी जब आदमी निठल्ला हो जाता है तो चिंतन में लग जाता है। संसद को तो निठल्ला बना दिया गया।  

तो संसद का चिंतन जारी है। सोच रही है कि सालों पहले जब बापू को यहां बिठाया गया था, तब भी क्या ये ऐसे ही थे? क्या ये प्रतिमा तब भी इतनी ही गुमसुम-सी उदास थी? कंधे ऐसे ही झुके हुए थे? चेहरे पर इतनी ही विरानगी थी? 

"याद क्यों नहीं आ रहा?' संसद खुद पर भिन्ना रही है। अब क्या करें, वह भी बूढ़ी हो चली है। फिर ऊपर से अल्जाइमर का रोग अलग हो चला। भूलने का रोग। कई पुरानी बातें याद ही नहीं रहतीं। 1947 से लेकर अब तक न जाने कितने वादे किए, उनमें से कितने पूरे हुए, कितने अधूर रहे, कुछ याद नहीं। 

हमेशा की तरह संसद आज फिर बेचैन है। जब भी संसद सत्र चलता है, तब वे ऐसे ही बेचैन हो जाया करती है। दुखी भी। तो दो दुखी आत्माएं। एक इस तरफ, दूसरी उस तरफ। एक ही नियति को प्राप्त। दुखी आत्माएं अगर आपस में बात कर लें तो मन हल्का हो जाता है, यही सोचकर संसद ने बापू को धीरे से पुकारा - "बापू, ओ बापू।' 

पर बापू कहां सुनने वाले। संसद से उठने वाले अंतहीन शोर-शराबे, हंगामे, गालियों, प्रतिगालियों को वे सुन न सकें, माइक फेंकने से लेकर कागज फाड़ने जैसी करतूतें नजर न आ सकें, इसलिए उन्होंने सालों पहले से ही अपने कान और आंखें बंद कर रखी हैं। बापू ने जो सबक अपने तीन बंदरों को सिखाया था, उनमें से दो का पालन वे खुद बड़े ही नियम से करते हैं- बुरा ना सुनो, बुरा ना देखो। कहना तो 1947 के बाद तभी से बंद कर दिया था, जब उनकी बातों का बुरा माना जाने लगा था। 

संसद को शायद मालूम है ये बात। तो उसने धीरे से बापू की प्रतिमा को झिंझोड़ा। 

बापू को भी मालूम है कि उन्हें स्पर्श करने का साहस कौन कर सकता है। संसद ही। काजल की कोठरी में रहकर कालिख से कोई नहीं बच सका है, लेकिन माननीयों के साथ रहने के बावजूद संसद स्वयं में पवित्र है। यह छोटी उपलब्धि नहीं है। तो बापू ने आंख बंद किए ही पूछा- "बताओ, आज कैसे याद किया?' सालों बाद वे बोले, मगर इतना धीमे कि जिसे केवल संसद ही सुन सके। 

"बापू बहुत दिनों से बेचैन थी। सोचा आपसे बात करके मन को कुछ हल्का करुं?' 

बापू मन में मुस्कुराए। बस, इसलिए कि बात ही कुछ ऐसी कर दी थी संसद ने। "एक बेचैन आत्मा से बात करके तुम्हें क्या चैन मिलेगा?' बापू ने फिर धीरे से पूछा। 

"आपने तो मुंह, आंख, कान बंद कर लिए। लेकिन मैं क्या करूं? अपने मुंह, आंख, कान बंद कर लूं, तब भी संसद में उठने वाले तूफानी हंगामे से कांप उठती हूं। क्या करुं मैं?'

"अगर इसका जवाब मेरे पास होता तो मैं खुद यहां यूं ना बैठा रहता, मूर्ति बनकर।' बापू ने क्षोभ से कहा। 

"पर बापू, इनमें से कई आपके पुराने अनुयायी हैं। कई नए भक्त भी बने हैं। आए दिन आपका नाम लेकर कसमें खाते हैं। मैं जानती हूं, सब झूठी कसमें हैं। फिर भी उन्हें एक बार तो अपनी कसम याद दिलवाइए। क्या पता, उसी से उनकी अंतरात्माएं जाग उठे।' संसद ने बड़ी ही मासूमियत के साथ यह बात कही। 

"इतनी भोली भी मत बनो। माननीयों को सबसे ज्यादा करीब से तो तुम्हीं ने देखा है। फिर भी ऐसी तर्कहीन बात। असत्य के साथ नित नए-नए प्रयोग करने वाले ये लोग मेरी बात सुनेंगे? इन्होंने तो अपने ही तीन बंदर क्रिएट कर लिए हैं - अच्छा मत सुनो, अच्छा मत देखो, अच्छा मत कहो।'

"बापू अब तो मुझे आत्मग्लानि होने लगी है। खुद पर ही शर्म आने लगी है।'

"ये तो सदा से रीत चली आ रही है?'

"कैसी रीत बापू? '  

"जब घर के बच्चे बेशर्मी पर उतर आते हैं तो शर्म से गढ़ने का काम उस घर की दीवारों के जिम्मे ही आ जाता है। यही जिम्मा तुम निभा रही हो। पर तुम खुद को दोष मत दो।' 

"पर आप भी खुद को ही दोष देते हों? मैं सालों से देख रही हूं कि 15 अगस्त आते ही आपका चेहरा और भी पार्थिव जैसा हो जाता है। ऐसा लगता है मानों पुराने दिन याद करके आपके मन में वितृष्णा-सी भर आई हो।

"अब मैं कुछ कहूंगा तो तुम कहोगी कि फिर वही घिसी-पिटी बात कह दी।'

"कह दो बापू। अब हमारे पास कहने के सिवाय बचा ही क्या है। कह दो, मन हल्का हो जाएगा।'  

"बस, यही कि अगस्त पास आते ही जी घबराने लगता है। आजादी की जो लड़ाई लड़ी थी, वह व्यर्थ लगने लगती है...' कहते कहते बापू का गला थोड़ा भर्राने लगा। कुछ देर मौन। फिर खुद को संभालते हुए बोले, "तुम कहां बैठ गई फालतू बातें लेकर, जाओ तुम यहां से।'  

वे कुछ और फालतू बात कर सकें, इससे पहले ही संसद को कुछ आहट सुनाई दी। संसद ने तुरंत बापू को अलर्ट किया -  "बापू सावधान! कुछ माननीय हाथों मंे तख्ती लिए, नारे लगाते हुए आपकी शरण में आ रहे हैं। लगता है कुछ घंटे आपके साथ ही बैठेंगे।' 

और बापू फिर पहले वाली मुद्रा में आ गए।

संसद के सामने तो फिलहाल कोई रास्ता नहीं है, अपनी किस्मत को कोसने के सिवाय... 

(ए. जयजीत खबरी व्यंग्यकार हैं। संवाद शैली में लिखे व्यंग्यों के लिए चर्चित हैं।)

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