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बुधवार, 8 मई 2024

NOTA के तीन फायदे...!!!


NOTA in election , NOTA, नोटा, विधानसभा चुनाव
By Jayjeet Aklecha
लोकसभा चुनाव के लिए प्रचार-प्रसार शुरू हो गया है। हर पार्टी अपने-अपने पक्ष में तर्क-वितर्क-कुतर्क दे रही है। कुछ दिनों पहले नोटा (NOTA) को लेकर चर्चा हो रही थी। चर्चा के दौरान एक का तर्क था कि नोटा मतलब एक वोट की बर्बादी। बिल्कुल, सहमत! यह भी अपने वोट को बर्बाद करने के कई तरीकों में से एक तरीका है। पर नोटा के कई फायदे भी हैं...
पहला, NOTA को वोट देने से आप भविष्य में अपने साथ होने वाले किसी भी 'विश्वासघात' की फीलिंग से बच जाते हैं।
दूसरा, NOTA माने एक निर्जीव चीज। तो उससे कभी भी मोहभंग जैसा आपको फील नहीं होगा।
और तीसरी सबसे बड़ी बात, आप एक आत्मग्लानि से बच जाते हैं। आप वोट देने के चाहें लाख आधार ढूंढ लो- राष्ट्रवाद, हिंदुत्व, धर्मनिरपेक्षता, अपनी कौम, अपनी जाति, अपने वाला... फलाना-ढिकाना। मगर अंदर ही अंदर यह भी जानते हैं कि आपने वोट तो महाभ्रष्टाचारी या महासाम्प्रदायिक या महाजातिवादी या महावंशवादी या जमीनों के महामाफिया या शराब के महामाफिया या महागुंडे या इकोनॉमी के महासत्यानाशी या इसी तरह की महान विशेषताओं वाले गुणी व्यक्ति को दिया है...।
और अब सीरियस बात... लोकतंत्र में प्रतीकों का बड़ा महत्व है। जिस युग में भी 25 फीसदी वोट NOTA को मिलने लगेंगे, बस उस युग से प्रदेश, देश और जनहित में पॉलिसियों के बदलने की युगांतकारी शुरुआत होगी...।
लोकतंत्र में वोट सबसे बड़ी ताकत है और शुक्रिया लोकतंत्र कि उसने NOTA के रूप में इससे भी बड़ी ताकत थमाई है। बस, उन अच्छे दिनों का इंतजार है, जब यह ताकत तमाम महागुणी नेताओं के चेहरों पर तमाचे के रूप में अपनी छाप छोड़ने लगेगी।
तब तक सारे महागुणी नेता हम मतदाताओं को Take It For Granted ले सकते हैं। मतलब हम वोटर्स को महामूर्ख मान सकते हैं, बना सकते हैं...

मंगलवार, 7 मई 2024

एक तरफ खाई, दूसरी तरफ भी खाई... हमारे नेताओं ने कुएं में खुदकुशी करने का विकल्प भी नहीं छोड़ा!!

#NOTA #election

By Jayjeet Aklecha

एक तरफ खाई और दूसरी तरफ भी खाई। अगर कुएं का ऑप्शन भी होता तो थोड़ी तसल्ली के साथ खुदकुशी की जा सकती थी। लेकिन दुर्भाग्य से हमारे तमाम नेताओं ने हमारे लिए यह रास्ता भी नहीं छोड़ा है।
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में चुनाव हो रहे हैं। दो चरण के चुनाव हो भी चुके हैं और किसी दल के पास आज कोई मुद्दा तक ही नहीं है। हाल के वर्षों में दुनिया के किसी भी सभ्य देश में ऐसा कोई उदाहरण नजर नहीं आता, जब देश के प्रधानमंत्री ने अपने ही देश के एक पूरे समुदाय को हाशिये पर पटकने को अपना मुद्दा बना लिया हो। हमारे यहां यह हो रहा है, इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा। फिर भी हम हमारे 'लोकतंत्र' पर फुले नहीं समाते।
ठीक है, मोदी एंड कंपनी को भी छोड़ देते हैं। लेकिन उनके सामने मौजूद देश का सबसे 'युवा एवं उत्साही एवं बिंदास' नेता भी कोई ऐसा विजन पेश नहीं कर पा रहा है, जिसको देखकर हम सब कहे- हां, हां इसी की तो हमें तलाश थी। देश की सबसे बड़ी समस्या बेरोजगारी को लेते हैं। राहुल गांधी ने इसे अपना सबसे बड़ा मुद्दा बना रखा है। अच्छा है। लेकन इसको लेकर उनके पास भी ले-देकर केवल एक यही उपाय है- देश का सरकारीकरण। उन्हें लगता है कि केवल सरकारी पदों को भरने भर से यह समस्या दूर हो जाएगी। एक पढ़े-लिखे व्यक्ति को भी अगर यह भान नहीं है कि सरकारीकरण करने से देश की प्रोडक्टिविटी किस स्तर पर पहुंच जाएगी तो चुनावी मैदान में खड़े अनपढ़ों की तो क्या बात ही करें। राहुल का दूसरा मुद्दा है- आरक्षण। बाकी? नील बंटे सन्नाटा।
अब सवाल जनता का। क्या हमें इन्हीं जुमलों, बदजुबानियों, वादों या गारंटियों पर वोट देना चाहिए? बेशक, चुनावों में वोट डालना जरूरी है। यह कर्त्तव्य भी है। इसलिए इस कर्त्तव्य का पालन पूरी शिद्दत से करना चाहिए। लेकिन वोट डालने जितना ही महत्वपूर्ण एक कर्त्तव्य और हैं- सत्ताधारी लोगों से, राजनीतिक दलों से, नेताओं से सवाल पूछना। आज सबसे बड़ा संकट ही सवाल पूछने की हिम्मत का हिम्मत हारना है। हममें से शायद ही कोई यह सवाल पूछ रहा है या पूछने की हिम्मत कर रहा है कि आज 75 साल के बाद भी देश के लोगों को मुफ्त अनाज और आरक्षण की बैसाखियों की जरूरत क्यों पड़ रही है? और पड़ रही है तो फिर आप किस मुंह से हमसे अपने-अपने दल के लिए वोट मांग रहे हैं?
तो आइए वोट डालें, मगर सवाल पूछने की नैतिकता भी बरकरार रखें। वोट डालने जितना ही जरूरी सवाल पूछना भी है, फिर चाहे कोई भी दल हो, किसी भी दल की सरकार हो। और इस सवाल में नैतिक बल तब होगा, जब आप आज किसी के पक्ष में खड़े नहीं होंगे। वोट देने का मतलब 'ज्यादा खराब' और 'उससे भी ज्यादा खराब' में से किसी एक को चुनने की मजबूरी कतई नहीं होनी चाहिए। आखिर यह समझौता क्यों?
हो सकता है NOTA की कोई संवैधानिक वकत ना हो, मगर यह ताकत बन सकता है अपने असंतोष को जताने की...
आइए, हम सभी लोकतंत्र को शुक्रिया कहें, और वोट जरूर डालें...!!

रविवार, 28 अप्रैल 2024

'लाड़ली बहना' वाले राज्य से महिलाओं की अस्मिता पर उठे कुछ असहज सवाल... जिन पर उठे कुछ और सवाल...!!!

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By Jayjeet / जयजीत

इस बात को लेकर मेरी धारणा और भी सुदृढ़ हो गई है कि अगर हम तीसरी या चौथी आर्थिक शक्ति बन भी गए, तब भी इसका मतलब यह कदापि नहीं होगा कि हम विकसित राष्ट्र भी बन गए हैं। विकसित राष्ट्र का मतलब है विकसित और प्रगतिशील सोच भी रखना। क्या हमारे नेताओं की सोच विकसित है? नहीं। शायद विकासशील भी नहीं है, बल्कि पतनशील है। वह राज्य जहां से महिलाओं को 'लाड़ली बहना' के रूप में सम्मान देने का राजनीतिक विचार प्रमुखता से निकला, वहां का मुख्यमंत्री इस तरह की सोच रख सकता है, इस पर विश्वास तो नहीं होता, मगर दुर्भाग्य से करना पड़ता है।
एक प्रमुख पार्टी के मुख्यमंत्री ने एक दूसरी प्रमुख पार्टी की एक महिला नेत्री का नाम लिए बगैर उनसे तीन सवाल पूछे हैं। चूंकि सवाल पूछने वाला एक जिम्मेदार संवैधानिक पर बैठा है। इसलिए इन सवालों पर एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते भी कुछ सवाल बनते हैं। ये सवाल पूछना हर जिम्मेदार और प्रगतिशील सोच रखने वाले नागरिक का कर्त्तव्य भी है, फिर वह किसी भी राजनीतिक विचाराधारा से ताल्लुक रखता हो। ये राजनीतिक नहीं, सामाजिक सवाल हैं और बेहद गंभीर विमर्श की मांग करते हैं। इन पर उन तमाम लोगों को जरूर मंथन करना चाहिए, जो चाहते हैं कि उनकी अगली पीढ़ियां एक सार्थक विकसित भारत में सांस लें। हमें ध्यान रखना होगा माननीय नेताजी ने कल जो बातें की हैं, उन्हें केवल चुनावी जुमलेबाजी कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। ये गंभीर इसलिए हैं, क्योंकि ऐसी राजनीतिक सोच ही कालांतर में पूरे समाज की सोच में तब्दील हो जाती है।
संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति का सवाल नंबर 1 था: अरे, तुम्हारी शादी कहां हुई? तुमने तो क्रिश्चियन परिवार में शादी की है।
नागरिक का सवाल: क्या महिला को इस बात पर सफाई देनी होगी, वह भी सार्वजनिक तौर पर, कि उसकी शादी कहां हुई है, किस धर्म में हुई है? (कल से तो किसी महिला से यह भी पूछा जा सकता है कि तुम्हारी शादी क्यों नहीं हुई या तुमने क्यों नहीं की?)
संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति का सवाल नंबर 2: अरे, तुम तो शादीशुदा होकर भी मंगलसूत्र क्यों नहीं पहनती?
नागरिक का सवाल: पिछड़ों की राजनीति करते-करते सोच इतनी पिछड़ी कैसे हो सकती है कि आप किसी महिला से ऐसा व्यक्तिगत सवाल पूछ सकते हैं? ऐसे सवाल पटियों पर, चौक चौबारों पर बैठने वाले निठल्ले किस्म के लोग आपस में जरूर करते हैं, या सीमित सोच वाली बुजुर्ग महिलाओं के बीच आम होते हैं। क्या ये सार्वजनिक तौर पर, किसी मंच पर उठाए जा सकते हैं, वह भी किसी संवैधानिक पद पर बैठे हुए व्यक्ति द्वारा?
संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति का सवाल नंबर 3 : जहां शादी हुई है, वहां के परिवार का सरनेम अपने नाम के साथ क्यों नहीं जोड़ा?
नागरिक का सवाल: क्या हम किसी महिला से यह सीधे-सीधे पूछते हैं या पूछने की हिम्मत करते हैं? हममें से कभी किसी ने किसी महिला से ऐसा पूछा है? तो एक मुख्यमंत्री ऐसा कैसे सकता है?
ये सब व्यक्तिगत च्वॉइस की चीजें हैं, जिनमें सामाजिक स्तर पर पारस्परिक सह-सहमति निहित होती है। और यही तो असल लोकतंत्र है। और जब यही खतरे में होगा, तो फिर बाकी कितना भी बचा हो, क्या फर्क पड़ जाएगा!

गुरुवार, 25 अप्रैल 2024

राजनीति में ज्यादा ज़हर है या हमारी भोजन की थाली में?

 

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By Jayjeet Aklecha

बेहद काम्लीकेट सवाल! शायद दोनों आपस में प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं। खैर, राजनीति को ज़हर-ज़हर खेलने दीजिए। आज अपने भोजन की थाली के ज़हर की बात करते हैं।
हममें से कई लोग अपनी थाली में पोषण तत्वों को लेकर चिंतित और जागरूक रहते हैं कि इसमें प्रोटीन कितना है, कार्ब्स कितने हैं, विटामिन्स कितने हैं, फैट कितना है, शुगर कितनी है, कैलोरी कितनी है, वगैरह-वगैरह... मेरे घर में खासकर मेरी बेटी इसको लेकर फिक्रमंद रहती है... लेकिन मुझे इन तत्वों से ज्यादा फिक्र इस बात की होती है कि उसकी प्लेट में ज़हर कितना है? आपने भी कभी सोचा है कि आपकी अपनी थाली या आपके बच्चों की थाली में कितना ज़हर है? या आप अब भी केवल सियासी ज़हर के इंटरटेनमेंट में ही ग़ाफ़िल है?
हमारी थाली में कितना ज़हर है, इस बारे में हमें वाकई कुछ नहीं पता है। हमारी आंख तब खुलती है, जब बाहर का देश हमें अचानक बताता है कि आपके फलाना ब्रांड में ज़हर का स्तर इतना खतरनाक है कि उससे कैंसर हो सकता है। हाल ही में हमारे दो मशहूर ब्रांड्स एवरेस्ट और एमडीएच को लेकर यह शिकायत आई है। जब इतने नामी-गिरानी ब्रांड्स की ये हालत है, तो बाकी हमें क्या खिला-पिला रहे होंगे? हमारे तमाम रेस्तरां, जहां हम चटकारे लेकर लाल रंग में पगी पनीर की सब्जी खाते हैं, उसमें क्या-क्या होता होगा? और सड़कों पर केमिकल चटनी में पानी-पूरी खिलाने वाले गरीब वेंडर का तो पूछिए भी मत!!
वैसे तो ऊपरी तौर पर हम सब जानते हैं कि हम जो सब्जियां या फल खा रहे हैं, वे भयंकर रसायनों से लदे पड़े हैं। केवल खेत में ही नहीं (यह एक हद तक जरूरी हो सकता है), खेद के बाहर भी उन सब्जियों को पकाने या उन्हें सुरक्षित रखने के लिए न जाने कितने कैंसरकारक रसायन इस्तेमाल किए जा रहे हैं। कुछ धनी टाइप के लोग खुद को यह झूठा दिलासा दे सकते हैं कि वे कथित तौर पर आर्गनिक खा रहे हैं, लेकिन भ्रष्टाचार में पगे हमारे देश में ये आर्गनिक वाकई रसायनों से कितने मुक्त होते होंगे, किसी को कुछ पता नहीं है।
भला हो उन देशों का जो हमें बीच-बीच में हमारी विकासशील औकात याद दिलाते रहते हैं, अन्यथा जुमलों की भीड़ में तो यह भूल ही जाते हैं कि विकसित देश के नागरिक बनने की आकांक्षा का मतलब केवल दुनिया की तीसरी या चौथी अर्थशक्ति बनना भर नहीं है। कोई सरकार अपने नागरिकों को भरपेट भोजन देने के साथ क्या उसे सुरक्षित भोजन भी दे रही है, यहां से शुरू होती है किसी देश के विकसित बनने की कहानी। दुर्भाग्य से, यह सपना अब भी करोड़ों प्रकाश वर्ष दूर प्रतीत होता है।
आतंकियों, आतताइयों, मलेच्छों के सिर आपने एक झटके में कुचल दिए। अब माओवादियों की बारी है। हमारे प्रधानमंत्री और गृहमंत्री मुट्‌ठी तान-तानकर हमें बता रहे हैं। बहुत अच्छा है ये सब। मगर देश को कैंसरयुक्त बनाने वाले जो आतंकी हैं, उनका क्या किया या क्या करेंगे? या आप तब तक कुछ ना करेंगे जब तक कि पूरा देश कांग्रेसमुक्त और कैंसरयुक्त नहीं हो जाता!
एक अंतिम बात और... कोई अति आशावादी कह सकता है, चलिए हम हवा खाकर जी लेंगे। पर सवाल यह भी है कि हमारे आसपास की हवा पर भी हम कितना भरोसा करें? वैसे भी हमारी चिंता में तो पॉलिटिकल हवाएं ज्यादा रहती हैं। तो पॉलिटिक्स वाले भी अपनी इसी हवा की चिंता करेंगे ना। लाजिमी है ये तो...!!

मंगलवार, 23 अप्रैल 2024

तब तो NOTA के लिए बहुते क्रांतिकारी होगा!!

NOTA

गुजरात की सूरत लोकसभा सीट से भले ही भाजपा के प्रत्याशी मुकेश दलाल को निर्विरोध विजयी घोषित कर दिया गया है और निर्वाचन आयोग ने उन्हें सर्टिफिकेट भी दे दिया है। फिर भी एक हाइपोथेटिकल स्थिति की कल्पना कर रहा हूं कि अगर यह मामला सुप्रीम कोर्ट में जाता है और कोर्ट कहता है कि NOTA के होते हुए किसी को भी निर्विरोध नहीं चुना जा सकता, तब मामला कितना दिलचस्प हो जाएगा!!

तो चुनाव होगा...
नोटा V/s दलाल...!!
अगर ऐसा होता है तो यह NOTA के लिए यह कितना क्रांतिकारी होगा!!!
तब कहलाएगा ये असल लोकतंत्र!!!
पुनश्च... कई लोगों को बड़ा अफसोस हो रहा होगा कि काश, बतौर निर्दलीय वे भी परचा दाखिल कर देते तो लोकतंत्र की बहती गंगा में वे भी हाथ धो लेते।

सबसे बड़े मसले पर हमारी दोनों बड़ी पार्टियां एक राय! मगर ये बेहद शर्मनाक!

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By Jayjeet

भाजपा और कांग्रेस दोनों के विचारों में जमीन-आसमान का अंतर है। दोनों के घोषणा-पत्रों में भी यह अंतर साफ दिखाई देता है। मगर फिर भी कम से कम दोनों एक मसले पर एक ट्रैक पर हैं। दुनिया के सबसे महत्वूपर्ण मसले पर दोनों की एप्रोच एक है...!
आइए, पहले इस सस्पेंस को खत्म करते हैं।
भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में पर्यावरण को जगह दी है पेज नंबर 67 पर। यह उसके घोषणा पत्र का समापन बिंदु है।
कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में पर्यावरण को जगह दी है पेज 41 पर। यह उसका आखिरी अध्याय है।
इस मसले पर दोनों एक राय हैं। दोनों की एप्रोच समान है। और दोनों के लिए एक ही शब्द निकलता है- शर्मनाक।
एक पार्टी का फोकस विकास पर है तो दूसरी पार्टी गरीबों को न्याय देने के नाम पर चुनाव लड़ रही है। लेकिन ऐसी कई रिपोर्ट्स हैं, जिनका लब्बोलुआब यही है कि अगर अब भी पर्यावरण को लेकर हम नहीं जागे तो विकास के तमाम दावे और गरीबी उन्मूलन के तमाम संकल्प, सब धरे के धरे रह जाएंगे। जलवायु परिवर्तन का असर हवा से लेकर पानी तक सब पर पड़ने जा रहा है। अकेले पानी की ही बात कर लेते हैं, जिसका अभूतपूर्व संकट आने वाला है। पानी के बिना सामान्य जीवन-शैली भी मुश्किल है, तो विकास की कल्पना तो एकदम बेमानी है। और फिर भीषण गर्म व उमस भरे परिवेश में हम कितनी कंपनियों को अपने यहां बुला पाएंगे? 'भारत को मैन्युफैक्चरिंग हब बनाएंगे' जैसे ये पांच शब्द बस घोषणा पत्र में ही टँके रह जाएंगे!
उधर, 'एक झटके में गरीबी दूर करने' का दावा करने वाले 'जादूगर' राहुल को भी कम से कम विश्व बैंक की हालिया रिपोर्ट पढ़नी चाहिए। इसके अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण केवल अगले पांच साल में ही दुनिया के 13 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे चले जाएंगे। भारत दुनिया से बाहर नहीं है। मौजूद गरीबों का भला तो छोड़ दीजिए, नए गरीबों के साथ न्याय कैसे होगा? इस बारे में कांग्रेस नेता को शायद ही कोई इल्म होगा।
अकेले भारत में ही बढ़ती गर्मी को लेकर कई तरह की डरावनी रिपोर्ट्स हैं। लेकिन केवल रिपोर्ट्स पर भरोसा मत कीजिए। आप तो अपने सहज ज्ञान का इस्तेमाल कीजिए। इस साल गेहूं के उत्पादन में काफी कमी आई है और कई वजहों में एक वजह बढ़ता तापमान भी है। और दुर्भाग्य से, यह स्थाई ट्रेंड बन सकता है। सोचिए, इस साल हमारे यहां बसंत गायब क्यों हो गया? क्यों बेमौसम आंधियां चल रही हैं और क्यों देश के अधिकांश हिस्सों में कभी न पड़ने वाली प्रचंड गर्मी की भविष्यवाणी की गई है? सब हमारे सामने हैं। मगर पार्टियां इसे अपने एजेंड में सबसे पीछे रखे हुए हैं।
इस तरह के मसले पर जनता या मतदाताओं से उम्मीद नहीं की जा सकती। वैसे भी इप्सॉस की एक रिपोर्ट ने भी कह ही दिया है कि 85 फीसदी लोग चाहते हैं कि पर्यावरण में सुधार का काम सरकार ही करें। बिल्कुल, मैं भी सहमत हूं। वैसे भी यह बहुत जटिल मसला है और इस पर कानून बनाने से लेकर जन-जागरूकता तक के तमाम कामों की शुरुआती अपेक्षा सरकारों से ही की जानी चाहिए।
लेकिन सरकार से उम्मीद कर सकते हैं? देश की दो सबसे बड़ी पार्टियां जब इस संकट को लेकर शुतुरमुर्ग बनी हुई हैं और गैर जरूरी मुद्दों पर शर्मनाक तरीकों से आपस में लड़ रही हैं तो उनकी अगुवाई वाली सरकारें भी आखिर कुछ करेंगी, यह बस खयाली पुलाव है।
तो क्या इस पूरे मसले को भगवान भरोसे छोड़ दें? लेकिन जगह-जगह बगीचों को उजाड़कर वहां चार दीवारों के भीतर बैठा दिए गए 'भगवानों' से भी कितनी उम्मीद करें? और क्यों करें?

बुधवार, 17 अप्रैल 2024

UPSC : क्या 'सत्यमेव जयते' को याद रखेंगी हमारी सबसे चमकदार प्रतिभाएं?

 

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By Jayjeet Aklecha

अभी कुछ दिन पहले ही मेरे एक मित्र को कलेक्टर की पोस्टिंग मिली है। वह उन दुर्लभ ईमानदार अफसरों में से एक है, जिसने हमेशा फील्ड पोस्टिंग को अवॉइड किया, ताकि भ्रष्ट सिस्टम का डायरेक्ट हिस्सा बनने से बच सके। लेकिन अब जब कलेक्टर बना तो उसे जानने-समझने वाले हम तमाम मित्रों के दिमाग में बस यही एक सवाल था- वह वहां कब तक सवाईव कर पाएगा?
जब भी UPSC का रिजल्ट घोषित होता है, तब मेरे दिमाग में सबसे पहला सवाल यही उठता है- ये हमारे देश की सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाएं हैं। कड़ी मेहनत से इस मुकाम तक पहुंची हैं। मगर अब ये करेंगी क्या? जब आज सुबह की चाय पर अपनी पत्नी के साथ यूपीएससी रिजल्ट की सुर्खियां पढ़ रहा था और यही सवाल आया तो पत्नी का बेहद मासूमियत भरा जवाब था- करप्शन करेंगी, और क्या? यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है, मगर आम धारणा यही है कि देश के ब्राइटेस्ट टैलेंट का बड़ा हिस्सा एक भ्रष्ट सिस्टम का हिस्सा बन जाएगा और कुछ चुनिंदा दुर्लभ टाइप के अफसर अपने सर्वाइवल के लिए नए संघर्ष में जुट जाएंगे।
बेशक, मेहनत में भरपूर ईमानदारी बरतने वाले, कई महीनों, बल्कि वर्षों अपनी रातों की नींद खराब करने वाली देश की इन चमकदार प्रतिभाओं के दिमाग में शुरू में यह कतई नहीं रहता होगा कि मैं भ्रष्ट बनकर खूब पैसे कमाऊंगा। आप जब इनके शुरुआती इंटरव्यू पढ़ते हैं तो भले ही उनकी ये बातें हास्यास्पद लगती होंगी कि 'मैं देश और लोगों की सेवा करने के लिए इस क्षेत्र में आया हूं।' लेकिन हमें इससे इनकार नहीं करना चाहिए कि जवाब देने वाले के दिमाग में समाज-देश के लिए कुछ बेहतर कर गुजरने के सपने तो होते ही होंगे। इस परीक्षा की तैयारी करते समय उसने जिस गांधी को, जिस सुभाषचंद्र को, जिस लिंकन को, जिस मंडेला को पढ़ा होता है, वे सब हस्तियां शुरू में तो उसे आलोड़ित करती ही होंगी। लेकिन देश-समाज के लिए कर गुजरने वाले सपने आखिर कुछ ही वर्षों में विलोपित क्यों हो जाते हैं?
इसका एक श्रेष्ठ जवाब जापान और पूर्वी एशियाई देशों में प्रचलित एक कहावत में ढूंढा जा सकता है- 'अगर आपको भावी पीढ़ियों के भविष्य सुरक्षित करना है, तो पहली पीढ़ी को अपना सर्वस्व देना होगा।' लेकिन हमारे देश में क्या ऐसा हुआ? आजादी मिलते ही पहली पीढ़ी ने अंग्रेज अफसरशाही के उसी सिस्टम को हूबहू स्वीकार कर लिया, जिसमें अफसर जनता के प्रति जवाबदेह बनने के बजाय अपने से ऊपर वालों के प्रति समर्पित थे। किसी देश को गुलाम बनाए रखने के लिए एक सिस्टम की यह अनिवार्य शर्त भी थी। लेकिन आजाद देश में यह सिस्टम? यही सिस्टम हमने बनाए रखा और आज भी बना हुआ है, और भी मजबूती से।
हमारे प्रधान सेवक इन दिनों देशभर में घूम-घूमकर भ्रष्टाचार उन्मूलन का दम भर रहे हैं। लेकिन एक सवाल उनके लिए भी बनता है- क्या केवल कुछ चुनिंदा मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों को चुन-चुनकर गिरफ्तार करने भर से सिस्टम सुधर सकता है? आपके हिसाब से 2014 एक नए युग की शुरुआत थी। लेकिन यह युग भी उस ईच्छाशक्ति को दर्शाने से चूक गया, जो 1947 के समय चूका था।
बहरहाल, देश के 1,016 ब्राइटेस्ट टैलेंट का हमारे सिस्टम में स्वागत है... उन्हें करोड़-करोड़ बधाइयां!!! उम्मीद करते हैं कि 'सत्यमेव जयते' ये दो शब्द कुछ दिन तक तो उनके जेहन में रहेंगे।
#UPSC #UPSC_Result

बुधवार, 10 अप्रैल 2024

शुक्र है, चुनाव होते रहते हैं... इससे विकसित देशों के बर-अक्स हमें हमारी जमीनी हकीकत पता चलती रहती है...!!!

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By Jayjeet

सुप्रीम कोर्ट ने कल एक छोटी-सी व्यवस्था देते हुए कहा है कि मतदाताओं को उम्मीदवारों की हर चल सम्पत्ति के बारे में जानने का अधिकार नहीं है। इसलिए हलफनामे में इसका खुलासा करने की भी दरकार नहीं है।
अदालत ने बिल्कुल सही फरमाया है। आखिर हम मतदाता ऐसी चीजों के बारे में जानकर करेंगे भी क्या? एडीआर नामक एक संस्था है। यह आए दिन फालतू की रिपोर्ट जारी करती रहती है कि फलाना उम्मीदवार इतना करोड़पति, फलाना के खिलाफ इतने अपराध... हमें इन आंकड़ों से कोई लेना-देना ही नहीं है। अगर हमें यह पता भी चल जाए कि अमुक की सम्पति पांच साल में बढ़कर पचास गुना हो गई है, वह भी गलत तरीकों से, तब भी हम क्या करते हैं? क्या उसे वोट नहीं देते हैं? वैसे भी हर क्षेत्र के मतदाताओं को पता ही होता है कि उसका उम्मीदवार कितना करोड़पति, कितना अरबपति है, कितना बड़ा भूमाफिया है, कितना भ्रष्ट है, उसके खिलाफ कितने संगीन मामले दर्ज हैं। पर इससे मतदाताओं को रत्ती भर भी फर्क पड़ता है? फिर यह बात किसी हलफनामे में या रिपोर्ट में भी आ जाए तो क्या? मतदाता तो केवल यह देखता है कि किस उम्मीदवार ने कितने भंडारे करवाए, कितनी इफ्तार पार्टियां की, कितने मंदिरों को दान दिया, या अंदरखाने कितनी मस्जिदों के लिए पैसे की व्यवस्था की।
कुल मिलाकर मतदाता के काम की बस एक ही चीज है- उम्मीदवार की जाति या उसका धर्म क्या है। वह इसी आधार पर मतदान करता है, तो उसे बस यही जानने का अधिकार होना चाहिए। कोर्ट से निवदेन है कि वह हलफनामे में चल-अचल सम्पत्ति, अपराध के विवरण जैसी गैर जरूरी चीजों का उल्लेख करवाना ही अनिवार्य रूप से बंद करवा दें। बस, एक ही विवरण रखें- उम्मीदवार का धर्म क्या है? जाति क्या है? उप जाति क्या है? और उप जाति की भी कोई उप-उप जाति हो तो वो...। बस, इतने भर से हमारा काम चल जाएगा। हम वोट दे आएंगे। हम ऐसे ही वोट देते रहे हैं और देते रहेंगे।
शुक्र है, हमारे देश में बीच-बीच में चुनाव होते रहते हैं। इससे हमें यह पता चलता रहता है कि विकसित देशों के बर-अक्स हम कितने पानी में हैं! नहीं तो नेता लोग तो विकसित विकसित कहके न जाने कहां-कहां के सपने दिखाते रहते हैं...!!

मंगलवार, 9 अप्रैल 2024

राहुल का एक अहम सवाल.... मगर पहले खुद जवाब देना होगा!!!

 

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By Jayjeet

इस शाश्वत सत्य से कौन इनकार करेगा कि जब आप सामने वाले पर एक उंगली उठाते हैं तो तीन उंगलियां आपकी ओर भी उठती हैं। कल मप्र के मंडला में राहुल गांधी की एक चुनावी सभा में यही दृश्य था। उन्होंने  एक बड़ा महत्वपूर्ण सवाल पूछा था। सवाल यह था कि हिंदुस्तान की बड़ी कंपनियों के मालिकों में, उनके सीनियर मैनेजमेंट में, बड़े-बड़े पत्रकारों में, बड़े-बड़े एंकरों में आखिर आदिवासी कितने हैं? इसका जवाब भी खुद ही दिया- एक भी नहीं। आरोप रूपी यह सवाल मोदी सरकार पर लक्षित था, लेकिन चिलचिलाती धूप में इसकी बड़ी-सी छाया उनकी ही धवल टी-शर्ट को लगभग पूरा ढंक रही थी।  

राहुल की कम से कम इस बात के लिए तारीफ की जा सकती है कि वे बड़े अच्छे सवाल, बड़े अच्छे से उठाते हैं। और इससे भी अच्छी बात यह है कि सवाल उठाते हुए वे जाने या अनजाने में विपक्ष के साथ-साथ अपनी पूर्ववर्ती सरकारों को भी कठघरे में खड़ा करने में कोहाही नहीं बरतते हैं। कल का सवाल भी कुछ इसी तरह का था। यह सवाल पूछते हुए एक उंगली तो उन्होंने मोदी सरकार पर उठाई थी, लेकिन तीन उंगलियां उन पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकारों पर भी उठ रही थीं, जिनका ज्यादातर नेतृत्व उनके ही परिवार के पास रहा है। 

मोदी सरकार से तो वैसे भी  किसी सवाल के जवाब की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि क्या इस सवाल का जवाब खुद राहुल भी देने का नैतिक साहस करेंगे? क्या वे जवाब देंगे कि आखिर 55 साल तक सत्ता में काबिज उनकी पार्टी की सरकारों ने भी आदिवासियों की हैसियत महज एक वोट बैंक से ज्यादा क्यों नहीं समझी? (बल्कि दलितों, और मुस्लिमों की भी)। तमाम सरकारों ने आदिवासियों और दलितों के लिए महज सरकारी नौकरियों में आरक्षण सुनिश्चित कर यह मान लिया और मनवा लिया कि वे प्रगति की राह पर आगे बढ़ जाएंगे। बेशक,आरक्षण से वंचित तबकों के बड़े हिस्से को एक हद तक आगे बढ़ाना संभव हो सका है, लेकिन घनघोर प्रतिस्पर्धा वाले कॉरपोरेट संसार में ये तरीके काम नहीं आ सकते। क्या कांग्रेस सरकारों ने इसके लिए उन्हें तैयार करने का प्रयास किया या तैयार करने की इच्छाशक्ति दिखाई? 

मान लेते हैं, वह जमाना राहुल का नहीं था। लेकिन अब तो पार्टी को कमोबेश राहुल ही लीड कर रहे हैं। उन्होंने जो मोदी सरकार से पूछा, क्या उसका समाधान उनके पास है? इसके जवाब के लिए कांग्रेस का घोषणा-पत्र देखिए। अधिकांश वादे सरकारी नौकरियों में भर्ती और आरक्षण तक सीमित है, जबकि आने वाला दौर कॉरपोरेट का ही है। तो फिर महज चुनावी जुमलेबाजी से क्या हासिल होगा? 

पुनश्च... मौजूदा मोदी सरकार अक्सर बड़े गर्व (आप चाहें तो अहंकार भी पढ़ सकते हैं) से कहती है कि हमने एक आदिवासी को राष्ट्रपति बनाया। 'बनाना' और 'बनना', इसमें जमीन-आसमान का फर्क है। कांग्रेस जब सत्ता में होती थी, तब वह भी कुछ ऐसे ही जुमलों का प्रयोग करती थी। जब तक हमारे राजनीतिक दल एहसान जताने वाले शब्दों से ऊपर उठकर वास्तविक सशक्तिकरण के प्रयास नहीं करेंगे, इन वर्गों का कुछ भी भला नहीं हो सकेगा और ये महज सियासी चारा बने रहेंगे। फिर चाहें कितने भी सवाल उठते रहे, उठाते रहें...! 


बुधवार, 3 अप्रैल 2024

शुक्र है, खास लोगों को पता तो चला कि आम लोगों के साथ क्या-क्या होता है...!!

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By Jayjeet

यह मप्र के एक मंत्री पुत्र की तस्वीर है, जिस पर गुंडागर्दी करने का आरोप है। उधर, मंत्री पुत्र का आरोप है कि उसे पुलिस ने उसी तरह पीटा जैसे आम गुंडों को पीटते हैं। हालांकि इस पुलिसिया समाजवाद का खामियाजा चार पुलिसकर्मियों को भुगतना पड़ा और उन्हें सस्पेंड होना पड़ा।
खैर मंत्री पुत्र और पुलिस पर लगे आरोप-प्रत्यारोपों में मेरी कोई खास दिलचस्पी नहीं है। इस पूरे वाकये में मुझे सबसे दिलचस्प बात लगी मंत्री पुत्र का बयान - 'पुलिस ने मेरे साथ ऐसा किया तो आम लोगों के साथ क्या करती होगी?' यह अहंकार का नेक्स्ट लेवल है। केवल पिताश्री मंत्री हैं तो आप 'आम' से ऊपर हो गए...! इससे एक दिन पहले मंत्रीजी का अखबारों में छपा बयान भी पढ़ लेते हैं, जब वे अपने प्रिय बेटे को छुड़ाने के लिए थाने पहुंचे थे- 'मंत्री के बेटे के साथ पुलिस का यह व्यवहार है तो पुलिस आम जनता के साथ क्या करती होगी।'
शु्क्र है, इन खास लोगों को कुछ-कुछ तो पता चला कि आम लोगों के साथ क्या-क्या होता है!!! लेकिन अब भी पूरा पता नहीं चला है। नया अघोषित नियम तो यह कहता है कि अगर किसी आम आदमी के परिवार का कोई नालायक बेटा कोई गलती कर देता है तो प्रशासन उसके घर पर या घर के अवैध हिस्सों पर बुलडोजर चलाने में देर नहीं करता है। खबरों के मुताबिक इसी मंत्री पुत्र के आदरणीय पिताश्री ने भोपाल की एक पॉश कॉलोनी में आम लोगों के लिए बने एक बगीचे पर कब्जा कर रखा है। क्या सिस्टम कम से कम उस पर कब्जे पर ही बुलडोजर चलाने की हिम्मत करेगा? उम्मीद है, बिल्कुल नहीं!!
आम लोगों के वोटों से खास बने लोगों को आम लोग बस उस समय याद आते हैं, जब सिस्टम आमवाली पर ऊपर आता है। क्या हम आम लोगों को प्रार्थना करनी चाहिए कि बीच-बीच में, जस्ट फॉर ए चेंज, ऐसी आमवाली पर सिस्टम आता रहे, ताकि आम लोगों के साथ क्या-क्या होता है, इसका कुछ-कुछ इल्म कम से कम ऐसे खास लोगों को ऐसे ही होता रहे।

रविवार, 25 फ़रवरी 2024

ग्लोबल ब्रांड्स तो बेकार की चीज हैं!



apple park
By Jayjeet Aklecha 

मेरा एक मित्र हाल ही में अमेरिका के कैलिफोर्निया से लौटा है। वही स्टेट, जिसने दुनिया को अनेक टेक्नोलॉजिकल इनोवेशन दिए हैं। भ्रमण के दौरान उसके गाइड ने वो चीजें दिखाईं, जो मित्र के लिए अचरज का विषय थीं। मित्र को उसने वहां के आलीशाल चर्च नहीं दिखाए, बल्कि दिखाया वह रेस्तरां जहां से दुनिया में पहली बार कोई ई-मेल भेजा गया था। उसे दिखाए गए वे गैरेज जहां से एपल और माइक्रोसॉफ्ट जैसे ग्लोबल ब्रांड्स निकले। गूगल का वह हेडक्वार्टर भी दिखाया, जहां काम करना आज भारत सहित दुनिया के अधिकांश युवाओं के लिए किसी सपने से कम नहीं है। और भी बहुत कुछ। ये सब अमेरिकियों के लिए तीर्थस्थल जैसे हैं, जिन पर वे गर्व करते हैं...।

आइए, भारत लौटते हैं। यहां हम क्या दिखाते हैं? वह चट्टान जहां किसी पांडव पुत्र ने तपस्या की थी! वह तालाब जहां हमारे किसी देवता ने स्नान किया था! वह पेड़ जहां किसी संत ने घनघोर तपस्या की थी! बेशक, ये हमारी सांस्कृतिक विरासतें हैं, जिन पर हमें गर्व होना चाहिए। लेकिन कितना? और कब तक? और फिर कब तक हम केवल इन्हीं विरासतों पर गर्व करते रहेंगे? 

हां, हम गर्व के नए स्थल पैदा कर रहे हैं। करोड़ों रुपए से धार्मिक परिसरों का निर्माण कर रहे हैं। इसमें बुराई कुछ नहीं। अच्छा ही है। सुव्यवस्थित होने चाहिए सभी बड़े धर्मस्थल। पर इनके साथ ही क्या आने वाले दशकों में देश गूगल या एपल या माइक्रोसाफ्ट परिसर जैसे किसी परिसर की उम्मीद कर सकता है, जहां काम करना दूसरे देशों के युवाओं का भी सपना बन सके और हमारे युवा विदेश भागने के बजाय यहीं पर काम करने में गर्व महसूस कर सकें? यह फिलहाल तो असंभव के विरुद्ध इसलिए है, क्योंकि अभी तो हमारा देश एक अदद 'अपना मोबाइल' तक के लिए तरस रहा है। एपल-सैमसंग तो छोड़िए। हमारे पास अपना 'रेडमी' तक नहीं है!

हम फाइव ट्रिलियन इकोनॉमी की बात करते हैं। मुश्किल नहीं है, पर दिक्कत एप्रोच की है। हमारे माननीय प्रधानमंत्री जी ने पिछले 10 दिन में तीन बार देश को विकास के उच्च पायदान पर ले जाने की बात कही है। पर कहां से की है? ये बातें उन्होंने धार्मिक या सांस्कृतिक कार्यक्रमों में कही है। यह हमारी एप्रोच में विरोधाभास का एक और उदाहरण है। (मैंने उन्हें इसरो के अलावा किसी अन्य वैज्ञानिक या रिसर्च संस्थान में जाते बहुत कम देखा है। अगर आपने देखा तो मुझे करेक्ट कीजिएगा। वैसे जाएं भी तो कहां? ऐसी जगहें हैं भी? समस्या यह भी है…!)
 
अगले कुछ दशकों में हमारे पास दुनिया के धर्मप्रेमियों को दिखाने के लिए ढेर सारे शानदार भव्य धर्म परिसर होंगे, कई दिव्य लोक होंगे। लेकिन आशंका है कि तब भी हमारे पास न गूगल जैसा कुछ होगा, न एपल जैसा कुछ होगा। तब भी हमारे पास न ऑक्सफोड होगा, न स्टैनफोर्ड होगा, न कोई कैम्ब्रिज होगा। 

और हां, क्या इसके लिए हम सिर्फ सरकार को ही जिम्मेदार ठहराएं? पार्टियों को ही दोष दें? मैंने पहले भी लिखा है कि सरकारें और पार्टियां वही देंगी तो हम चाहेंगे। हमें मंदिर-मस्जिद चाहिए, वे हमें मंदिर-मस्जिद देंगे। हमें कुछ और चाहिए, तो वे कुछ और देंगे। फिलहाल तो हम सब धर्ममय होकर खुश हैं तो वे हमें धर्म की खुराक ही दे रहे हैं। चलिए, इसी में खुश रहते हैं। लगे हाथ यह भी जान लेना मुनासिब होगा कि हमारा इतना धर्ममय होना हमें पुण्यात्माओं में नहीं बदल रहा है। व्यक्तिगत शूचिता में हम कहीं पीछे हैं। ट्रांसपेंरेसी इंटरनेशनल के अनुसार हम भ्रष्टाचार के मामले में 93वें स्थान पर है। 

पुनश्च... ऊपर लिखा सब भूल जाइए। कम से कम यही सुनिश्चित कर लिया जाएं कि हमारे वे धार्मिक-सांस्कृतिक स्थल जिन पर हमें बहुत गर्व हैं, टूरिज्म के ग्लोबल सेंटर बन जाएं तो हमारी इकोनॉमी एपल और माइकोसॉफ्ट की कम्बाइंड वैल्यू (2.84+3.06 =5.90 ट्रिलियन डॉलर) के आजू-बाजू पहुंच सकती है। 

(तस्वीर : यह एपल का क्यूपर्टिनो, कैलिफोर्निया स्थित हेडक्वार्टर है। पूरा सोलर एनर्जी से संचालित है। बीच में ढेर सारे पेड़-पौधे। पेड़-पौधों की पूजा हम करते हैं, सार-संभाल वे करते हैं…!)

#जयजीत अकलेचा

गुरुवार, 1 फ़रवरी 2024

हम और ज्यादा भ्रष्ट हो गए... और विपक्षी अब भी बाहर हैं!!!

By Jayjeet Aklecha/ जयजीत अकलेचा

अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि हमारा देश एक साल में थोड़ा और भ्रष्ट हो गया ( ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की ताजा रिपोर्ट के अनुसार भारत की रैंकिंग दुनिया के सबसे भ्रष्ट देशों में 85 से बढ़कर 93 हो गई है)।
अफसोस इस बात का कतई नहीं है कि भारत और भ्रष्ट हुआ है। अफसोस इस बात का है कि आज भी विपक्ष के कई नेता बाहर कैसे हैं? उन्हें बाहर रहकर देश को भ्रष्ट बनाने की अनुमति आखिर कैसे दी जा सकती है?
ED जैसी राष्ट्र हितैषी एजेंसियों पर सवाल नहीं उठाया जा सकता, फिर भी अपने आप उठता है कि आखिर वह इतने सालों से कर क्या कर रही है? क्यों इतने सारे विपक्षी नेता बाहर रहकर देश को भ्रष्टाचार के पायदान पर ऊपर चढ़ा रहे हैं? इनफ इज इनफ। देश और ज्यादा भ्रष्ट न हो, इसके लिए हमें राष्ट्रीय स्तर पर दो काम प्रॉयोरिटी पर करने होंगे...
1. या तो विपक्ष के तमाम नेताओं (नेता हैं तो भ्रष्ट होंगे ही, यह मानकर) को जेल के भीतर किया जाना चाहिए।
2. या विपक्ष के तमाम नेताओं को एनडीए के भीतर किया जाना चाहिए।
शुक्र है... सुशासन बाबू एनडीए में आ गए। उनके आने से उम्मीद है अगले साल भ्रष्टाचार की रैंकिंग में हम थोड़ा सुधार करेंगे, बशर्ते वे एनडीए के साथ बने रहें। और इसमें कोई शक है?
कोई शक नहीं है कि वे एनडीए के साथ नहीं रहेंगे... पर फिर वही सवाल... आखिर हम राष्ट्र के स्तर पर विपक्षी दलों के भ्रष्टाचार को कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं?

मंगलवार, 23 जनवरी 2024

आस्थावान चरित्रवान और मर्यादित भी हो, यह जरूरी नहीं!

By Jayjeet Aklecha/ जयजीत अकलेचा

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बीते कुछ दिनों से कुछ ऐसी पोस्ट्स देखने में आईं, जिनमें आस्थावान से नैतिक और चरित्रवान होने की अपेक्षा की गई। जैसे, एक पोस्ट में मर्यादा पुरुषोत्तम राम की 8-10 विशेषताएं बताते हुए कहा गया कि अगर आप रामराज की बात कर रहे हैं तो श्रीराम की इन विशेषताओं का अनुसरण कीजिए। एक पोस्ट तो और भी अति अव्यावहारिक थी। पोस्ट का लब्बोलुबाब था कि अब जबकि पूरा देश राममय है तो कोई रावण किसी सीता की मर्यादा को भंग करने की चेष्टा नहीं करेगा। मतलब समाज से सारे रावण अब खत्म हो जाने चाहिए!
आस्था नैतिक चरित्र के समानुपाती हो, यह जरूरी नहीं है। शायद कहीं, किसी धर्म ग्रंथ में लिखा भी नहीं गया। नैतिक चरित्र विशुद्ध व्यक्तिगत विषय है। आस्था भी इससे पहले तक व्यक्तिगत विषय ही रहा है। बेशक, कोई आस्थावान या आस्तिक उच्च कोटि का नैतिक व्यक्ति हो सकता है, जैसे स्वामी विवेकानंद और महात्मा गांधी। हालांकि गांधीजी की आस्था 'कंडिशनल' थी। उन्होंने कहा था कि अगर आस्था का मतलब अंधविश्वास और उन्माद नहीं है तो मैं सबसे बड़ा आस्तिक हूं।
लेकिन कोई आस्तिक अनिवार्य रूप से नैतिक भी हो, यह अपेक्षा नहीं की जा सकती। आस्तिक तो रावण भी था, चंगेज खान भी था और नीरो भी था। इसलिए यह कैसे कहा जा सकता है कि अगर कोई आस्तिक है तो उसे हर मामले में चारित्रिक उदात्तता के शीर्ष पर होना चाहिए? क्योंकि फिर तो यह होगा कि जो नास्तिक है, उसे पतित होना चाहिए। लेकिन यह भी जरूरी नहीं है। भगतसिंह और उनके समकालीन कई क्रांतिकारी स्वयं को घोषित तौर पर नास्तिक कहते थे। क्या इन नास्तिक क्रांतिकारियों के नैतिक चरित्र पर कोई अंगुली उठा सकता है? एक नास्तिक को तो अपने नैतिक चरित्र के प्रति ज्यादा संवेदनशील होना होगा क्योंकि उसके लिए न किसी मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारे-चर्च की चौखट है जहां वह अपने पापों के लिए प्रायश्चित कर सके और न ऐसी कोई 'पवित्र' नदी जहां वह अपने पाप धो सके।
जो कतिपय लोग रामभक्तों से मर्यादित और नैतिकवान होने की डिमांड कर रहे हैं, उनके मानस में मर्यादापुरुष श्रीराम की छवि है। लेकिन वे भूल रहे हैं कि आज हमारे समाज के आदर्श महाकवि तुलसी के भगवान श्रीराम हैं। तुलसी के श्रीराम को आदर्श मानने से सुविधा यह हो गई कि हमसे कोई 'भगवान' श्रीराम जैसा होने की उम्मीद नहीं कर सकता, क्योंकि कोई भगवान जैसा बन सके, यह संभव नहीं। बस हम भगवान की पूजा कर सकते हैं, जो हममें से अधिकांश लोग करते ही हैं। आज के बाद और भी जोर-शोर से कर सकेंगे। इसके साथ ही वाल्मीकि के मर्यादा पुरुषोत्तम राजा राम नेपथ्य में होते चले जाएंगे और उनकी जगह तुलसी के भगवान श्रीराम और भी तेजी से प्रतिष्ठित होते चले जाएंगे। अच्छा भी है। आस्था मर्यादित भी रहे, अब यह संभव नहीं!
(Disclaimer : यहां व्यक्त विचार नितांत निजी हैं। )

रविवार, 24 दिसंबर 2023

खिलाड़ी का राजनीति करना अपराध, मगर नेता की दबंगई स्वीकार्य!

punia Brij Bhushan Sharan Singh padmashree
By Jayjeet

पिछले दो-तीन दिन से मैं राजनीति करने वाले खिलाड़ियों और दबंगई करने वाले दबंग (आप इसे अपनी श्रद्धानुसार गुंडा भी पढ़ सकते हैं) सांसद के बीच की खींचतान पर सोशल मीडियाई कमेंट्स को फॉलो कर रहा हूं...
कमेंट्स का लब्बोलुआब: देश को राजनीति करने वाले खिलाड़ियों पर घोर आपत्ति है, लेकिन गुंडागर्डी और दबंगई करने वाले नेता पर नहीं!
हर कोई खिलाड़ियों को सलाह दे रहा है- राजनीति छोड़कर खेल खेलें। क्यों? राजनीति करना अपराध है? जब किसी नेता की गुंडागर्दी अपराध नहीं तो खिलाड़ियों की राजनीति अपराध कैसे हो सकती है? फिर नेताओं को गुंडागीरी छोड़ने की सलाह क्यों नहीं? उनका भी तो मुख्य काम राजनीति करना है, दबंगई का अधिकार क्यों दे दिया गया?
इस मामले में सच क्या है, दरअसल किसी को पता नहीं है। पर कोई इस सच से इनकार नहीं करेगा कि खिलाड़ियों की राजनीति कम से कम एक नेता की गुंडागर्दी से तो बेहतर ही होगी...!!!
मैं अपने आप को एक स्पोर्ट्स पर्सन मानता हूं और इसलिए नैतिक तौर पर एक दबंग के बजाय हमेशा खिलाड़ी के साथ रहूंगा... बाकी लोकतंत्र में लोग स्वतंत्र हैं, खूब क्रिकेट देखें और अपनी पसंद के गुंडे को समर्थन दें...!!!

#punia #BrijBhushanSharanSingh

मंगलवार, 12 दिसंबर 2023

Animal का अलार्म सिग्नल... पर इंसान कब मानता है!!!


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By Jayjeet Aklecha/ जयजीत अकलेचा
एक व्यक्ति फिल्म देखकर आता है और कहता है- बहुत घटिया है...
दूसरा सोचता है- यह उसे घटिया कैसे कह सकता है? मैं खुद देखकर घटिया कहूंगा... फिर वह देखकर कहता है- हां भाई, वाकई घटिया है...
तीसरा सोचता है- दो लोग देखकर आए और घटिया कह रहे हैं। लेकिन कितनी ज्यादा घटिया, ये नहीं बता रहे। बड़ा vague सा मामला है। फिर वह खुद देखता है और घोषणा करता है- महाघटिया...
और स्वयं उद्घोषणा के चक्कर में घटिया फिल्में करोड़ों के वारे-न्यारे कर लेती हैं और दूसरे निर्माता-निर्देशकों को इससे भी घटिया बनाने के लिए इंस्पायर कर जाती हैं।
जंगल में जब कोई जानवर खतरा देखकर बाकी एनिमल्स को आगाह करता है, तो वे सब उसके इशारे पर भरोसा करते हैं और उनमें से कई जानवर सुरक्षित बचने में सफल हो जाते हैं। इसे जंगल का 'अलार्म सिग्नल' कहते हैं।
यह वह प्रवृत्ति है, जो जानवरों को इंसान से अलग करती है। इंसान के सामने सबसे बड़ा संकट तो विश्वास का है। इसलिए वह दूसरों को ठोकर खाकर देखते हुए भी खुद ठोकर खाकर अनुभव लेना ज्यादा पसंद करता है- क्या पता सामने वाला नाटक कर रहा हो!
लेकिन कभी-कभी इंसानी अलार्म सिग्नल पर भरोसा करना समझदारी होता है। इससे आप पैसे भी बचा सकते हैं और सवा तीन घंटे का कीमती समय भी। हां, वाकई कीमती। इंसान रेड सिग्नल के ग्रीन होने के लिए 10 सेकंड का भी इंतजार नहीं करता है तो समझा जा सकता है कि उसके लिए 3 घंटे 21 मिनट कितने कीमती होंगे!
एक सवाल भी... इंसान के भीतर के शैतान की तुलना एनिमल से करना क्या जानवरों के प्रति ज्यादती नहीं है? साथ लगी तस्वीर में जानवरों की मासूमियत देखिए। आप मेरी बात से जरूर सहमत होंगे। कम से कम PETA जैसे संगठनों को तो इस पर आपत्ति उठानी ही चाहिए। हो सकता, उठाई भी हो।

रविवार, 19 नवंबर 2023

काश, इस खिलाड़ी को जरा याद कर लेते!!!

#iccworldcup2023 #ICCWorldCup #RavichandranAshwin
इस खिलाड़ी को मैंने कभी भी खराब खेलते नहीं देखा। बॉल से नहीं तो बैट से, इसने हमेशा अपनी उपयोगिता सिद्ध की। इस वर्ल्ड कप में खेले गए एकमात्र मैच में भी (10 ओवर में 34/1, ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ)। मुझे अभी भी समझ में नहीं आ रहा कि आखिर इस खिलाड़ी को केवल पानी पिलाने के लिए टीम स्क्वाड में शामिल क्यों किया गया!!
मैं इंतजार कर रहा था कि भारत लीग में एक या दो मैच हारें ताकि टीम मैनेजमेंट को इस खिलाड़ी की फिर से याद आए। दुर्भाग्य से हमें उस मैच में हार मिली, जिसके लिए कोई भी भारतीय क्रिकेट प्रेमी तैयार नहीं था।
अहमदाबाद की धीमी पिच पर हुए इस महत्वपूर्ण व बेहद दबाव वाले मुकाबले में आर. अश्विन जैसा अनुभवी और प्रतिभाशाली खिलाड़ी टीम इंडिया के लिए ट्रम्प कार्ड साबित हो सकता था!
मगर अब बस अगर-मगर के अलावा कुछ बाकी नहीं... तो आइए हार को खुले मन से स्वीकार करें...!

मंगलवार, 14 नवंबर 2023

सबसे पुरानी पार्टी के पुरातनपंथी और थके हुए वादे… न कोई इनोवेटिव आइडिया, न सियासी साहस!


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By Jayjeet Aklecha
दो दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक चुनावी सभा में कहा कि वे ऐसी सौर ऊर्जा योजना लॉन्च करने जा रहे हैं, जिससे आने वाले वर्षों में सभी लोगों के बिजली के बिल जीरो हो जाएंगे।
क्या इसे उसी तरह का एक और जुमला भर मान लिया जाएं, जैसे कि किसानों की आय दोगुनी करने, प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने, देश को मैन्युफैक्चरिंग हब बनाकर लाखों नौकरियां सृजित करने जैसे वादे भी महज जुमले ही रहे!
बेशक, प्रधानमंत्री की ताजी घोषणा को भी जुमला माना जा सकता है। लेकिन इसकी और अन्य तमाम जुमलों की हम घोर निंदा करें, उससे पहले जरा कांग्रेस के वादों पर भी एक नजर दौड़ा लेते हैं, खासकर मप्र चुनावों के संदर्भ में- सरकार बनने पर किसानों का कर्ज माफ, 100 यूनिट तक बिजली मुफ्त, तीन लाख नई सरकारी नौकरियां, पुरानी पेंशन की बहाली...
कांग्रेस देश की सबसे पुरानी पार्टी है। इस प्राचीनता पर अनेक कांग्रेसी अक्सर गर्व भी करते हैं। होना भी चाहिए। लेकिन पुरानी का मतलब क्या पुरातनपंथी होना भी है? शायद कांग्रेस यही मानती है और खासकर बीते कुछ सालों में तो कांग्रेस ने स्वयं को यही साबित करने के लिए जी जान लगा दी है। भारत दुनिया का सर्वाधिक युवा देश है, लेकिन विकसित देश बनने की करोड़ों युवाओं की आकांक्षाओं लिए आपके पास यंग और इनोवेटिव आइडियाज नहीं हैं। घिसे-पिटे और थके हुए आइडियाज लेकर आप चुनाव जीतने उतरते हैं और उतरे हैं (दुर्भाग्य से ओल्ड पेंशन योजना, मुफ्त बिजली जैसे आइडियाज ने आपको कुछ राज्यों में चुनाव जितवा भी दिए)।
दुनिया के तमाम विकसित देशों की इकोनॉमिक प्लानिंग पर नजर डालेंगे तो पाएंगे कि वे सतत पेंशन और सरकारी नौकरियों पर खर्च से मुक्ति पाने की दिशा में आगे बढ़े हैं। वे पेंशन से इनकार नहीं करते, लेकिन इसकी गारंटी के लिए उनके पास इनोवेटिव आइडियाज हैं (जैसे हमारे यहां एनपीएस है और जिसकी खामियों को दूर कर इसे बेहतर किया जा सकता है, बनिस्बत ओल्ड पेंशन के)। इन विकसित देशों ने निजी क्षेत्र की प्रोडक्टिविटी पर ज्यादा विश्वास किया है, जबकि सप्ताह भर पहले एक कांग्रेसी नेता जोर-शोर से निजीकरण के खिलाफ गला फाड़ रहे थे। निजीकरण के विरोध में नारे लगाने का काम तो अब ‘प्रागैतिहासिक' ट्रेड यूनियन लीडर्स तक छोड़ चुके हैं। लेकिन दुर्भाग्य से कई कांग्रेसी नेता अब भी मोहनजोदड़ो युग में जी रहे हैं, इसके बावजूद कि देश में ग्लोबलाइजेशन और प्रकारांतर में निजी क्षेत्र को बढ़ावा देने का काम उन्हीं के एक बेहद शांत नेता (और जिन्हें कम से कम मैं चमत्कारी भी मानता हूं) की पॉलिसी का नतीजा था। उस पर गर्व करने और उसे आगे बढ़ाने के बजाय वे प्रतिगामी बनकर पूरे देश और उसकी इकोनॉमी को पीछे धकेलने पर उतारू हो रहे हैं।
बेशक, यहां भाजपा को कोई क्लीन चिट नहीं दी जा रही। अन्य तमाम दलों की तरह यह भी रेवड़ियां बांटने और इकोनॉमी का सत्यानाश करने में में पीछे नहीं है, लेकिन उसने आयुष्मान योजना, मुफ्त अनाज योजना और लाड़ली बहना जैसी स्कीमें शुरू कीं जो कल्याणकारी होने के साथ-साथ अंतत: मेडिकल इकोनॉमी, एग्री इकोनॉमी और (लाड़ली बहनाओं का सारा पैसा बाजार में आने की संभावनाओं के मद्देनजर) बाजार को प्रोत्साहन देने वाली है।
पुनश्च... कांग्रेस का एक वादा दो रुपए किलो की दर पर गोबर खरीदने का भी है। इस गोबर आइडिया के बजाय वह केवल इतना वादा भी कर देती कि हर किसान परिवार को एक भैंस मुफ्त दी जाएगी तो शायद इसी से तस्वीर बदल जाती, ग्रामीण अंचलों की भी और कांग्रेस की भी... आज कांग्रेसी इस जमीनी हकीकत से भी बावस्ता नहीं हैं कि दो रुपए किलो में तो स्वयं किसान भी गोबर खरीदने को तैयार हो जाएंगे, बशर्ते गोबर उपलब्ध तो हो...!!!