मंगलवार, 23 जनवरी 2024

आस्थावान चरित्रवान और मर्यादित भी हो, यह जरूरी नहीं!

By Jayjeet Aklecha/ जयजीत अकलेचा

श्रीराम, आस्तिक, रामभक्त, राम मंदिर अयोध्या, sreeram
बीते कुछ दिनों से कुछ ऐसी पोस्ट्स देखने में आईं, जिनमें आस्थावान से नैतिक और चरित्रवान होने की अपेक्षा की गई। जैसे, एक पोस्ट में मर्यादा पुरुषोत्तम राम की 8-10 विशेषताएं बताते हुए कहा गया कि अगर आप रामराज की बात कर रहे हैं तो श्रीराम की इन विशेषताओं का अनुसरण कीजिए। एक पोस्ट तो और भी अति अव्यावहारिक थी। पोस्ट का लब्बोलुबाब था कि अब जबकि पूरा देश राममय है तो कोई रावण किसी सीता की मर्यादा को भंग करने की चेष्टा नहीं करेगा। मतलब समाज से सारे रावण अब खत्म हो जाने चाहिए!
आस्था नैतिक चरित्र के समानुपाती हो, यह जरूरी नहीं है। शायद कहीं, किसी धर्म ग्रंथ में लिखा भी नहीं गया। नैतिक चरित्र विशुद्ध व्यक्तिगत विषय है। आस्था भी इससे पहले तक व्यक्तिगत विषय ही रहा है। बेशक, कोई आस्थावान या आस्तिक उच्च कोटि का नैतिक व्यक्ति हो सकता है, जैसे स्वामी विवेकानंद और महात्मा गांधी। हालांकि गांधीजी की आस्था 'कंडिशनल' थी। उन्होंने कहा था कि अगर आस्था का मतलब अंधविश्वास और उन्माद नहीं है तो मैं सबसे बड़ा आस्तिक हूं।
लेकिन कोई आस्तिक अनिवार्य रूप से नैतिक भी हो, यह अपेक्षा नहीं की जा सकती। आस्तिक तो रावण भी था, चंगेज खान भी था और नीरो भी था। इसलिए यह कैसे कहा जा सकता है कि अगर कोई आस्तिक है तो उसे हर मामले में चारित्रिक उदात्तता के शीर्ष पर होना चाहिए? क्योंकि फिर तो यह होगा कि जो नास्तिक है, उसे पतित होना चाहिए। लेकिन यह भी जरूरी नहीं है। भगतसिंह और उनके समकालीन कई क्रांतिकारी स्वयं को घोषित तौर पर नास्तिक कहते थे। क्या इन नास्तिक क्रांतिकारियों के नैतिक चरित्र पर कोई अंगुली उठा सकता है? एक नास्तिक को तो अपने नैतिक चरित्र के प्रति ज्यादा संवेदनशील होना होगा क्योंकि उसके लिए न किसी मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारे-चर्च की चौखट है जहां वह अपने पापों के लिए प्रायश्चित कर सके और न ऐसी कोई 'पवित्र' नदी जहां वह अपने पाप धो सके।
जो कतिपय लोग रामभक्तों से मर्यादित और नैतिकवान होने की डिमांड कर रहे हैं, उनके मानस में मर्यादापुरुष श्रीराम की छवि है। लेकिन वे भूल रहे हैं कि आज हमारे समाज के आदर्श महाकवि तुलसी के भगवान श्रीराम हैं। तुलसी के श्रीराम को आदर्श मानने से सुविधा यह हो गई कि हमसे कोई 'भगवान' श्रीराम जैसा होने की उम्मीद नहीं कर सकता, क्योंकि कोई भगवान जैसा बन सके, यह संभव नहीं। बस हम भगवान की पूजा कर सकते हैं, जो हममें से अधिकांश लोग करते ही हैं। आज के बाद और भी जोर-शोर से कर सकेंगे। इसके साथ ही वाल्मीकि के मर्यादा पुरुषोत्तम राजा राम नेपथ्य में होते चले जाएंगे और उनकी जगह तुलसी के भगवान श्रीराम और भी तेजी से प्रतिष्ठित होते चले जाएंगे। अच्छा भी है। आस्था मर्यादित भी रहे, अब यह संभव नहीं!
(Disclaimer : यहां व्यक्त विचार नितांत निजी हैं। )